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Rewari News: छात्र के खाते में आई साइबर ठगी की राशि, कोर्ट ने जमानत देने से किया इंकार
Sat, 14 Feb 2026 11:44 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Sat, 14 Feb 2026 11:44 PM IST
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रेवाड़ी। जिला न्यायिक परिसर। संवाद
रेवाड़ी। टेलीग्राम टास्क के नाम पर रेवाड़ी के दीपक शर्मा से 1,24,600 रुपये की साइबर ठगी के मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायालय अंकिता शर्मा ने आरोपी राजस्थान के उदयपुर निवासी भरत की नियमित जमानत अर्जी खारिज कर दी है। मामले में थाना साइबर क्राइम में 19 अप्रैल 2025 को एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
अभियोजन के अनुसार शिकायतकर्ता दीपक शर्मा को अप्रैल 2025 में टेलीग्राम पर एक टास्क ग्रुप में जोड़ा गया था। ग्रुप में उन्हें ऑनलाइन छोटे-छोटे कार्य पूरे कर मुनाफा कमाने का झांसा दिया गया।
शुरू में उनसे छोटी रकम निवेश करवाई गई और लाभ सहित राशि उनके खाते में लौटा दी गई, जिससे उनका विश्वास बढ़ा। इसके बाद आरोपियों ने अधिक मुनाफे का लालच देकर उनसे बड़ी रकम ट्रांसफर करवाई।
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दीपक के अनुसार उनसे कुल 1,24,600 रुपये की ठगी की गई। जांच के दौरान पुलिस ने बैंक रिकॉर्ड खंगाले तो पाया कि 49,500 रुपये की राशि दो ट्रांजेक्शन में आरोपी भरत के खाते में ट्रांसफर हुई है।
इसी आधार पर भरत को मामले में शामिल किया गया। पुलिस का कहना है कि इस प्रकरण में कुल आठ बैंक खाते इस्तेमाल हुए हैं जिनमें से कई खातों की जांच अभी जारी है। एक सह-आरोपी की गिरफ्तारी शेष है।
मामले में बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि आरोपी 12वीं कक्षा का छात्र है और उसका नाम मूल एफआईआर में नहीं है। किसी अन्य व्यक्ति ने उसके बैंक खाते का दुरुपयोग किया है।
आरोपी 8 दिसंबर 2025 से न्यायिक हिरासत में है और 27 जनवरी 2026 को चालान अदालत में पेश किया जा चुका है। शिकायतकर्ता से समझौता हो चुका है और कथित राशि लौटा दी गई है, इसलिए जमानत दी जानी चाहिए।
राज्य पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी सीधे तौर पर लाभार्थी खाता धारक है जो साइबर ठगी में महत्वपूर्ण है। जांच अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है और ऐसे में आरोपी के बाहर आने से जांच प्रभावित हो सकती है।
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समझौता जमानत का आधार नहीं : कोर्ट
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं और इन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। समझौता जमानत का आधार नहीं बन सकता। खासकर जब कई खातों और व्यक्तियों की भूमिका की जांच बाकी हो। इन परिस्थितियों में अदालत ने आरोपी की दूसरी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी।
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अभियोजन के अनुसार शिकायतकर्ता दीपक शर्मा को अप्रैल 2025 में टेलीग्राम पर एक टास्क ग्रुप में जोड़ा गया था। ग्रुप में उन्हें ऑनलाइन छोटे-छोटे कार्य पूरे कर मुनाफा कमाने का झांसा दिया गया।
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शुरू में उनसे छोटी रकम निवेश करवाई गई और लाभ सहित राशि उनके खाते में लौटा दी गई, जिससे उनका विश्वास बढ़ा। इसके बाद आरोपियों ने अधिक मुनाफे का लालच देकर उनसे बड़ी रकम ट्रांसफर करवाई।
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दीपक के अनुसार उनसे कुल 1,24,600 रुपये की ठगी की गई। जांच के दौरान पुलिस ने बैंक रिकॉर्ड खंगाले तो पाया कि 49,500 रुपये की राशि दो ट्रांजेक्शन में आरोपी भरत के खाते में ट्रांसफर हुई है।
इसी आधार पर भरत को मामले में शामिल किया गया। पुलिस का कहना है कि इस प्रकरण में कुल आठ बैंक खाते इस्तेमाल हुए हैं जिनमें से कई खातों की जांच अभी जारी है। एक सह-आरोपी की गिरफ्तारी शेष है।
मामले में बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि आरोपी 12वीं कक्षा का छात्र है और उसका नाम मूल एफआईआर में नहीं है। किसी अन्य व्यक्ति ने उसके बैंक खाते का दुरुपयोग किया है।
आरोपी 8 दिसंबर 2025 से न्यायिक हिरासत में है और 27 जनवरी 2026 को चालान अदालत में पेश किया जा चुका है। शिकायतकर्ता से समझौता हो चुका है और कथित राशि लौटा दी गई है, इसलिए जमानत दी जानी चाहिए।
राज्य पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी सीधे तौर पर लाभार्थी खाता धारक है जो साइबर ठगी में महत्वपूर्ण है। जांच अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है और ऐसे में आरोपी के बाहर आने से जांच प्रभावित हो सकती है।
समझौता जमानत का आधार नहीं : कोर्ट
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं और इन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। समझौता जमानत का आधार नहीं बन सकता। खासकर जब कई खातों और व्यक्तियों की भूमिका की जांच बाकी हो। इन परिस्थितियों में अदालत ने आरोपी की दूसरी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी।