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बिना पूछे कर दी पॉलिसी, उपभोक्ता फोरम ने ठोंका 10 हजार रुपये जुर्माना
Updated Fri, 27 Apr 2018 02:28 AM IST
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बिना सहमति कंपनी ने की डॉक्टर की पॉलिसी, अब देना होगा 10 हजार रुपये हर्जाना
- पीजीआई में मनोरोग विभाग में विभागाध्यक्ष रहे हैं डॉक्टर जवाहर छाबड़ा
- जिला उपभोक्ता फोरम ने सुनाया फैसला
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक।
निजी इंश्योरेंस कंपनी को बिना सहमति के पॉलिसी करना महंगा पड़ गया। पीजीआई के मनोरोग विभाग में कार्यरत रहे सेक्टर 14 निवासी डाक्टर जवाहर छाबड़ा की शिकायत पर जिला उपभोक्ता ने कंपनी न केवल 10 हजार रुपये हर्जाना लगाया, बल्कि 9 प्रतिशत ब्याज सहित 6 लाख रुपये की राशि लौटाने की हिदायत दी है।
वकील पंकज बेरी ने बताया कि 2008 में डॉक्टर जवाहर छाबड़ा ने निजी कंपनी से 6 लाख रुपये की पॉलिसी करवाई थी। इसके तहत हर साल दो लाख रुपये जमा कराए। छाबड़ा का कहना है कि जब वे पॉलिसी पूरी होने के बाद कंपनी कार्यालय पहुंचे तो बताया गया कि पहले की पॉलिसी की राशि से दो नई ढाई-ढाई लाख की पॉलिसी कर दी गई हैं। डॉक्टर ने सवाल किया कि जब उसने सहमति नहीं दी तो पॉलिसी क्यों की। इसके बाद डाक्टर जिला उपभोक्ता फोरम में पहुंचे और दो लाख रुपये मुआवजे व ब्याज सहित राशि को दिलवाने की मांग की। फोरम ने निजी इंश्योरेंस कंपनी से जवाब मांगा और पूछा कि आपके पास उपभोक्ता की लिखित सहमति है, लेकिन कंपनी लिखित सहमति नहीं उपलब्ध करवा सकी।
उपभोक्ता हिचके नहीं, अधिकारों के लिए आवाज उठाएं
वकील पंकज बेरी ने बताया कि कानून के तहत उपभोक्ताओं को पुख्ता अधिकार मिले हैं। अगर धोखाधड़ी होती है तो आम आदमी जिला उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटा सकता हैं। फोरम बेहद कम समय में न्याय उपलब्ध करवाती है।
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- पीजीआई में मनोरोग विभाग में विभागाध्यक्ष रहे हैं डॉक्टर जवाहर छाबड़ा
- जिला उपभोक्ता फोरम ने सुनाया फैसला
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक।
निजी इंश्योरेंस कंपनी को बिना सहमति के पॉलिसी करना महंगा पड़ गया। पीजीआई के मनोरोग विभाग में कार्यरत रहे सेक्टर 14 निवासी डाक्टर जवाहर छाबड़ा की शिकायत पर जिला उपभोक्ता ने कंपनी न केवल 10 हजार रुपये हर्जाना लगाया, बल्कि 9 प्रतिशत ब्याज सहित 6 लाख रुपये की राशि लौटाने की हिदायत दी है।
वकील पंकज बेरी ने बताया कि 2008 में डॉक्टर जवाहर छाबड़ा ने निजी कंपनी से 6 लाख रुपये की पॉलिसी करवाई थी। इसके तहत हर साल दो लाख रुपये जमा कराए। छाबड़ा का कहना है कि जब वे पॉलिसी पूरी होने के बाद कंपनी कार्यालय पहुंचे तो बताया गया कि पहले की पॉलिसी की राशि से दो नई ढाई-ढाई लाख की पॉलिसी कर दी गई हैं। डॉक्टर ने सवाल किया कि जब उसने सहमति नहीं दी तो पॉलिसी क्यों की। इसके बाद डाक्टर जिला उपभोक्ता फोरम में पहुंचे और दो लाख रुपये मुआवजे व ब्याज सहित राशि को दिलवाने की मांग की। फोरम ने निजी इंश्योरेंस कंपनी से जवाब मांगा और पूछा कि आपके पास उपभोक्ता की लिखित सहमति है, लेकिन कंपनी लिखित सहमति नहीं उपलब्ध करवा सकी।
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उपभोक्ता हिचके नहीं, अधिकारों के लिए आवाज उठाएं
वकील पंकज बेरी ने बताया कि कानून के तहत उपभोक्ताओं को पुख्ता अधिकार मिले हैं। अगर धोखाधड़ी होती है तो आम आदमी जिला उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटा सकता हैं। फोरम बेहद कम समय में न्याय उपलब्ध करवाती है।
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