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Rewari News: नेता जी से मिलने की चाह में अंग्रेजी सेना में भर्ती हुए थे हरि सिंह
Thu, 10 Aug 2023 12:12 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Thu, 10 Aug 2023 12:12 AM IST
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हरिसिंह, स्वतंत्रता सेनानी।
कोसली। गांव भूरथला निवासी करीब 104 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी हरि सिंह ने कहा कि आज देश भले ही आजाद है, लेकिन सही मायने में आजादी न मिलने का मलाल उनके दिल में है। आजाद हिंद फौज के सेनानी रहे हरिसिंह के मन में देशभक्ति का जुनून इतना गहरा था कि सातवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान वे देश को आजाद कराने के लिए संघर्ष में कूद पड़े थे। गांव के युवाओं को आजादी के किस्से सुनाते हुए आज भी उनकी बाजूएं फड़कने लगती है।
गांव भुरथला के कांशीराम नंबरदार के घर में सात दिसंबर 1918 को जन्में हरि सिंह बताते हैं कि वह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से मिलने की चाहत में अंग्रेजी सेना में वर्ष 1935 में भर्ती हुए। इसके बाद उन्हें रोहतक के पास आसोदा कैंप में रखा गया। वहां से उन्हें अंडमान निकोबार भेज दिया गया। वर्ष 1940 के विश्वयुद्ध में जर्मनी की सेना की ओर से लड़ाई लड़ने के लिए भेज दिया गया था। वहां करीब पांच साल तक उन्हें भूखे-प्यासे रखा गया।
हरिसिंह ने बताया कि जब नेताजी को इसके बारे में जानकारी हुई तो उन्होंने करीब 2000 सैनिकों को मुक्त कराया। उसके बाद वर्ष 1945 तक सुभाष चंद्र बोस के साथ कार्य किया।
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नेताजी ने कहा था कि लड़ नहीं सकते तो भाग जाओ
हरिसिंह ने बताया कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने नारा दिया था कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। वे बताते हैं कि उसे दो बार नेताजी से मिलने मौका मिला। वह हमेशा यही कहते थे कि जो देश के लिए लड़ नहीं सकता वह भाग जाए।
देश आजाद होने के बाद पंजाब पुलिस में हुए भर्ती
देश के आजाद होने के बाद वह पंजाब पुलिस में भर्ती हुए, लेकिन पंजाब से हिमाचल अलग राज्य बनने पर उन्हें हिमाचल पुलिस में भेज दिया गया, जहां से वर्ष 1980 में सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्त होने बाद गांव के नंबरदार बने हरिसिंह को एक बेटा एवं चार बेटियां है।
स्वतंत्रता व गणतंत्र दिवस पर प्रशासन करता है याद
हरिसिंह का कहना है कि देश के राजनेताओं व अधिकारियों ने उनके जैसे आजादी के सिपाहियों को लगभग अनदेखा कर दिया है। वर्तमान समय में भले ही सरकार उन्हें सुख सुविधाओं के लिए पेंशन दे रही है, लेकिन अधिकारियों के मन में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कोई सम्मान नहीं है। प्रशासन की तरफ से 15 अगस्त व 26 जनवरी को ही याद किया जाता है।
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गांव भुरथला के कांशीराम नंबरदार के घर में सात दिसंबर 1918 को जन्में हरि सिंह बताते हैं कि वह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से मिलने की चाहत में अंग्रेजी सेना में वर्ष 1935 में भर्ती हुए। इसके बाद उन्हें रोहतक के पास आसोदा कैंप में रखा गया। वहां से उन्हें अंडमान निकोबार भेज दिया गया। वर्ष 1940 के विश्वयुद्ध में जर्मनी की सेना की ओर से लड़ाई लड़ने के लिए भेज दिया गया था। वहां करीब पांच साल तक उन्हें भूखे-प्यासे रखा गया।
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हरिसिंह ने बताया कि जब नेताजी को इसके बारे में जानकारी हुई तो उन्होंने करीब 2000 सैनिकों को मुक्त कराया। उसके बाद वर्ष 1945 तक सुभाष चंद्र बोस के साथ कार्य किया।
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नेताजी ने कहा था कि लड़ नहीं सकते तो भाग जाओ
हरिसिंह ने बताया कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने नारा दिया था कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। वे बताते हैं कि उसे दो बार नेताजी से मिलने मौका मिला। वह हमेशा यही कहते थे कि जो देश के लिए लड़ नहीं सकता वह भाग जाए।
देश आजाद होने के बाद पंजाब पुलिस में हुए भर्ती
देश के आजाद होने के बाद वह पंजाब पुलिस में भर्ती हुए, लेकिन पंजाब से हिमाचल अलग राज्य बनने पर उन्हें हिमाचल पुलिस में भेज दिया गया, जहां से वर्ष 1980 में सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्त होने बाद गांव के नंबरदार बने हरिसिंह को एक बेटा एवं चार बेटियां है।
स्वतंत्रता व गणतंत्र दिवस पर प्रशासन करता है याद
हरिसिंह का कहना है कि देश के राजनेताओं व अधिकारियों ने उनके जैसे आजादी के सिपाहियों को लगभग अनदेखा कर दिया है। वर्तमान समय में भले ही सरकार उन्हें सुख सुविधाओं के लिए पेंशन दे रही है, लेकिन अधिकारियों के मन में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कोई सम्मान नहीं है। प्रशासन की तरफ से 15 अगस्त व 26 जनवरी को ही याद किया जाता है।