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लोकनाट्य की अवधारणा लोक संस्कृति पर आधारित : प्रो. प्रतिभा
Sat, 22 Feb 2025 11:57 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Sat, 22 Feb 2025 11:57 PM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुंड। गांव पाली स्थित राजकीय महिला महाविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के दूसरे दिन कला, कलाकृति और कलाकार उत्तर भारतीय लोकनाट्य की सामाजिक एवं ऐतिहासिक विवेचना चर्चा की गई। प्रो. प्रतिभा ने कहा कि लोकनाट्य की अवधारणा लोक संस्कृति और परंपराओं पर आधारित है।
उन्होंने राजस्थान के लोकनाट्य रम्मत के बारे में बताया कि यह लोकनाट्य राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर और फलौदी क्षेत्र में किया जाता है, इसमें संगीत नृत्य अभिनय और प्रदर्शन का समावेश होता है लोकनाट्य की अवधारणा लोक संस्कृति और परंपराओं पर आधारित है। प्रोफेसर अमोद कुमार राय ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के लोकनाट्य और कलाकारों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि लोकनाट्य सामाजिक और धार्मिक अवसरों के दौरान ग्रामीण क्षेत्र में रंगमंच के माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण तथा धारणाओं को दर्शाते हैं। जेएनयू के प्रोफेसर सुधीर आर्य ने कहा कि सृजनात्मक केवल एक व्यक्तिगत प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सृजनकर्ता, माध्यम, सांस्कृतिक संदर्भ के बीच निरंतर संवाद का एक परिणाम होता है।
दादा लक्ष्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट की रजिस्टर डॉक्टर गुंजन मलिक ने कहा कि इस तरीके के आयोजन न केवल शोध और शिक्षा का हिस्सा है बल्कि समाज को एकता और सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूक करने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। संचालन डॉक्टर ज्योति यादव ने किया।
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कुंड। गांव पाली स्थित राजकीय महिला महाविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के दूसरे दिन कला, कलाकृति और कलाकार उत्तर भारतीय लोकनाट्य की सामाजिक एवं ऐतिहासिक विवेचना चर्चा की गई। प्रो. प्रतिभा ने कहा कि लोकनाट्य की अवधारणा लोक संस्कृति और परंपराओं पर आधारित है।
उन्होंने राजस्थान के लोकनाट्य रम्मत के बारे में बताया कि यह लोकनाट्य राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर और फलौदी क्षेत्र में किया जाता है, इसमें संगीत नृत्य अभिनय और प्रदर्शन का समावेश होता है लोकनाट्य की अवधारणा लोक संस्कृति और परंपराओं पर आधारित है। प्रोफेसर अमोद कुमार राय ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के लोकनाट्य और कलाकारों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि लोकनाट्य सामाजिक और धार्मिक अवसरों के दौरान ग्रामीण क्षेत्र में रंगमंच के माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण तथा धारणाओं को दर्शाते हैं। जेएनयू के प्रोफेसर सुधीर आर्य ने कहा कि सृजनात्मक केवल एक व्यक्तिगत प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सृजनकर्ता, माध्यम, सांस्कृतिक संदर्भ के बीच निरंतर संवाद का एक परिणाम होता है।
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दादा लक्ष्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट की रजिस्टर डॉक्टर गुंजन मलिक ने कहा कि इस तरीके के आयोजन न केवल शोध और शिक्षा का हिस्सा है बल्कि समाज को एकता और सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूक करने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। संचालन डॉक्टर ज्योति यादव ने किया।
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