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Rewari News: फसल बर्बाद कर रहे बेसहारा पशु, किसान रातभर जागकर कर रहे हैं रखवाली

Fri, 09 Dec 2022 11:39 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Fri, 09 Dec 2022 11:39 PM IST
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Destitute animals ruining crops, farmers are keeping awake all night
बावल क्षेत्र के एक गांव के खेत में घूमते बेसहारा पशु। संवाद - फोटो : Rewari
रेवाड़ी। बेसहारा पशुओं की समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ग्रामीण इलाकों के किसान इन पशुओं से अपनी फसल बचाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। मगर किसी एक रात की जरा सी चूक उनकी सारी मेहनत चौपट कर देती है और सुबह खेत में फसल की जगह तबाही का मंजर दिखता है। इस समस्या को अपने-अपने स्तर पर निपटने की जुगत में किसान सर्द रैन में जागकर फसलों की रखवाली करने को विवश हैं।
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हरचंदपुर, कालड़ावास, सुलखा, खरखड़ी, नैचाना, करनावास, सुठानी, भाड़ावास गांव के किसान बेसहारा पशुओं को अपने खेत से हांकते हुए दूर तक छोड़ आते हैं फिर दूसरे तरफ के किसान उन्हें दोबारा उसी तरफ मोड़ देते हैं। यह महज एक दिन की बात नहीं है। क्रम लगातार चलता रहता है। बेसहारा पशुओं का झुंड दिन में तो बणी (खाली जंगल) में जमा रहता है और दिन डूबते ही खेतों की आरे रुख करता है। फसल इनके चलते बर्बाद हो रही है। जिले में गोशालाएं भी बनी हैं। इसके बावजूद भी बेसहारा गोवंश किसानों के लिए परेशानी बना हुआ है।
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बता दें कि रबि के सीजन में जिले में करीब 35 हजार हेक्टेयर में गेहूं व 70 हजार हेक्टेयर में सरसों की बिजाई की हुई है। इस समय रबि की फसल की पैदावार बहुत अच्छी है, लेकिन इन आवारा गाय व नीलगाय से फसल बर्बाद होने से किसान परेशान हैं। किसानों ने अपने खेतों की सुरक्षा के लिए खेतों के किनारों पर लोहे के तार व जालियां भी लगा रखे हैं, लेकिन खुले में घूम रहे जानवर उन्हें तोड़कर खेतों में घुस जाते हैं।
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किसानों ने बताया कि गांव में लोग गाय तो रखते हैं, लेकिन बछड़ों को खुला छोड़ देते हैं। इस समय सैकड़ों गाय, बैल और बछड़े खुलेआम घूम रहे हैं। नीलगाय के झुंड खुलेआम खेतों में खा रहे हैं। जो आए दिन लोगों के खेतों में घुसकर फसल को नष्ट कर रहे हैं। झुंड के रूप में घूम रहे बेसहारा मवेशियों ने सुख-चैन छीन लिया है। पशुओं से खेतों में खड़ी सरसों,गेहूं आदि फसलों को बचाने के लिए किसान हर जुगत करके हार चुके हैं लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही है। स्थायी हल नहीं निकलने से अन्नदाताओं में बेचैनी है। खेतों में खड़ी सरसों व गेंहू की फसल को पशु चट कर रहे है और इनकी रोकथाम के लिए कोई स्थायी हल नहीं निकल पा रहा है। किसान अपने गुस्से से बर्बाद हो रही फसल को बचाने के लिए कई बार प्रशासन से मिलकर सामधान करवाने की मांग कर चुके हैं।
गांव में लोग गाय तो रख लेते है, किंतु उनके बछड़ो को गौशाला में छोड़ने की बजाय गांव में छोड़ देते हैं। इसके अलावा नील गांयों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है, जो खेतों में जाकर फसलों को बर्बाद कर रहे है। अवारा पशुओं की संख्या बहुत अधिक हो रही है। इनको गौशाला में छुड़वाने के लिए प्रशासन को शिकायत देने के बाद कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।
-भीमसिंह, किसान
खेतों में खड़ी गेहूं व सरसों की फसल को आवारा पशुओं के साथ नीलगाय भी बर्बाद कर रही है। यह सभी एक झुंड में चलती है, जिस खेत में घुस जाती है उसका सफाया करके ही बाहर निकलती है। खेत नुकीले कांटेदार तार व लोहे की जालियां लगाने के बाद भी उनको तोड़कर खेतों में घुस रहे है। जिससे सारी फसल को नुकसान पहुंचा रहे है।
-रिंकू कटारिया, किसान
जिले में गोशालाओं की व्यवस्था
जिले में धारूहेड़ा, सांजरपुर, बगथला व जाटूसाना सहित चार गोशालाएं, जिनमें बेसहारा गोवंश को रखा जाता है। लेकिन यहां गोवंश को गांवों में पकड़कर नहीं लाया जाता बल्कि किसान स्वयं यहां गोवंश को छोड़कर जा सकते हैं। इसके साथ ही किसान को चारे के लिए भी सुविधानुसार व्यवस्था करनी पड़ती है। हालंाकि इन गौशालाओं में भी गोवंश की भरमार है। जिले में सबसे बड़ी बात यह है कि बिना दूध देने वाले गोवंश को पशुमालिक सुने छोड़ देते हैं। जो फसलों में नुकसान पहुंचाते हैं।
गोवंश बन रहा हादसों का कारण
शहर की सड़कों पर गोवंश का कब्जा है। इससे जहां सड़क हादसों का ग्राफ बढ़ रहा है, वहीं जाम की समस्स्या भी आम हो गई है। रात के समय तो सड़कों पर झुंड बैठे रहते हैं। रोजाना हो रही दुर्घटनाओं के चलते सड़कें खून से लाल हो रही हैं। इस बारे में कई बार आवाज उठा चुके हैं, लेकिन कोई प्रबंध नहीं किया जा रहा है। अंधेरा होते ही बेसहारा गोवंश की संख्या सड़कों पर बढ़ने लगती है। ज्यादातर काले रंग के सांड़ हादसों का कारण बन रहे हैं। रोजाना छह से सात लोग इन दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं।

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बेसहारा पशुओं को पंचायत स्तर पर गोशालाओं में छुड़वा दिया जाता है। गांवों से अगर कोई शिकायत आती है तो प्रशासन की ओर समाधान की दिशा में कदम उठाया जाएगा।
-एचपी बंसल, डीडीपीओ
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