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Rewari News: अरावली की गोद में पल रहा दुर्लभ पक्षियों का कुनबा
Thu, 19 Dec 2024 11:55 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Thu, 19 Dec 2024 11:55 PM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
रेवाड़ी। अरावली वन क्षेत्र जैव विविधता का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। इसकी गोद में पक्षियों का कुनबा तेजी से बढ़ रहा है। अब यहां पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियां देखने को मिल रही हैं।
अरावली पहाड़ी की गोद में बसे गांव पाड़ला, अहरोद, बासदूधा, खोल, मनेठी, भालखी, माजरा, नांधा, बलवाड़ी व खालेटा के जंगल आपस में जुड़े हुए हैं। इन दस गांवों का जंगल बेहद सघन है, जहां की आबोहवा जीव जंतुओं के लिए भी बेहतरीन है। इन घने जंगलों में पक्षियों की बहुत सी प्रजातियां देखने हैं जो पहले कभी यहां नजर नहीं आई थी। कुछ पक्षी प्रेमी जब इन जंगलों में घुसे तो उनको वहां पर सफेद नेप्ड टिट, भारतीय चित्तीदार लता, सफेद पेट वाला मिनीवेट, ओरिएंटल स्कूप उल्लू, शार्ट टेड स्नैक ईगल जैसे पक्षी नजर आए।
व्हाइट नेप्ड टिट : यह पक्षी मुख्य रूप से अरावली वनों में पाई जाती है। अरावली के जंगलों में कांटेदार वनस्पतियां पाई जाती हैं। वाइट-नेप्ड टिट को एक संवेदनशील प्रजाति के रूप में दर्ज किया है। इसके प्राकृतिक आवास नष्ट होने के कारण इस प्रजाति के अस्तित्व पर खतरा है। इसे बचाने के लिए कांटेदार वनस्पतियों के संरक्षण के अलावा, मृत पेड़ों के संरक्षण की भी आवश्यकता है।
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शार्ट टेड स्नैक ईगल : शार्ट टेड स्नैक ईगल जो अपने चूजों को केवल सांप मारकर खिलाता है। इसके घोंसले और चूजे यहां पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर देखने के लिए मिले हैं। पर्यावरणविदों के अनुसार इन पक्षियों का यहां मिलना स्पष्ट संकेत दे रहा है कि इस जंगल का वातावरण उनके अनुकूल है और यहां पारिस्थितिकी तंत्र भी धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है।
भारतीय चित्तीदार लता : भारतीय चित्तीदार लता एक छोटा पक्षी है जिसके पंख संगमरमर जैसे काले और सफ़ेद रंग के होते हैं। यह खुले पर्णपाती जंगलों, आम के बागों और शुष्क झाड़ियों में पाए जाते हैं। यह चारागाह के लिए गहरी दरार वाली छाल वाले परिपक्व पेड़ों को पसंद करता है। यह अकेले या जोड़े में देखा जाता है, लेकिन गैर-प्रजनन के मौसम में छोटे झुंडों में भी देखा जा सकता है। यह प्रवास नहीं करता है। पक्षी की यह प्रजाति अरावली की पहाड़ियों में मौजूद है।
ओरिएंटल स्कूप उल्लू
स्कॉप्स उल्लू 23-25 सेमी (9.1-9.8 इंच) का छोटा उल्लू है, हालांकि यह स्कॉप्स उल्लुओं में में से एक है। अन्य स्कोप्स उल्लुओं की तरह, इसके सिर पर छोटे गुच्छे या कान होते हैं। ऊपरी हिस्से भूरे या भूरे रंग के होते हैं, जो रूप पर निर्भर करता है। नीचे के हिस्से बारीक गहरे रंग की धारियों वाले भूरे रंग के हैं। चेहरे की डिस्क सफ़ेद या भूरे रंग की होती है, और आंखें नारंगी या भूरे रंग की होती हैं। एक बफ़ नेकबैंड है। लिंग समान है। यह प्रजाति थोड़े बड़े आंशिक रूप से प्रवासी कॉलर वाले स्कॉप्स उल्लू (ओटस लेटिया) और ओरिएंटल स्कॉप्स उल्लू (ओटस सुनिया) के समान है। इन्हें कॉल और आंखों के रंग के आधार पर अलग किया जा सकता है।
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पक्षियों की लगभग 300 अन्य प्रजातियां मौजूद
इस वन क्षेत्र में चार तरह की कोयल, पेंटेड सैण्डग्राउज, कठफोड़ा की चार प्रजातियां, बंटिंग की प्रजातियां जैसे क्रस्टेड बंटिंग, राक बंटिंग, स्टीरियो लेटेड बंटिंग के अलावा व्हाइट बैलीज मिनीवेट, स्पाटेड उल्लू, स्पाटेड ट्री कीपर, राक ईगल आउल, भारतीय स्कूप्ड उल्लू, मलकोवा, सल्फर बेलीड वारब्लग सहित पक्षियों की लगभग 300 अन्य प्रजातियां भी मौजूद हैं।
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वर्जन
अरावली क्षेत्र में पक्षियों की ऐसी प्रजातियां देखने को मिली हैं जो पहले भारत के एक दो हिस्सों में ही देखने को मिलती थीं। भविष्य में इसको संरक्षित रखने का प्रयास किया जाएगा। यहां जल संरक्षण, पेड़ पौधों व जीव जंतुओं के संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। यहां जल से लेकर पेड़-पौधों व जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए काम किया जा रहा है। - राकेश अहलावत, वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ
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रेवाड़ी। अरावली वन क्षेत्र जैव विविधता का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। इसकी गोद में पक्षियों का कुनबा तेजी से बढ़ रहा है। अब यहां पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियां देखने को मिल रही हैं।
अरावली पहाड़ी की गोद में बसे गांव पाड़ला, अहरोद, बासदूधा, खोल, मनेठी, भालखी, माजरा, नांधा, बलवाड़ी व खालेटा के जंगल आपस में जुड़े हुए हैं। इन दस गांवों का जंगल बेहद सघन है, जहां की आबोहवा जीव जंतुओं के लिए भी बेहतरीन है। इन घने जंगलों में पक्षियों की बहुत सी प्रजातियां देखने हैं जो पहले कभी यहां नजर नहीं आई थी। कुछ पक्षी प्रेमी जब इन जंगलों में घुसे तो उनको वहां पर सफेद नेप्ड टिट, भारतीय चित्तीदार लता, सफेद पेट वाला मिनीवेट, ओरिएंटल स्कूप उल्लू, शार्ट टेड स्नैक ईगल जैसे पक्षी नजर आए।
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व्हाइट नेप्ड टिट : यह पक्षी मुख्य रूप से अरावली वनों में पाई जाती है। अरावली के जंगलों में कांटेदार वनस्पतियां पाई जाती हैं। वाइट-नेप्ड टिट को एक संवेदनशील प्रजाति के रूप में दर्ज किया है। इसके प्राकृतिक आवास नष्ट होने के कारण इस प्रजाति के अस्तित्व पर खतरा है। इसे बचाने के लिए कांटेदार वनस्पतियों के संरक्षण के अलावा, मृत पेड़ों के संरक्षण की भी आवश्यकता है।
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शार्ट टेड स्नैक ईगल : शार्ट टेड स्नैक ईगल जो अपने चूजों को केवल सांप मारकर खिलाता है। इसके घोंसले और चूजे यहां पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर देखने के लिए मिले हैं। पर्यावरणविदों के अनुसार इन पक्षियों का यहां मिलना स्पष्ट संकेत दे रहा है कि इस जंगल का वातावरण उनके अनुकूल है और यहां पारिस्थितिकी तंत्र भी धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है।
भारतीय चित्तीदार लता : भारतीय चित्तीदार लता एक छोटा पक्षी है जिसके पंख संगमरमर जैसे काले और सफ़ेद रंग के होते हैं। यह खुले पर्णपाती जंगलों, आम के बागों और शुष्क झाड़ियों में पाए जाते हैं। यह चारागाह के लिए गहरी दरार वाली छाल वाले परिपक्व पेड़ों को पसंद करता है। यह अकेले या जोड़े में देखा जाता है, लेकिन गैर-प्रजनन के मौसम में छोटे झुंडों में भी देखा जा सकता है। यह प्रवास नहीं करता है। पक्षी की यह प्रजाति अरावली की पहाड़ियों में मौजूद है।
ओरिएंटल स्कूप उल्लू
स्कॉप्स उल्लू 23-25 सेमी (9.1-9.8 इंच) का छोटा उल्लू है, हालांकि यह स्कॉप्स उल्लुओं में में से एक है। अन्य स्कोप्स उल्लुओं की तरह, इसके सिर पर छोटे गुच्छे या कान होते हैं। ऊपरी हिस्से भूरे या भूरे रंग के होते हैं, जो रूप पर निर्भर करता है। नीचे के हिस्से बारीक गहरे रंग की धारियों वाले भूरे रंग के हैं। चेहरे की डिस्क सफ़ेद या भूरे रंग की होती है, और आंखें नारंगी या भूरे रंग की होती हैं। एक बफ़ नेकबैंड है। लिंग समान है। यह प्रजाति थोड़े बड़े आंशिक रूप से प्रवासी कॉलर वाले स्कॉप्स उल्लू (ओटस लेटिया) और ओरिएंटल स्कॉप्स उल्लू (ओटस सुनिया) के समान है। इन्हें कॉल और आंखों के रंग के आधार पर अलग किया जा सकता है।
पक्षियों की लगभग 300 अन्य प्रजातियां मौजूद
इस वन क्षेत्र में चार तरह की कोयल, पेंटेड सैण्डग्राउज, कठफोड़ा की चार प्रजातियां, बंटिंग की प्रजातियां जैसे क्रस्टेड बंटिंग, राक बंटिंग, स्टीरियो लेटेड बंटिंग के अलावा व्हाइट बैलीज मिनीवेट, स्पाटेड उल्लू, स्पाटेड ट्री कीपर, राक ईगल आउल, भारतीय स्कूप्ड उल्लू, मलकोवा, सल्फर बेलीड वारब्लग सहित पक्षियों की लगभग 300 अन्य प्रजातियां भी मौजूद हैं।
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वर्जन
अरावली क्षेत्र में पक्षियों की ऐसी प्रजातियां देखने को मिली हैं जो पहले भारत के एक दो हिस्सों में ही देखने को मिलती थीं। भविष्य में इसको संरक्षित रखने का प्रयास किया जाएगा। यहां जल संरक्षण, पेड़ पौधों व जीव जंतुओं के संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। यहां जल से लेकर पेड़-पौधों व जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए काम किया जा रहा है। - राकेश अहलावत, वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ