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Rewari News: छठ पर सूर्य की उपासना में लीन रहेंगे श्रद्धालु, तैयारी जोरों पर
Mon, 13 Nov 2023 11:50 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Mon, 13 Nov 2023 11:50 PM IST
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रेवाड़ी। दीपावली के बाद अब महाछठ पर्व की तैयारी शुरू हो चुकी है। इस दौरान श्रद्धालु सूर्य की उपासना में लीन रहेंगे। तीन दिनों तक चलने वाला पर्व 17 नवंबर से नहाय खाय के साथ शुरू होगा। तीन दिन तक लगातार व्रत करने के बाद चौथे दिन सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही व्रत का पारायण किया जाता है। श्रद्धालुओं ने बताया कि सूर्य की पूजा अर्चना से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
पर्व को लेकर शहर के सेक्टर एक स्थित सोलहराही तालाब परिसर में विशेष इंतजाम किए गए हैं। इसके लिए व्रती व्यक्तियों का विशेष स्वागत किया जाएगा तथा उनके लिए कृत्रिम जल तालाब बनाया गया है, जिसमें खड़े होकर व्रत करने वाले लोग सूर्यदेव को अपना अर्घ्य देंगे। पूर्वांचल सेवा समिति के अध्यक्ष रामाधार शर्मा ने बताया कि इसके लिए विशेष तैयारी की गई है। सोलहराही तालाब को विशेष रूप से सजाया जाएगा। दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं को रुकने की भी व्यवस्था की गई है। साथ ही रात में छठ मैया का जागरण भी किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि छठ की शुरुआत शुक्रवार सुबह से की जाएगी। इस दिन व्रती सुबह के समय लौकी की सब्जी, चने की दाल व चावल ग्रहण कर पूरे दिन व्रत रखते हैं। अगले दिन शनिवार को खरना के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन उपवास रखकर व्रती शाम के समय खीर और रोटी खाकर अगले दिन यानी रविवार शाम तक सूर्यास्त के समय जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसके बाद अगले दिन सुबह यानि सोमवार को सूर्य को अर्घ्य देककर व्रत का पारण करते हैं। इस दौरान व्रती लोग सूर्य को अर्घ्य देने के लिए फल, फूल, मूली, गन्ना, बड़ा नींबू, अनानास, सिंघाड़ा, मीठा पकवान (ठेकुआ) आदि सामान सूप में रखकर अपनी मनोकामना के अनुसार सूर्य की उपासना करते हैं। मान्यता के अनुसार ही पात्र का भी चयन करते हैं, जैसे कुछ लोग सूप पर सामान रखकर सूर्य को जल अर्पण करते हैं तो कुछ लोग पीतल के बर्तन में समान लगाकर सूर्य को अर्घ्य अर्पण करते हैं।
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छठ व्रत के बारे में कई मान्यताएं : राधा देवी
पिछले लगातार 30 साल से व्रत करने वाली पुराना हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी निवासी 52 वर्षीय राधा देवी बताती हैं कि उन्होंने यह व्रत अपनी मर्जी से शुरू किया है। उनके अनुसार ऐसी मान्यता है कि सच्ची निष्ठा व श्रद्धा से छठ मैया की पूजा करने पर उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। उनका मानना है कि परिवार में जो लोग भी व्रत करते हैं और स्वास्थ्य के चलते व्रत को आगे नहीं रख पाते तो वह यह व्रत परिवार के किसी और सदस्य को दे देते हैं। परिवार का वही सदस्य आगे की इस परंपरा को निभाते हैं।
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पर्व को लेकर शहर के सेक्टर एक स्थित सोलहराही तालाब परिसर में विशेष इंतजाम किए गए हैं। इसके लिए व्रती व्यक्तियों का विशेष स्वागत किया जाएगा तथा उनके लिए कृत्रिम जल तालाब बनाया गया है, जिसमें खड़े होकर व्रत करने वाले लोग सूर्यदेव को अपना अर्घ्य देंगे। पूर्वांचल सेवा समिति के अध्यक्ष रामाधार शर्मा ने बताया कि इसके लिए विशेष तैयारी की गई है। सोलहराही तालाब को विशेष रूप से सजाया जाएगा। दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं को रुकने की भी व्यवस्था की गई है। साथ ही रात में छठ मैया का जागरण भी किया जाएगा।
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उन्होंने बताया कि छठ की शुरुआत शुक्रवार सुबह से की जाएगी। इस दिन व्रती सुबह के समय लौकी की सब्जी, चने की दाल व चावल ग्रहण कर पूरे दिन व्रत रखते हैं। अगले दिन शनिवार को खरना के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन उपवास रखकर व्रती शाम के समय खीर और रोटी खाकर अगले दिन यानी रविवार शाम तक सूर्यास्त के समय जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसके बाद अगले दिन सुबह यानि सोमवार को सूर्य को अर्घ्य देककर व्रत का पारण करते हैं। इस दौरान व्रती लोग सूर्य को अर्घ्य देने के लिए फल, फूल, मूली, गन्ना, बड़ा नींबू, अनानास, सिंघाड़ा, मीठा पकवान (ठेकुआ) आदि सामान सूप में रखकर अपनी मनोकामना के अनुसार सूर्य की उपासना करते हैं। मान्यता के अनुसार ही पात्र का भी चयन करते हैं, जैसे कुछ लोग सूप पर सामान रखकर सूर्य को जल अर्पण करते हैं तो कुछ लोग पीतल के बर्तन में समान लगाकर सूर्य को अर्घ्य अर्पण करते हैं।
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छठ व्रत के बारे में कई मान्यताएं : राधा देवी
पिछले लगातार 30 साल से व्रत करने वाली पुराना हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी निवासी 52 वर्षीय राधा देवी बताती हैं कि उन्होंने यह व्रत अपनी मर्जी से शुरू किया है। उनके अनुसार ऐसी मान्यता है कि सच्ची निष्ठा व श्रद्धा से छठ मैया की पूजा करने पर उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। उनका मानना है कि परिवार में जो लोग भी व्रत करते हैं और स्वास्थ्य के चलते व्रत को आगे नहीं रख पाते तो वह यह व्रत परिवार के किसी और सदस्य को दे देते हैं। परिवार का वही सदस्य आगे की इस परंपरा को निभाते हैं।