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खेड़ा बॉर्डर किसानों का आंदोलन 156वें दिन भी चला
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रेवाड़ी। कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली-जयपुर हाईवे स्थित खेड़ा बॉर्डर पर आंदोलनकारी किसानों का धरना मंगलवार को 156 वें दिन भी जारी रहा। धरनास्थल पर किसानों ने समूह चर्चा भी की।
संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से डॉ. संजय ने बताया कि कृषि व्यवसाय से जुड़े देशी-विदेशी कॉरपोरेट और पूंजीपतियों के पंजे से देश की कृषि और खाद्य सुरक्षा को बचाने के लिए भारत मे किसानों का अभूतपूर्व संघर्ष एक जन आंदोलन में बदल गया है। इस आंदोलन में लगातार बढ़ती लोगों की भागीदारी और बढ़ते समर्थन का मुख्य कारण जनता में भूमिपुत्रों के प्रति सहानुभूति और प्रेम है। किसानों के अलावा, मजदूरों का एक बड़ा हिस्सा, बटाईदार किसान और भूमिहीन खेत मजदूर, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं, इस संघर्ष का अभिन्न हिस्सा हैं।
वहीं खेड़ा बॉर्डर पर किसानों ने समूह चर्चाओं में हिस्सा लेते हुए कहा कि यह बात तो स्पष्ट है कि इन काले कानूनों के लागू होने से कृषि क्षेत्र में सरकार का समर्थन और मदद और कम हो गई है। किसानों को कृषि सामग्री जैसे बीज, उर्वरक खरीद आदि में सहायता नहीं दी जा रही है। जिससे बीज और उर्वरक महंगा हो गया है। इसका सीधा असर किसानों के साथ-साथ खेत मजदूरों पर पड़ेगा। कृषि के व्यवसायीकरण से अधिक से अधिक मशीनीकरण होगा, जिससे खेत मजदूरों के लिए काम के दिन कम हो जाएंगे। अनुबंध खेती में, निजी कंपनी या कॉरपोरेट की पहली सबसे बड़ी प्राथमिकता लाभ यानि अपना मुनाफा बढ़ाने की होगी और यह सब मजदूरी कम करके व किसानों की उपज को मन माने दाम पर खरीदकर ही किया जा सकता है।
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समूह चर्चाओं में अमराराम, रामकिशन महलावत, राजाराम मील, रणजीत राजू, तारा सिंह सिद्धू बलवीर छिल्लर, हरफूल सिंह, कुलदीप यादव, मदन सिंह यादव, रूड सिंह महला, रघुवीर सिंह, ज्ञानी राजवीर सिंह, महावीर सिंह सरपंच, अनिल भेरा, जय सिंह जनवास, चौधरी फजलुद्दीन,जोगेन्द्र सिंह यादव, कुलदीप मोहनपुर, सोनू, बाबा जैमल सिंह, बाबा सुखदेव सिंह, पृथ्वी सिंह, मौलाना दिलशाद, अमजद भाई, फजरु भाई, साजिद भाई, अब्दुल भाई, प्रहलाद मांडोता, पवन हरीशंकर, नवीन नागौर, सुरेन्द्र खोखर, काला मंडार, लखवीर सिंह, बेअंत सिंह, गुरजीत सिंह, सुनील बिश्नोई, भूपेंद्र सिंह, जगमाल सिंह, हरगोविंद सिंह, जसवीर सिंह, सुखविंदर सिंह, मालीराम,निशा सिद्धू, अजमेर सैनी, विक्रम राठौड़, रामरतन बागड़िया, सुभाष पलडिया तिजारा, सतपाल यादव, राजबाला यादव व जुनैद भाई सहित अन्य शामिल रहे।
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संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से डॉ. संजय ने बताया कि कृषि व्यवसाय से जुड़े देशी-विदेशी कॉरपोरेट और पूंजीपतियों के पंजे से देश की कृषि और खाद्य सुरक्षा को बचाने के लिए भारत मे किसानों का अभूतपूर्व संघर्ष एक जन आंदोलन में बदल गया है। इस आंदोलन में लगातार बढ़ती लोगों की भागीदारी और बढ़ते समर्थन का मुख्य कारण जनता में भूमिपुत्रों के प्रति सहानुभूति और प्रेम है। किसानों के अलावा, मजदूरों का एक बड़ा हिस्सा, बटाईदार किसान और भूमिहीन खेत मजदूर, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं, इस संघर्ष का अभिन्न हिस्सा हैं।
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वहीं खेड़ा बॉर्डर पर किसानों ने समूह चर्चाओं में हिस्सा लेते हुए कहा कि यह बात तो स्पष्ट है कि इन काले कानूनों के लागू होने से कृषि क्षेत्र में सरकार का समर्थन और मदद और कम हो गई है। किसानों को कृषि सामग्री जैसे बीज, उर्वरक खरीद आदि में सहायता नहीं दी जा रही है। जिससे बीज और उर्वरक महंगा हो गया है। इसका सीधा असर किसानों के साथ-साथ खेत मजदूरों पर पड़ेगा। कृषि के व्यवसायीकरण से अधिक से अधिक मशीनीकरण होगा, जिससे खेत मजदूरों के लिए काम के दिन कम हो जाएंगे। अनुबंध खेती में, निजी कंपनी या कॉरपोरेट की पहली सबसे बड़ी प्राथमिकता लाभ यानि अपना मुनाफा बढ़ाने की होगी और यह सब मजदूरी कम करके व किसानों की उपज को मन माने दाम पर खरीदकर ही किया जा सकता है।
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समूह चर्चाओं में अमराराम, रामकिशन महलावत, राजाराम मील, रणजीत राजू, तारा सिंह सिद्धू बलवीर छिल्लर, हरफूल सिंह, कुलदीप यादव, मदन सिंह यादव, रूड सिंह महला, रघुवीर सिंह, ज्ञानी राजवीर सिंह, महावीर सिंह सरपंच, अनिल भेरा, जय सिंह जनवास, चौधरी फजलुद्दीन,जोगेन्द्र सिंह यादव, कुलदीप मोहनपुर, सोनू, बाबा जैमल सिंह, बाबा सुखदेव सिंह, पृथ्वी सिंह, मौलाना दिलशाद, अमजद भाई, फजरु भाई, साजिद भाई, अब्दुल भाई, प्रहलाद मांडोता, पवन हरीशंकर, नवीन नागौर, सुरेन्द्र खोखर, काला मंडार, लखवीर सिंह, बेअंत सिंह, गुरजीत सिंह, सुनील बिश्नोई, भूपेंद्र सिंह, जगमाल सिंह, हरगोविंद सिंह, जसवीर सिंह, सुखविंदर सिंह, मालीराम,निशा सिद्धू, अजमेर सैनी, विक्रम राठौड़, रामरतन बागड़िया, सुभाष पलडिया तिजारा, सतपाल यादव, राजबाला यादव व जुनैद भाई सहित अन्य शामिल रहे।