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Panipat News: काम का बोझ और अपनों की दूरी से बढ़ रहे मनोरोगी
Mon, 24 Nov 2025 01:46 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
Updated Mon, 24 Nov 2025 01:46 AM IST
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पानीपत। आज के समय में लोगों पर बढ़ता काम का बोझ और अपनों की दूरी उन्हें मनोरोगी बना रही है। जिला नागरिक अस्पताल में मनोचिकित्सक की प्रतिदिन ओपीडी 80 तक रहने लगी है जिसमें प्रतिदिन के नए मरीज 40 के करीब रहने लगे हैं। जिनमें ज्यादातर काम के बोझ से और अपनों की दूरी से परेशान लोग होते हैं। लोग परेशान होकर आत्महत्या तक का प्रयास कर रहे हैं। परिजन काउंसलिंग के लिए उन्हें अस्पताल लेकर पहुंच रहे हैं।
बदलते समय के साथ लोगों की जीवनशैली बदल रही है। जहां लोग परिवार से ज्यादा काम को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही काम उन्हें मानसिक तनाव का कारण बन रहा है जिससे कई मामलों में लोग परेशान होकर आत्महत्या तक का प्रयास कर चुके हैं। जिला नागरिक अस्पताल में प्रतिदिन काउंसलिंग के लिए लगभग 80 मरीज पहुंच रहे हैं जिनमें पचास प्रतिशत नए मरीज होते हैं।
मामला एक-
-काउंसलिंग के लिए पहुंची एक महिला ने बताया कि उसके छह बच्चे हैं। लगभग बीस साल पहले वह अपने बच्चों के साथ रेल से यात्रा कर रही थी। दूसरी रेल बदलते समय उसके दो बच्चों पहले वाली रेल में ही रह गए जिससे वे उससे बिछुड़ गए। आज तक वे उन्हें नहीं मिले हैं। वह हर समय बच्चों की याद में खोई रहती है। महिला के परिजनों ने बताया कि वह सामान्य लोगों की तरह भी व्यवहार करती है लेकिन अपने आप ही रोने लग जाती है, किसी से ज्यादा बात नहीं करती, कभी-कभी चिड़चिड़ेपन के कारण असामान्य व्यवहार करने लगती है। बीस साल से वह उन्हीं दो बच्चों की यादों में रहती है। उस घटना के बाद मानो उसका जीवन वहीं ठहर सा गया है। चिकित्सक ने काउंसलिंग करते हुए समझाया कि परिजनों को उसे रियल लाइफ से जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए, जितना हो सके उसका ध्यान किसी न किसी काम में लगाकर रखे ताकि वह उस घटना का कम याद कर और उस सदमे से बाहर निकल सके।
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मामला दो-
- एक पुलिसकर्मी काम के बोझ से परेशान होकर आत्महत्या का प्रयास कर चुका है जो काउंसलिंग के लिए अस्पताल पहुंचा। उसने बताया कि उसके सीनियर पुलिसकर्मी उस पर काम का इतना बोझ डाल देते हैं कि वह उसे पूरा कर-करके थक चुका है। काम के बोझ के कारण वह अपने परिवार को भी समय नहीं दे पा रहा है। कभी उसकी नाइट ड्यूटी लगाई जाती है तो कभी किसी दूसरे पुलिसकर्मी का काम उसे दे दिया जाता है जिसके कारण उसे नकारात्मक विचार आने लगे हैं, अब उसका काम में मन भी नहीं लगता, घबराहट बनी रहती है, चिड़चिड़ापन बढ़ गया है। काम का प्रेशर रहता है जिससे वह परिवार व स्वयं के साथ भी कुछ समय व्यतीत नहीं कर पा रहा है। काउंसलिंग में चिकित्सक ने उसे समझाया कि उसे दिन में कम से कम आधा या एक घंटा स्वयं के लिए निकालना चाहिए। कुछ समय परिवार के साथ अवश्य व्यतीत करना चाहिए, परिवार के साथ अपने प्रत्येक बात को साझा करना चाहिए।
लोगों को काम के साथ परिवार के साथ भी समय व्यतीत करना चाहिए उनके साथ अपनी बातों को सांझा करनी चाहिए। क्योंकि इससे आप अकेलापन महसूस नहीं करेंगे और परिवार के साथ तालमेल बना रहना जरूरी है। काम को काम के दायरे तक सीमित रखें इसे परिवार या अपने व्यक्तित्व पर हावी न होने दे।
डॉ. मोना नागपाल, मनोचिकित्सक जिला नागरिक अस्पताल।
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बदलते समय के साथ लोगों की जीवनशैली बदल रही है। जहां लोग परिवार से ज्यादा काम को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही काम उन्हें मानसिक तनाव का कारण बन रहा है जिससे कई मामलों में लोग परेशान होकर आत्महत्या तक का प्रयास कर चुके हैं। जिला नागरिक अस्पताल में प्रतिदिन काउंसलिंग के लिए लगभग 80 मरीज पहुंच रहे हैं जिनमें पचास प्रतिशत नए मरीज होते हैं।
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मामला एक-
-काउंसलिंग के लिए पहुंची एक महिला ने बताया कि उसके छह बच्चे हैं। लगभग बीस साल पहले वह अपने बच्चों के साथ रेल से यात्रा कर रही थी। दूसरी रेल बदलते समय उसके दो बच्चों पहले वाली रेल में ही रह गए जिससे वे उससे बिछुड़ गए। आज तक वे उन्हें नहीं मिले हैं। वह हर समय बच्चों की याद में खोई रहती है। महिला के परिजनों ने बताया कि वह सामान्य लोगों की तरह भी व्यवहार करती है लेकिन अपने आप ही रोने लग जाती है, किसी से ज्यादा बात नहीं करती, कभी-कभी चिड़चिड़ेपन के कारण असामान्य व्यवहार करने लगती है। बीस साल से वह उन्हीं दो बच्चों की यादों में रहती है। उस घटना के बाद मानो उसका जीवन वहीं ठहर सा गया है। चिकित्सक ने काउंसलिंग करते हुए समझाया कि परिजनों को उसे रियल लाइफ से जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए, जितना हो सके उसका ध्यान किसी न किसी काम में लगाकर रखे ताकि वह उस घटना का कम याद कर और उस सदमे से बाहर निकल सके।
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मामला दो-
- एक पुलिसकर्मी काम के बोझ से परेशान होकर आत्महत्या का प्रयास कर चुका है जो काउंसलिंग के लिए अस्पताल पहुंचा। उसने बताया कि उसके सीनियर पुलिसकर्मी उस पर काम का इतना बोझ डाल देते हैं कि वह उसे पूरा कर-करके थक चुका है। काम के बोझ के कारण वह अपने परिवार को भी समय नहीं दे पा रहा है। कभी उसकी नाइट ड्यूटी लगाई जाती है तो कभी किसी दूसरे पुलिसकर्मी का काम उसे दे दिया जाता है जिसके कारण उसे नकारात्मक विचार आने लगे हैं, अब उसका काम में मन भी नहीं लगता, घबराहट बनी रहती है, चिड़चिड़ापन बढ़ गया है। काम का प्रेशर रहता है जिससे वह परिवार व स्वयं के साथ भी कुछ समय व्यतीत नहीं कर पा रहा है। काउंसलिंग में चिकित्सक ने उसे समझाया कि उसे दिन में कम से कम आधा या एक घंटा स्वयं के लिए निकालना चाहिए। कुछ समय परिवार के साथ अवश्य व्यतीत करना चाहिए, परिवार के साथ अपने प्रत्येक बात को साझा करना चाहिए।
लोगों को काम के साथ परिवार के साथ भी समय व्यतीत करना चाहिए उनके साथ अपनी बातों को सांझा करनी चाहिए। क्योंकि इससे आप अकेलापन महसूस नहीं करेंगे और परिवार के साथ तालमेल बना रहना जरूरी है। काम को काम के दायरे तक सीमित रखें इसे परिवार या अपने व्यक्तित्व पर हावी न होने दे।
डॉ. मोना नागपाल, मनोचिकित्सक जिला नागरिक अस्पताल।