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हर महीने नशा छुड़ाओ केंद्र पर आने वाले मरीजों में 70 फीसदी चिट्टे के आदी
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पंजाब के बाद अब रोहतक के युवाओं को भी चिट्टे की जद में हैं। पिछले दो सालों के दौरान जिले में इस नशे का प्रचलन बेतहाशा बढ़ा है। यह हर सामाजिक और आर्थिक तबके के परिवारों के युवाओं को अपना शिकार बना रहा है। हर महीने नशा छुड़ाओ केंद्र आने वाले मरीजों में करीब 70 फीसदी चिट्टे के आदी मिल रहे हैं। जिला रेडक्रॉस सोसायटी द्वारा संचालित नशा छुड़ाओ केंद्र के कॉर्डिनेटर नाहर सिंह बताते हैं कि पहले परंपरागत रूप से शराब और अफीम के आदी लोग नशा छुड़ाने आते थे। उसके बाद एक ऐसा दौर आया जब स्मैक और हेरोइन के शिकार ज्यादा आने लगे। लेकिन अब तक सबसे ज्यादा चिट्टे के आदी ही केंद्र में आ रहे हैं। पिछले दो सालों से चिट्टे का प्रभाव बेतहाशा बढ़ा है। ज्यादातर 18-20 साल के स्कूलों, कॉलेजों के छात्र इसके शिकार हो रहे हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि हर वर्ग और बैकग्राउंड के बच्चे इसकी जद में आ रहे हैं। समस्या ज्यादा गंभीर इसलिए है कि नशे के लिए पीड़ित घर का सामान तक बेच देते हैं, चोरियां तक करते हैं। उन्होंने बताया कि ज्यादातर मां ही बच्चों को इलाज के लिए यहां लाती हैं। कुछ बच्चे इलाज के लिए राजी हो जाते हैं लेकिन कई ऐसे हैं जो एडमिट करने को दी गई तारीख पर आते ही नहीं।
बहन-भाई दोनों शिकार
केंद्र के कॉर्डिनेटर नाहर सिंह ने बताया कि एक बार एक महिला अपने बेटा और बेटी को लेकर आई, दोनों को ही चिट्टे की लत लग गई थी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार था, बीस वर्षीय युवती की शादी दिल्ली में हुई थी। उसका पति चिट्टे का आदी था। उससे युवती को लत लग गई, फिर युवती से उसके भाई को। उन्हें दाखिल करने का समय दे दिया गया था पर वे लौट कर नहीं आए। इसी तरह एक मध्यमवर्गीय परिवार के 18-20 साल के दो सगे भाई भी चिट्टे का शिकार हो गए। उनकी मां ने दोनों को केंद्र में दाखिल कराया। उन्होंने पूरा उपचार कराया और बाद में भी नियमित फॉलोअप के लिए आते रहे। अब दोनों ठीक हैं।
इलाज के साथ होती है काउंसिलिंग
नाहर सिंह ने बताया कि केंद्र की ओपीडी में हर माह नए 35-40 लोग आते हैं, करीब 40 फॉलोअप वाले होते हैं। हेरोइन, स्मैक, चिट्टा और अफीम के आदी को 21 दिन केंद्र में रखा जाता है। जबकि, अल्कोहल, कफ सिरप, सुल्फा, गांजा वालों को 15 दिन रखने की जरूरत पड़ती है। फिर एक हफ्ते की दवा देकर भेज देते हैं, कम से कम छह माह तक फॉलोअप चलता है। यहां दवाओं के साथ मरीजों और परिजनों की काउंसिलिंग होती है, फिर 5-6 के ग्रुप बना कर काउंसिलिंग की जाती है।
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नशा छुड़ाओ केंद्र में बेहद प्रशिक्षित डॉक्टर और स्टाफ है। यहां आने वाले नशे के आदी लोगों का हर तरीके से ख्याल रखा जाता है। दवाओं के साथ-साथ काउंसिलिंग पर फोकस है। मानसिक तौर पर मजबूत बनाने के लिए नियमित मेडिटेशन करवाया जाता है।
- देवेंद्र चहल, सेक्रेटरी, जिला रेडक्रॉस सोसायटी
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बहन-भाई दोनों शिकार
केंद्र के कॉर्डिनेटर नाहर सिंह ने बताया कि एक बार एक महिला अपने बेटा और बेटी को लेकर आई, दोनों को ही चिट्टे की लत लग गई थी। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार था, बीस वर्षीय युवती की शादी दिल्ली में हुई थी। उसका पति चिट्टे का आदी था। उससे युवती को लत लग गई, फिर युवती से उसके भाई को। उन्हें दाखिल करने का समय दे दिया गया था पर वे लौट कर नहीं आए। इसी तरह एक मध्यमवर्गीय परिवार के 18-20 साल के दो सगे भाई भी चिट्टे का शिकार हो गए। उनकी मां ने दोनों को केंद्र में दाखिल कराया। उन्होंने पूरा उपचार कराया और बाद में भी नियमित फॉलोअप के लिए आते रहे। अब दोनों ठीक हैं।
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इलाज के साथ होती है काउंसिलिंग
नाहर सिंह ने बताया कि केंद्र की ओपीडी में हर माह नए 35-40 लोग आते हैं, करीब 40 फॉलोअप वाले होते हैं। हेरोइन, स्मैक, चिट्टा और अफीम के आदी को 21 दिन केंद्र में रखा जाता है। जबकि, अल्कोहल, कफ सिरप, सुल्फा, गांजा वालों को 15 दिन रखने की जरूरत पड़ती है। फिर एक हफ्ते की दवा देकर भेज देते हैं, कम से कम छह माह तक फॉलोअप चलता है। यहां दवाओं के साथ मरीजों और परिजनों की काउंसिलिंग होती है, फिर 5-6 के ग्रुप बना कर काउंसिलिंग की जाती है।
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नशा छुड़ाओ केंद्र में बेहद प्रशिक्षित डॉक्टर और स्टाफ है। यहां आने वाले नशे के आदी लोगों का हर तरीके से ख्याल रखा जाता है। दवाओं के साथ-साथ काउंसिलिंग पर फोकस है। मानसिक तौर पर मजबूत बनाने के लिए नियमित मेडिटेशन करवाया जाता है।
- देवेंद्र चहल, सेक्रेटरी, जिला रेडक्रॉस सोसायटी