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‘कैंसर के मरीजों की मौत का सौदा’ मामले के तार पीजीआईएमएस से जुडे़
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रोहतक। प्रदेश में कैंसर के मरीजों की मौत का सौदा मामले के तार पीजीआईएमएस रोहतक से भी जुडे़ हैं। इसकी जांच एसटीएफ सोनीपत की टीम कर रही है। यहां नियम भले ही 48 घंटे के अंदर मरीज का रिकार्ड जमा कराने का है, लेकिन इसका अतापता महीनों तक नहीं होता। इस पर डीएमएस प्रभारी रिकॉर्ड डॉ. संदीप ने सवाल उठाया तो उन्हें दबाव में अपना पद ही छोड़ना पड़ गया था। अधिकारी ने सवाल उठाया था कि संस्थान में एमएलआर, पीआई व डेथ रिकार्ड जमा कराने में देरी होती है, इससे काफी समस्याएं होती हैं। लेकिन इसे संस्थान के अधिकारियों ने डॉक्टरों के दबाव में नजर अंदाज किया था।
पूर्व में सवाल उठाया गया था कि मेडिको लीगल केस, पुलिस इंक्वायरी, डेथ रिकार्ड महीनों तक जमा नहीं कराया जाता। अब सवाल उठ रहा है कि मरीजों के रिकार्ड से छेड़छाड़ कर उनकी मौत को भी रुपये कमाने का माध्यम बनाया गया। इन दोनों मामलों के तार जुड़ते हुए दिखाई देते हैं। अब देखना होगा कि एसटीएफ के हाथ कितने पुख्ता सबूत लगते हैं। महज फाइल ही नहीं संस्थान से क्रिमनल केस की सामग्री भी अकसर गुम होती रहती है, इसकी पुलिस में एफआईआर दर्ज करवा कर संस्थान व डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं। पूर्व के चीफ विजिलेंस अधिकारी डॉ. आरएस दहिया भी मानते हैं कि उन्हें कुछ जांच में मरीजों की फाइल की जरूरत थी, लेकिन वह नहीं मिली। ऐसे में सवाल उठाता है कि सरकारी संस्थान से क्रिमनल केस से जुड़ी फाइलें कैसे गायब हो जाती हैं। यदि कोई अधिकारी आवाज उठाता है तो उसे भी दबा दिया जाता है।
चार बार जारी हो चुका है सर्कुलर
डीएमएस डॉ. अमित लठवाल 24 सितंबर 2010
16 सितंबर 2010 को जिला सेशन जज के साथ बैठक में निर्देश जारी हुए कि एचओडी व यूनिट हेड अपने विभाग की फाइल को समय पर जमा कराएंगे। सामान्य मरीज के लिए सात दिन, एमएलसी, पीआई व डेथ फाइल के लिए 48 घंटे का समय तय किया गया था। ऐसा न होने पर विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी तय थी। हाउस सर्जन को भी हर तीन माह में फाइल जमा कराने के लिए एनओसी अनिवार्य की गई थी।
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एमएस डॉ. गीता गठवाला 22 सितंबर 2012
महिला अधिकारी ने पूर्व अधिकारी की हिदायतों को जारी करते हुए कहा कि डॉक्टरों की देरी के चलते पुलिस जांच, कोर्ट का कार्य लेट होने के साथ पीड़ितों को समस्या होती है। इसलिए विभागाध्यक्ष अपने रेजिडेंट डॉक्टराें को निर्देश दें कि वह समय सीमा का ध्यान दें। इसके लिए अधिकारी ने प्रतिदिन के हिसाब से समय पर फाइल न जमा कराने पर 100 रुपये जुर्माने का प्रावधान किया था।
एमएस डॉ. अशोक चौहान 21 नवंबर 2012
अधिकारी ने अपने पत्र में दोहराया कि समय पर मरीजों की फाइल जमा न होने पर पुलिस जांच और कोर्ट का कार्य प्रभावित होता है। इस पर कोर्ट संज्ञान लेता है। इसलिए नियम बनाया गया कि स्टाफ नर्स अलग से रजिस्टर बनाएगी और इसमें केस की डिटेल होगी। संबंधित डॉक्टर केस की फाइल में अपना पूरा विवरण, नाम, पता, उपचार, हिस्ट्री, नंबरिंग करने के साथ हस्ताक्षर भी करेगा। इसकी जानकारी नर्सिंग सिस्टर को देनी होगी। इसके बाद एचओडी फाइल को आगे भिजवाएंगे।
निदेशक डॉ. राकेश गुप्ता 19 जून 2017
निदेशक ने अपने निर्देशों में कहा कि समय पर सीआर कार्यालय में फाइल जमा नहीं हो रही हैं। कुछ फाइल गुम भी हैं। इसलिए सभी विभागाध्यक्षों को निर्देश दिया गया था कि अपने रेजिडेंट डॉक्टर को कहें कि व समय पर फाइल जमा कराएं। इसके लिए डॉक्टर को सीआर कार्यालय से हर माह एनओसी लेने का प्रावधान किया गया। इसमें स्पष्ट किया गया था कि यदि किसी लापरवाही पर पुलिस या कोर्ट कोई एक्शन लेता है तो निदेशक नहीं, बल्कि संबंधित डॉक्टर जिम्मेदार होगा।
प्रशासन का दावा
महज फाइल गुम होने से नहीं मिटता किसी मरीज का रिकार्ड
संस्थान के निदेशक डॉ. रोहतास कंवर यादव ने बताया कि महज मरीज की फाइल गुम होने से किसी का रिकार्ड नहीं मिट सकता। यदि जरूरत पड़ती है कि संस्थान के अन्य रिकार्ड को खंगाला जाएगा। संस्थान में हर मरीज की कई जगह एंट्री होती है, इसमें उसकी जांच, उपचार आदि का आसानी से पता चल सकता है। एसटीएफ को जिस भी मरीज की रिकार्ड की जरूरत होगी, उसमें संस्थान पूरी मदद करेगा।
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पूर्व में सवाल उठाया गया था कि मेडिको लीगल केस, पुलिस इंक्वायरी, डेथ रिकार्ड महीनों तक जमा नहीं कराया जाता। अब सवाल उठ रहा है कि मरीजों के रिकार्ड से छेड़छाड़ कर उनकी मौत को भी रुपये कमाने का माध्यम बनाया गया। इन दोनों मामलों के तार जुड़ते हुए दिखाई देते हैं। अब देखना होगा कि एसटीएफ के हाथ कितने पुख्ता सबूत लगते हैं। महज फाइल ही नहीं संस्थान से क्रिमनल केस की सामग्री भी अकसर गुम होती रहती है, इसकी पुलिस में एफआईआर दर्ज करवा कर संस्थान व डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेते हैं। पूर्व के चीफ विजिलेंस अधिकारी डॉ. आरएस दहिया भी मानते हैं कि उन्हें कुछ जांच में मरीजों की फाइल की जरूरत थी, लेकिन वह नहीं मिली। ऐसे में सवाल उठाता है कि सरकारी संस्थान से क्रिमनल केस से जुड़ी फाइलें कैसे गायब हो जाती हैं। यदि कोई अधिकारी आवाज उठाता है तो उसे भी दबा दिया जाता है।
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चार बार जारी हो चुका है सर्कुलर
डीएमएस डॉ. अमित लठवाल 24 सितंबर 2010
16 सितंबर 2010 को जिला सेशन जज के साथ बैठक में निर्देश जारी हुए कि एचओडी व यूनिट हेड अपने विभाग की फाइल को समय पर जमा कराएंगे। सामान्य मरीज के लिए सात दिन, एमएलसी, पीआई व डेथ फाइल के लिए 48 घंटे का समय तय किया गया था। ऐसा न होने पर विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी तय थी। हाउस सर्जन को भी हर तीन माह में फाइल जमा कराने के लिए एनओसी अनिवार्य की गई थी।
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एमएस डॉ. गीता गठवाला 22 सितंबर 2012
महिला अधिकारी ने पूर्व अधिकारी की हिदायतों को जारी करते हुए कहा कि डॉक्टरों की देरी के चलते पुलिस जांच, कोर्ट का कार्य लेट होने के साथ पीड़ितों को समस्या होती है। इसलिए विभागाध्यक्ष अपने रेजिडेंट डॉक्टराें को निर्देश दें कि वह समय सीमा का ध्यान दें। इसके लिए अधिकारी ने प्रतिदिन के हिसाब से समय पर फाइल न जमा कराने पर 100 रुपये जुर्माने का प्रावधान किया था।
एमएस डॉ. अशोक चौहान 21 नवंबर 2012
अधिकारी ने अपने पत्र में दोहराया कि समय पर मरीजों की फाइल जमा न होने पर पुलिस जांच और कोर्ट का कार्य प्रभावित होता है। इस पर कोर्ट संज्ञान लेता है। इसलिए नियम बनाया गया कि स्टाफ नर्स अलग से रजिस्टर बनाएगी और इसमें केस की डिटेल होगी। संबंधित डॉक्टर केस की फाइल में अपना पूरा विवरण, नाम, पता, उपचार, हिस्ट्री, नंबरिंग करने के साथ हस्ताक्षर भी करेगा। इसकी जानकारी नर्सिंग सिस्टर को देनी होगी। इसके बाद एचओडी फाइल को आगे भिजवाएंगे।
निदेशक डॉ. राकेश गुप्ता 19 जून 2017
निदेशक ने अपने निर्देशों में कहा कि समय पर सीआर कार्यालय में फाइल जमा नहीं हो रही हैं। कुछ फाइल गुम भी हैं। इसलिए सभी विभागाध्यक्षों को निर्देश दिया गया था कि अपने रेजिडेंट डॉक्टर को कहें कि व समय पर फाइल जमा कराएं। इसके लिए डॉक्टर को सीआर कार्यालय से हर माह एनओसी लेने का प्रावधान किया गया। इसमें स्पष्ट किया गया था कि यदि किसी लापरवाही पर पुलिस या कोर्ट कोई एक्शन लेता है तो निदेशक नहीं, बल्कि संबंधित डॉक्टर जिम्मेदार होगा।
प्रशासन का दावा
महज फाइल गुम होने से नहीं मिटता किसी मरीज का रिकार्ड
संस्थान के निदेशक डॉ. रोहतास कंवर यादव ने बताया कि महज मरीज की फाइल गुम होने से किसी का रिकार्ड नहीं मिट सकता। यदि जरूरत पड़ती है कि संस्थान के अन्य रिकार्ड को खंगाला जाएगा। संस्थान में हर मरीज की कई जगह एंट्री होती है, इसमें उसकी जांच, उपचार आदि का आसानी से पता चल सकता है। एसटीएफ को जिस भी मरीज की रिकार्ड की जरूरत होगी, उसमें संस्थान पूरी मदद करेगा।