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अहंकार साधना में सबसे बड़ी बाधा, इससे पतन निश्चित : बाबा उमाकांत
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बाबा उमाकांत महाराज सत्संग सुनाते। स्रोत : संस्था
बावल। कस्बा मे संत बाबा उमाकांत महाराज ने सत्संग में कहा कि इंसान को किसी भी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए। अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता है और उसका नामोनिशान तक मिटा सकता है। उन्होंने कहा कि काम, क्रोध, लोभ और मोह पर विजय प्राप्त करने के बाद भी यदि अहंकार नहीं गया तो साधक आध्यात्मिक मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता।
बाबा उमाकांत महाराज ने कहा कि साधना के दौरान यदि व्यक्ति को अपनी उपलब्धियों का अहंकार हो जाए तो वह ऊंचाई से नीचे गिर सकता है। इसलिए अहंकार को परछाई की तरह समझना चाहिए। उन्होंने कहा माया छाया एक सी, बिरला जाने कोई, भगता के पीछे फिरे, सम्मुख भागे सोई।
उन्होंने समझाया कि माया से ही काम, क्रोध, लोभ और अहंकार जैसी प्रवृत्तियां पैदा होती हैं। व्यक्ति यदि माया को पाने के पीछे भागता रहेगा तो वह उससे दूर होती जाएगी। इसके विपरीत यदि वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहे और अपना आचरण व खान-पान सही रखे तथा चरित्रवान बने तो लोग भी उसे पसंद करते हैं।
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उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे परछाई को पकड़ने की कोशिश करने पर वह आगे खिसकती जाती है, उसी प्रकार माया के पीछे भागने से वह हाथ नहीं आती। व्यक्ति यदि अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर आगे बढ़ता रहे तो माया स्वयं उसके पीछे चलती है और आवश्यकता के समय उसका सहयोग करती है।
उन्होंने कहा कि साधक को विनम्रता, संयम और अच्छे आचरण को जीवन का आधार बनाकर आगे बढ़ना चाहिए।
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बाबा उमाकांत महाराज ने कहा कि साधना के दौरान यदि व्यक्ति को अपनी उपलब्धियों का अहंकार हो जाए तो वह ऊंचाई से नीचे गिर सकता है। इसलिए अहंकार को परछाई की तरह समझना चाहिए। उन्होंने कहा माया छाया एक सी, बिरला जाने कोई, भगता के पीछे फिरे, सम्मुख भागे सोई।
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उन्होंने समझाया कि माया से ही काम, क्रोध, लोभ और अहंकार जैसी प्रवृत्तियां पैदा होती हैं। व्यक्ति यदि माया को पाने के पीछे भागता रहेगा तो वह उससे दूर होती जाएगी। इसके विपरीत यदि वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहे और अपना आचरण व खान-पान सही रखे तथा चरित्रवान बने तो लोग भी उसे पसंद करते हैं।
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उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे परछाई को पकड़ने की कोशिश करने पर वह आगे खिसकती जाती है, उसी प्रकार माया के पीछे भागने से वह हाथ नहीं आती। व्यक्ति यदि अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर आगे बढ़ता रहे तो माया स्वयं उसके पीछे चलती है और आवश्यकता के समय उसका सहयोग करती है।
उन्होंने कहा कि साधक को विनम्रता, संयम और अच्छे आचरण को जीवन का आधार बनाकर आगे बढ़ना चाहिए।