फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Rohtak News ›   एमएलसी, पीआई व डेथ रिकार्ड जमा कराने में जानबूझ कर किया जा रहा हेरफेर

एमएलसी, पीआई व डेथ रिकार्ड जमा कराने में जानबूझ कर किया जा रहा हेरफेर

Thu, 31 May 2018 02:44 AM IST
Updated Thu, 31 May 2018 02:44 AM IST
विज्ञापन
एमएलसी, पीआई व डेथ रिकार्ड जमा कराने में जानबूझ कर किया जा रहा हेरफेर
अमर उजाला एक्सक्लूसिव
विज्ञापन


एमएलसी, पीआई और डेथ रिकॉर्ड जमा कराने में जानबूझ कर किया जा रहा हेरफेर ---
48 घंटे के भीतर जमा होने वाले रिकॉर्ड का महीनों तक नहीं होता पता

संजय कुमार
रोहतक।
पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय में सालों से मेडिको लीगल केस, पुलिस इंक्वायरी व डेथ रिकार्ड को जमा कराने में जानबूझ कर महीनों देरी की जा रही है। नियमानुसार 48 घंटे के भीतर ही संबंधित डॉक्टर को इन केसों से संबंधित पूरा रिकार्ड जमा कराना होता है, लेकिन ऐसा महीनों तक नहीं होता। इसका लाभ इन केसों से जुडे़ आरोपियों को बखूबी मिलता है, क्योंकि बगैर जांच रिपोर्ट के पुलिस किसी भी बड़ी धारा के तहत मामला दर्ज नहीं कर सकती। नतीजा यह होता है कि गंभीर चोट के मामलों में भी आरोपी को जमानत मिल जाती है। यहां पुलिस प्रशासन की मजबूरी होती है कि उसे 90 दिन के अंदर चार्जशीट करना होता है।
काम का दबाव कहें या कोई लेनदेन का लालच पीजीआईएमएस के डॉक्टर संस्थान के नियमों के अलावा न्यायालय के निर्देशों की भी धज्जियां उड़ा रहे हैं। यहां बार-बार निर्देश जारी करने के बाद भी डॉक्टरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। स्थिति यह है कि अगर मरीजों का सारा रिकार्ड तलब किया जाए तो बहुत सी जरूरी चीजें गायब ही मिलेंगी। यहां अधिकारियों ने अपनी जान बचाने के लिए बार-बार सरकुलर भी जारी किया है, लेकिन अमल में कभी नहीं लाया गया। इस सरकुलर की प्रति उपायुक्त, एसपी और सेशन जज को भेजी जा चुकी है। कुछ मामलों में तो डुप्लीकेट फाइल तक तैयार की गई और कुछ मामलों में डॉक्टरों पर पुलिस में मामला भी दर्ज हुआ है। एक मामला संस्थान के डॉक्टर के खिलाफ 2017 में पीजीआईएमएस थाना में दर्ज है। संस्थान जब भी इस संबंध में सरकुलर जारी करता है कुछ डॉक्टर और सीनियर इसके विरोध में खडे़ हो जाते हैं। हाल ही में ऐसे ही जारी सरकुलर को लेकर संस्थान के रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन ने रोष भी जताया है। गौरतलब है कि पीजीआईएमएस में रोजाना 20 के तकरीबन ऐसे केस आते हैं, इनका रिकॉर्ड 48 घंटे में दर्ज होना चाहिए।
विज्ञापन


जांच होना है जरूरी
इस मामले में जांच होना जरूरी है कि कहीं संस्थान इन मामलों में कोई खेल तो नहीं खेल रहा है। क्योंकि कुछ समय पहले हिसार में चोट के बदले नोट का मामला उजागर हुआ था। इसमें कुछ डॉक्टर केस को मजबूत बनाने के लिए एक पक्ष के व्यक्ति का आपरेशन कर गंभीर चोट बनाते थे। इसके लिए पूरी टीम लाखों रुपये लेती थी। इससे कोर्ट में मजबूती से केस रखा जाता था और सामने वाले को जमानत तक नहीं मिल पाती थी। इस मामले का खुलासा वर्ष 2008 में एसपी सुभाष यादव ने किया था। अधिकारी को एक तरह के कई केस सामने आने पर शक हुआ था। इसकी जांच पीजीआईएमएस के फोरेंसिक मेडिसन विभागाध्यक्ष डॉ. एसके धत्तरवाल ने की थी।
विज्ञापन
विज्ञापन



अस्थि रोग और बाल रोग विभाग में आ रही है समस्या
सूत्रों की मानें तो समय पर रिकॉर्ड जमा कराने में सबसे अधिक समस्या अस्थि रोग और बाल रोग विभाग के डॉक्टरों की ओर से आ रही है। इन विभागों के डॉक्टर मरीजों से संबंधित सारा रिकार्ड समय पर जमा नहीं करा रहे हैं।

इन तिथियों पर जारी हुए सरकुलर
डीएमएस डॉ. अमित लठवाल 24 सितंबर 2010
इसमें 16 सितंबर 2010 को जिला सेशन जज के साथ बैठक हुई। इसमें निर्देश हुए कि विभागाध्यक्ष व यूनिट हेड अपने विभाग संबंधी फाइलों को समय पर जमा कराएं। इसमें सामान्य मरीजों के लिए सात दिन व एमएलसी, पीआई व डेथ केस के लिए 48 घंटे का समय दिया गया। ऐसा न होने पर विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी तय की गई। इसके लिए नियम बनाया गया कि हाउस सर्जन हर तीन माह में अपना रिकॉर्ड जमा कर एनओसी ले।

एमएस डॉ. गीता गठवाला 22 सितंबर 2012
महिला चिकित्सक ने संस्थान की पुरानी हिदायतों को जारी किया और कहा कि डॉक्टरों की देरी के चलते पुलिस जांच, कोर्ट का कार्य और पीड़ित को समस्या हो रही है। इसलिए विभागाध्यक्ष अपने रेजिडेंट डॉक्टरों को निर्देश दें कि वह इस पर ध्यान दें। इसके लिए प्रतिदिन के हिसाब से 100 रुपये जुर्माने का प्रावधान भी किया गया, लेकिन इसके बाद भी किसी पर असर नहीं पड़ा।

एमएस डॉ. अशोक चौहान 21 नवंबर 2012
बतौर चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अशोक चौहान ने पत्र जारी करते हुए कहा कि फाइल समय पर जमा नहीं होने से पुलिस जांच और कोर्ट के केस में देरी हो रही है। इस पर कोर्ट संज्ञान ले रही है। इसके लिए नियम बनाया गया कि स्टाफ नर्स अलग रजिस्टर बनाएंगी, इसमें केस की डिटेल होगी। संबंधित डॉक्टर केस की फाइल में पूरा विवरण, नाम, पता, उपचार हिस्ट्री, नंबरिंग करने के साथ अपने हस्ताक्षर के साथ पद लिखकर फाइल में जमा कराएगा और नर्सिंग सिस्टर को जानकारी देगा। इसके बाद विभागाध्यक्ष फाइल को आगे भिजवाएंगे।

निदेशक डॉ. राकेश गुप्ता 19 जून 2017
निदेशक डॉ. राकेश गुप्ता ने अपने निर्देशों में कहा कि समय पर सीआर कार्यालय में फाइलें जमा नहीं हो रही हैं। कुछ फाइल गुम भी हैं। इसलिए सभी विभागाध्यक्षों को निर्देश दिए जाते हैं कि वह अपने रेजिडेंट डॉक्टर को कहें कि वह समय पर फाइल जमा कराएं। इसके लिए डॉक्टरों को हर माह सीआर कार्यालय से एनओसी लेनी होगी, इसके बाद उनकी उपस्थिति दर्ज होनी चाहिए। क्योंकि फाइल समय पर जमा न होना गंभीर मामला है। यदि इस पर पुलिस या कोर्ट कोई एक्शन लेती है तो संबंधित डॉक्टर और निदेशक जिम्मेदार होगा न कि निदेशक।

डॉक्टरों के लिए निवास प्रमाणपत्र जरूरी
बताया जा रहा है कि हाल ही में चिकित्सा अधीक्षक डॉ. नित्यानंद व डीएमएस डॉ. संदीप के माध्यम से पत्र निकाला गया है कि संस्थान के डॉक्टर अपने मरीजों की फाइल अपने पहचान पत्र के साथ समय पर जमा कराएं। क्योंकि बार-बार हो रही समस्या से प्रशासन को परेशानी झेलनी पड़ रही है। डॉक्टरों के लिए फाइल जमा कराने के साथ आधार कार्ड या कोई रेजिडेंट प्रूफ अनिवार्य किया गया है।

पूरे मामले में रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन का पक्ष
संस्थान के रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन के प्रधान डॉ. जंगबीर ग्रेवाल का कहना है कि मरीज की हर फाइल जमा कराने के साथ आधार कार्ड जैसा संवेेदनशील पहचान पत्र जमा कराने को कहा गया है। यदि कोई डॉक्टर 200 फाइल जमा कराता है तो क्या वह अपने 200 आधार कार्ड जमा कराएगा। यदि इसका कहीं मिस यूज हुआ तो कौन जिम्मेदार होगा। इस संबंध में संस्थान के शीर्ष अधिकारियों से बात की तो उन्होंने ऐसी बात नोटिस में होने से ही मना कर दिया। यह नोटिस एमएस के पत्र पर एचसीएमएस के डॉक्टर संदीप ने जारी किया है। डॉ. संदीप के इस पर पत्र पर डॉक्टरों में रोष है कि वह अपने हिसाब से ही सारे नियम थोपेंगे तो सही नहीं है। एमसीआई के नियमानुसार डॉक्टर का काम मरीज का उपचार करना और पढ़ाई करना है। फाइल को सिस्टर या रिकार्ड अधिकारी ले कर जाए। डॉक्टर का आधार कार्ड फाइल के साथ क्यों मांगा जा रहा है, क्या संस्थान पहचान पत्र बिना किसी प्रूफ के डॉक्टर को जारी कर देता है। इस संबंध में गत वीरवार को बैठक हुई थी। कुलपति ने सोमवार तक इस मामले को पेंडिंग कर रखा है। हमारा प्रयास है कि इस मुद्दे को शांति से बैठकर सुलझा लें, नहीं तो आरडीए कार्य बंद करने की घोषणा कर सकता है।

बोले अधिकारी
सेशन जज के आर्डर हैं, यह तो मानना ही पडे़गा। अगर एमएलसी केस की फाइल नहीं पहुंचेगी तो पुलिस चालान कैसे पेश करेगी। डेथ केस में पीड़ित परिवार बीमा कैसे क्लेम करेगा। बार-बार पुलिस शिकायत करती है कि वह चक्कर काट रहे हैं फाइल नहीं मिल रही है। मरीज की फाइल पर पीड़ित और पुलिस का हक है। कहीं भी गड़बड़ होने पर समन एमएस के नाम पर आ जाते हैं। इसलिए अब सरकुलर भेजा गया है कि डॉक्टर मरीजों की फाइल जमा कराने में कोताही न बरतें। आधार कार्ड जरूरी नहीं है, लेकिन कोई तो प्रूफ देना ही होगा। निर्देश दिए गए हैं कि यदि समय पर फाइल जमा न होने पर न्यायालय कोई कार्रवाई करता है तो संबंधित विभागाध्यक्ष ही जिम्मेदार होगा। डॉक्टरों का प्रूफ इसलिए मांगा जा रहा है कि वह तीन साल बाद कहीं अन्य स्थान पर चले जाएंगे तो वह उसे कहां तलाशेंगे। कोर्ट तो चिकित्सा अधीक्षक को मौके पर बुलाता है।

- डॉ. नित्यानंद शर्मा, चिकित्सा अधीक्षक, पीजीआईएमएस

यह मामला काफी गंभीर है। सामने आया है कि एमएलआर, पीआई व डेथ केस मामलों की रिपोर्ट महीनों तक नहीं मिलती। इसके चलते जांच प्रक्रिया भी लेट हो जाती है। इस संबंध में कुलपति से बात की जाएगी। इस मामले में जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
- जशनदीप सिंह रंधावा, पुलिस कप्तान
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed