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Rewari News: पुलिस नहीं कर पाई साबित...हादसे के वक्त कौन था चालक, कोर्ट ने आरोपी को किया बरी
Sat, 10 Oct 2026 12:52 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Sat, 10 Oct 2026 12:52 AM IST
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रेवाड़ी। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी आशीष कुमार मंडल की अदालत ने सड़क हादसे के एक मामले में आरोपी की पहचान पुख्ता नहीं होने पर आरोपी खुदाना निवासी प्रताप को बरी कर दिया। हादसे के वक्त चालक कौन था, पुलिस यह साबित नहीं कर पाई। हादसे के बाद अज्ञात चालक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
आरोपी को घटनास्थल से गिरफ्तार नहीं किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उसकी पहचान परेड नहीं कराई गई। अदालत ने कहा कि जब आरोपी गवाहों के लिए पहले से अज्ञात हो और एफआईआर में उसका नाम न हो तो उसकी पहचान करना अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
ऐसे मामले में पहली बार की गई पहचान को अकेले दोष सिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए प्रताप को धारा 279, 337, 338 और 427 आईपीसी के आरोपों से बरी कर दिया।
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12 सितंबर 2021 की रात करीब आठ बजे शिकायतकर्ता बालावास अहीर निवासी अजयपाल अपने बेटे राजकुमार के साथ बाइक से गांव लौट रहे थे। बाइक हरियाणा नंबर का बताया गया। आरोप था कि एक वाहन सड़क के बीच में बिना पार्किंग लाइट जलाए खड़ा था। सामने से आ रहे वाहनों की हेडलाइट के कारण बाइक सवारों को सड़क पर खड़ा वाहन दिखाई नहीं दिया और बाइक उससे टकरा गई।
हादसे के बाद अजयपाल को उपचार के लिए रेवाड़ी ले जाया गया। पुलिस को 13 सितंबर को अस्पताल से सूचना मिली। चिकित्सकीय रिपोर्ट में चोटों का उल्लेख किया गया। शुरुआत में अजयपाल बयान देने की स्थिति में नहीं थे। बाद में 29 सितंबर 2021 को उसकी शिकायत के आधार पर रामपुरा थाना पुलिस ने अज्ञात चालक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।
पुलिस ने जांच के दौरान हादसे में शामिल वाहन की पहचान की। दस्तावेज और वाहन जब्त किए गए। पुलिस ने प्रताप को जांच में शामिल किया और उसे आरोपी बनाया। 7 जनवरी 2022 को उसे गिरफ्तार किया गया और उसी दिन जमानत पर रिहा कर दिया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने कुल 10 गवाहों के बयान करवाए। इनमें चिकित्सक, शिकायतकर्ता, प्रत्यक्षदर्शी, पुलिसकर्मी और जांच अधिकारी शामिल थे। पुलिस की ओर से वाहन की यांत्रिक जांच रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज भी अदालत में पेश किए गए।
शिकायतकर्ता ने अदालत में पहचान की, जिरह में सामने आई दूसरी बात
अदालत में शिकायतकर्ता अजयपाल ने प्रताप की पहचान आरोपी के रूप में की। हालांकि जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि हादसे के समय उसने वाहन चालक को देखा नहीं था। यह भी बताया कि आरोपी को उसने इससे पहले कभी नहीं देखा था। अजयपाल के बेटे राजकुमार ने भी अदालत में आरोपी की पहचान की, लेकिन जिरह में उसने कहा कि हादसे के समय चालक मौके से भाग गया था। पुलिस की ओर से उसकी पहचान के लिए कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराई गई थी।
अदालत ने माना- पहचान परेड कराना जरूरी था
अदालत ने फैसले में कहा कि इस मामले में आरोपी शिकायतकर्ता और गवाहों के लिए पहले से अज्ञात था। एफआईआर भी अज्ञात चालक के खिलाफ दर्ज हुई थी। आरोपी को घटनास्थल से गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि पुलिस ने बाद में जांच के दौरान उसे आरोपी बनाया। ऐसी स्थिति में उसकी पहचान स्थापित करना अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण था। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के राम किशन मिथनलाल शर्मा बनाम स्टेट ऑफ बॉम्बे मामले में दिए गए सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि पहचान परेड का उद्देश्य गवाहों को अपराध से संबंधित व्यक्ति की पहचान करने का अवसर देना है लेकिन इस मामले में गिरफ्तारी के बाद ऐसी कोई पहचान परेड नहीं कराई गई।
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आरोपी को घटनास्थल से गिरफ्तार नहीं किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उसकी पहचान परेड नहीं कराई गई। अदालत ने कहा कि जब आरोपी गवाहों के लिए पहले से अज्ञात हो और एफआईआर में उसका नाम न हो तो उसकी पहचान करना अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
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ऐसे मामले में पहली बार की गई पहचान को अकेले दोष सिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए प्रताप को धारा 279, 337, 338 और 427 आईपीसी के आरोपों से बरी कर दिया।
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12 सितंबर 2021 की रात करीब आठ बजे शिकायतकर्ता बालावास अहीर निवासी अजयपाल अपने बेटे राजकुमार के साथ बाइक से गांव लौट रहे थे। बाइक हरियाणा नंबर का बताया गया। आरोप था कि एक वाहन सड़क के बीच में बिना पार्किंग लाइट जलाए खड़ा था। सामने से आ रहे वाहनों की हेडलाइट के कारण बाइक सवारों को सड़क पर खड़ा वाहन दिखाई नहीं दिया और बाइक उससे टकरा गई।
हादसे के बाद अजयपाल को उपचार के लिए रेवाड़ी ले जाया गया। पुलिस को 13 सितंबर को अस्पताल से सूचना मिली। चिकित्सकीय रिपोर्ट में चोटों का उल्लेख किया गया। शुरुआत में अजयपाल बयान देने की स्थिति में नहीं थे। बाद में 29 सितंबर 2021 को उसकी शिकायत के आधार पर रामपुरा थाना पुलिस ने अज्ञात चालक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की।
पुलिस ने जांच के दौरान हादसे में शामिल वाहन की पहचान की। दस्तावेज और वाहन जब्त किए गए। पुलिस ने प्रताप को जांच में शामिल किया और उसे आरोपी बनाया। 7 जनवरी 2022 को उसे गिरफ्तार किया गया और उसी दिन जमानत पर रिहा कर दिया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने कुल 10 गवाहों के बयान करवाए। इनमें चिकित्सक, शिकायतकर्ता, प्रत्यक्षदर्शी, पुलिसकर्मी और जांच अधिकारी शामिल थे। पुलिस की ओर से वाहन की यांत्रिक जांच रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज भी अदालत में पेश किए गए।
शिकायतकर्ता ने अदालत में पहचान की, जिरह में सामने आई दूसरी बात
अदालत में शिकायतकर्ता अजयपाल ने प्रताप की पहचान आरोपी के रूप में की। हालांकि जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि हादसे के समय उसने वाहन चालक को देखा नहीं था। यह भी बताया कि आरोपी को उसने इससे पहले कभी नहीं देखा था। अजयपाल के बेटे राजकुमार ने भी अदालत में आरोपी की पहचान की, लेकिन जिरह में उसने कहा कि हादसे के समय चालक मौके से भाग गया था। पुलिस की ओर से उसकी पहचान के लिए कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराई गई थी।
अदालत ने माना- पहचान परेड कराना जरूरी था
अदालत ने फैसले में कहा कि इस मामले में आरोपी शिकायतकर्ता और गवाहों के लिए पहले से अज्ञात था। एफआईआर भी अज्ञात चालक के खिलाफ दर्ज हुई थी। आरोपी को घटनास्थल से गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि पुलिस ने बाद में जांच के दौरान उसे आरोपी बनाया। ऐसी स्थिति में उसकी पहचान स्थापित करना अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण था। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के राम किशन मिथनलाल शर्मा बनाम स्टेट ऑफ बॉम्बे मामले में दिए गए सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि पहचान परेड का उद्देश्य गवाहों को अपराध से संबंधित व्यक्ति की पहचान करने का अवसर देना है लेकिन इस मामले में गिरफ्तारी के बाद ऐसी कोई पहचान परेड नहीं कराई गई।