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कारगिल युद्ध : अहीरवाल के दो वीर रणबांकुरों का नाम आज भी जीवंत

Mon, 25 Jul 2022 10:09 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Mon, 25 Jul 2022 10:09 PM IST
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Kargil War: The names of the two brave warriors of Ahirwal are still alive
शहीद सुखबीर सिंह का फाइल फोटो। - फोटो : Rewari
रेवाड़ी/कोसली। अहीरवाल क्षेत्र स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए जूझने वाले रणबांकुरे की महान भूमि रहा है। क्षेत्र की सैन्य परंपरा पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि आजादी से पहले प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर आजादी के बाद 1962, 1965, 1971 के युद्ध में क्षेत्र के वीरों की वीरता की कहानी अवर्णनीय है। 1999 में हुए कारगिल युद्ध में भी यहां के वीरों ने अपनी कुर्बानी देकर केवल देश का ही नाम रोशन नहीं किया अपितु अहीरवाल क्षेत्र जो सैनिकों की खान के नाम से देश भर में जानी जाती है। उसके वीर सपूतों ने कारगिल युद्ध में भी अपना जौहर दिखाया। इन रणबांकुरों में गांव धामलावास निवासी सुखबीर सिंह यादव और गांव रतनथल बास के सूबेदार रामनिवास रेवाड़ी के भी शामिल हैं। इनकी शहादत को कभी नहीं भुलाया जा सकता। आज भी जब गांवों में इनका नाम लिया जाता है तो गर्व से सीना फूल जाता है।
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कारगिल के प्रथम शहीद थे सुखबीर सिंह
जिले के गांव धामलावास निवासी सुखबीर सिंह यादव सन 1986 में बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स की 171 बटालियन में बतौर असिस्टेंट कमांडेंट भर्ती हुए। इनके पिता रघुबीर सिंह भी कैप्टन थे। सुखबीर ने देश की सीमा से सटे लगभग सभी राज्यों में अपनी बेहतरीन सेवाओं का प्रदर्शन किया। वहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड मानेसर में भी 6 वर्ष बतौर स्पेशल कमांडो उन्होंने अपनी सेवाएं दी। सन 1999 में भारत-पाक के बीच सीमा पर गहमा-गहमी का माहौल बढ़ता देख उन्हें कारगिल सीमा पर भेज दिया गया। 26 मई 1999 को वे अपने 6 जवानों के साथ कारगिल सीमा स्थित अल्फा टीकरी कॉम्पलेक्स एडम बेस 26 पर अन्य जवानों व स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले थे, जबकि यह काम पेट्रोलिंग पार्टी के अफसर का था, लेकिन उन्हें कुछ गोलीबारी होने का आभास हुआ। इसीलिए वे तुरंत अपने जवानों की पोजिशन देखने के लिए बेस कैंप के लिए अपनी जीप में रवाना हुए। जैसे ही वे सीमा स्थित करकितचु नाले के समीप पहुंचे तो बॉर्डर पार चुके दुश्मनों ने पूरी टीम पर तोप से गोरीबारी शुरू कर दी। जवाब में कमांडेंट सुखबीर सिंह व उनके जवानों ने दुश्मनों का मुंह तोड़ जवाब दिया तथा आखिरी दम तक लड़ते रहे। अंत में कमांडेंट सुखबीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए व कारगिल विजय ऑपरेशन के प्रथम शहीद कहलाए।
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धामलावास में जन्मा था वीर सपूत
गांव धामलावास में 12 दिसंबर 1961 को पैदा हुए सुखबीर सिंह को वीरता के गुण पिता रघुवीर सिंह से मिले थे। पैतृक गांव धामलावास से प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद सुखबीर ने स्नातकोत्तर की शिक्षा हिसार से प्राप्त की थी। उनकी भावना को देखते हुए उनके पिता ने उन्हें सीमा सुरक्षा बल में भर्ती होने के लिए कहा। उन्होंने अगस्त 1986 में बीएसएफ में कमीशन प्राप्त किया। एक वर्ष के कड़े प्रशिक्षण के बाद वे डिप्टी कमाडेंट के पद पर तैनात हुए। वर्ष 1987 में उनकी पहली नियुक्ति जम्मू-कश्मीर में हुई, जहा उन्होंने कई आतंकियों का सफाया किया। इसके लिए उन्हें सेवा मेडल दिया गया।
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1988 में उन्हें आतंकवाद से ग्रस्त पंजाब भेज दिया गया, जहां बहादुरी से मुकाबला करने के कारण वे उनकी हिट लिस्ट में आ गए। वर्ष 1990 में उनकी नियुक्ति फिर से जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में कर दी गई। इस बीच वर्ष 1992 में सुखबीर का चयन एनएसजी मानेसर के लिए कर दिया गया। वर्ष 1999 में उन्हें फिर से जम्मू-कश्मीर में तैनात किया गया, लेकिन यह उनका अंतिम सफर था।
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सांसद रह चुकी हैं शहीद सुखबीर सिंह की पत्नी
शहीद सुखबीर सिंह की पत्नी सुधा यादव सांसद रह चुकी हैं तथा भाजपा की वरिष्ठ नेता हैं। वह आज भी पति की गाथा का जिक्र होते ही भावुक हो जाती हैं। डॉ. सुधा यादव बेटे व बेटी के साथ जीवन यापन कर रही हैं। जहां एक ओर वे अपनी पति की शहादत पर शान से सिर ऊंचा करती हैं, वहीं नम आंखों से उनकी कमी को भी महसूस करती है।
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सुखबीर सिंह की शहादत से प्रदेशभर में बनी गांव धामलावास की अलग पहचान
गांव धामलावास के ग्रामीण व पूर्व सांसद डॉ. सुधा यादव ने कारगिल विजय के पहले हीरो उप कमांडेंट सुखबीर सिंह की स्मृति को हर पर जीवंत रखने के लिए गांव की मुख्य सड़क और मुख्य द्वार का नामकरण अमर शहीद सुखबीर सिंह के नाम से किया गया था। जो हाईवे नंबर-11 को बनाते समय तोड़ दिया गया। अभी इसका दोबारा से बनाने का कार्य जारी है। गांव में जोहड़ के समीप उनकी भव्य स्मारक भी बनवाई हुई है। उनकी पुण्यातिथि पर नेता-मंत्री व तमाम प्रशासनिक अधिकारी कारगिल हीरो को श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं। आज प्रदेश स्तर पर यदि धामलावास गांव की पहचान बनी है, तो उसके पीछे केवल उप कमांडेंट सुखबीर सिंह की शहादत है।
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सूबेदार रामनिवास कारगिल में दुश्मनों से लोहा लेते हुए थे शहीद
वीरांगना फूलवती बोलीं-पति की शहादत के बाद सरकार की ओर से नहीं मिली कोई सुविधा, उन्हें राष्ट्रीय पर्व का न्योता तक नहीं भेजा जाता
संवाद न्यूज एजेंसी
रेवाड़ी। गांव रतनथल बास के सूबेदार रामनिवास कारगिल युद्ध के शहीदों में शामिल हैं। उनकी पत्नी वीरांगना फूलवती ने बताया कि उनके पति 23 ग्रेनेडियर में सैनिक भर्ती हुए थे। वे 1999 में कारगिल युद्ध में दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। दो बेटी व एक बेटे की मां फूलवती बताती हैं कि उन्हें पति के खोने का गम तो जरूर है, मगर खुशी इस बात की है कि पति रामनिवास ने गोली पीठ पर नहीं छाती पर खाई थी। विरांगना का कहना है कि सरकार की ओर से उन्हें कोई सुविधा आज तक नहीं मिली। शहादत के समय तो सरकार लंबे-चौड़े वादे करती नहीं थक रही थी। उन्हें कोई सुविधा देना तो दूर यहां तक कि उन्हें तो स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर भी प्रशासन की ओर से कोई भी निमंत्रण तक देने की जहमत नहीं उठाता।
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पत्नी ने याद में बनवाया स्मारक
कारगिल हीरो सूबेदार रामनिवास की याद में पत्नी फूलवती ने उनकी याद में गांव में एक स्मारक बनवाया था। आज स्मारक के पास से गुजरने वाला हर व्यक्ति शहीद रामनिवास की शहादत को याद करता है। गांव के युवा उन्हें अपना प्रेरक मानते हैं और सूबेदार की तरह ही देशसेवा का संकल्प लिए बैठे हैं। घर का भरण-पोषण पेंशन के सहारे ही होता है। बेटे भूपेंद्र खेती-बाड़ी कर घर का गुजारा कर रहा है।

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विजय दिवस को लेकर कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मिटने वालों का यही निशा होगा शहीदों के सम्मान में लिखी गई यह पंक्तियां बेशक शहीदों की पुण्यतिथि मनाने को प्रेरित करती हैं, मगर बड़े खेद का विषय है कि वीरों की भूमि रही। कोसली उपमंडल या जिला प्रशासन की तरफ से 26 जुलाई को कारगिल युद्ध की याद में मनाए जाने वाले विजय दिवस को लेकर कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जा रहा है। सबसे बड़ी विडंबना तो यह रही कि प्रशासन से लेकर सैनिक बोर्ड तक शहीदों को सम्मान देने की बात तो दूर की बात है। शहीदों के परिजनों को 23 साल बाद भी किसी हाल में जानने की जहमत तक नहीं उठा पाए।

 कारगिल हीरो सूबेदार रामनिवास का फाइल फोटो।

कारगिल हीरो सूबेदार रामनिवास का फाइल फोटो।- फोटो : Rewari

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