{"_id":"69b8492ab7205668b30da2f0","slug":"the-court-ruled-in-favor-of-bdi-sunshine-city-society-rewari-news-c-198-1-rew1001-235142-2026-03-16","type":"story","status":"publish","title_hn":"Rewari News: बीडीआई सनशाइन सिटी सोसाइटी के पक्ष में कोर्ट ने सुनाया फैसला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Rewari News: बीडीआई सनशाइन सिटी सोसाइटी के पक्ष में कोर्ट ने सुनाया फैसला
Mon, 16 Mar 2026 11:47 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Mon, 16 Mar 2026 11:47 PM IST
विज्ञापन
पक्ष में फैसला आने पर खुशी जाहिर करते सनशाइन सिटी सोसाइटी के लोग। संवाद
भिवाड़ी। बीडीआई सनशाइन सिटी सोसाइटी के निवासियों को बड़ी राहत मिली है। राजस्थान उच्च न्यायालय ने सोसाइटी के पक्ष में फैसला सुनाया है। इसके बाद सोसाइटी का प्रबंधन और दस्तावेज आरडब्ल्यूए (रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन) को सौंपने की प्रक्रिया तेज हो गई है।
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष राकेश कौशिक ने बताया कि राजस्थान उच्च न्यायालय ने 12 फरवरी को आदेश जारी किया है। इस आदेश के तहत बीड़ा के सक्षम अधिकारी द्वारा 20 मार्च 2024 को पारित रिव्यू आदेश को निरस्त कर दिया गया है।
कोर्ट ने 20 फरवरी 2024 के मूल डिक्री आदेश को बहाल रखा, जिसमें राजस्थान स्वामित्व अधिनियम 2015 की धारा 10 के तहत सोसाइटी के सभी दस्तावेज, प्रबंधन और धारा 19 के तहत लेखा-जोखा 15 दिनों में आरडब्ल्यूए को सौंपने का निर्देश था।
विज्ञापन
राकेश कौशिक ने कहा कि बिल्डर और बीड़ा अधिकारियों की कथित मिलीभगत से मूल आदेश को एक महीने बाद रिव्यू कर बदल दिया गया था, जिसके खिलाफ निवासियों ने दो साल तक संघर्ष किया। उच्च न्यायालय के फैसले से निवासियों में खुशी की लहर है।
विज्ञापन
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष राकेश कौशिक ने बताया कि राजस्थान उच्च न्यायालय ने 12 फरवरी को आदेश जारी किया है। इस आदेश के तहत बीड़ा के सक्षम अधिकारी द्वारा 20 मार्च 2024 को पारित रिव्यू आदेश को निरस्त कर दिया गया है।
विज्ञापन
कोर्ट ने 20 फरवरी 2024 के मूल डिक्री आदेश को बहाल रखा, जिसमें राजस्थान स्वामित्व अधिनियम 2015 की धारा 10 के तहत सोसाइटी के सभी दस्तावेज, प्रबंधन और धारा 19 के तहत लेखा-जोखा 15 दिनों में आरडब्ल्यूए को सौंपने का निर्देश था।
विज्ञापन
राकेश कौशिक ने कहा कि बिल्डर और बीड़ा अधिकारियों की कथित मिलीभगत से मूल आदेश को एक महीने बाद रिव्यू कर बदल दिया गया था, जिसके खिलाफ निवासियों ने दो साल तक संघर्ष किया। उच्च न्यायालय के फैसले से निवासियों में खुशी की लहर है।