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Panipat News: प्रहलाद जैसी निस्वार्थ और सच्ची भक्ति का दिया संदेश
Sat, 23 May 2026 04:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
Updated Sat, 23 May 2026 04:00 AM IST
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पानीपत। प्रेम मंदिर में पुरुषोत्तम (मलमास) मास में चल रही साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा का शुक्रवार को तीसरा दिन रहा। मंदिर की परमाध्यक्ष कथाव्यास कांता देवी महाराज ने कथा में प्रहलाद जैसी निस्वार्थ और सच्ची भक्ति का संदेश दिया। इसके बाद ब्रह्मकुमारी बहनों और महिला मंडली ने भजन-कीर्तन किया।
कथाव्यास कांता देवी महाराज ने बताया कि शुकदेव सांसारिक मोह-माया से दूर रहना चाहते थे इसलिए वे जन्म लेने से पहले 12 वर्षों तक अपनी माता के गर्भ में ही रहे। जब स्वयं भगवान कृष्ण ने आकर उन्हें आश्वासन दिया कि माया उन्हें स्पर्श नहीं करेगी, तब वे गर्भ से बाहर आए। वे जन्म लेते ही संसार के बंधनों से मुक्त होकर वन की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। वन में रहने के बाद भी भगवान कृष्ण की लीलाओं से आकर्षित होकर वे वेदव्यास के पास लौट आते हैं। उन्होंने संपूर्ण श्रीमद्भागवत का अध्ययन किया और बाद में राजा परीक्षित को यह कथा सुनाकर उनका उद्धार किया। भगवान नरसिंह ने प्रहलाद की निस्वार्थ और सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि प्रहलाद के पिता की आत्मा को पहले ही परम गति मिल चुकी है। इसके साथ ही भगवान ने प्रहलाद को वरदान दिया कि तुम्हारे जैसे शुद्ध हृदय वाले भक्त के कारण तुम्हारे कुल में उत्पन्न इक्कीस पीढ़ियों तक के पूर्वजों की आत्मा का उद्धार हो जाता है। उसके बाद कथाव्यास ने वामन अवतार के साथ कथा को विश्राम दिया। कथा के बाद ब्रह्मकुमारीज बहनों और महिला मंडली ने भजन-कीर्तन किया और भगवान की महिमा का वर्णन किया। समापन पर सभी को प्रसाद वितरित किया गया। संवाद
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कथाव्यास कांता देवी महाराज ने बताया कि शुकदेव सांसारिक मोह-माया से दूर रहना चाहते थे इसलिए वे जन्म लेने से पहले 12 वर्षों तक अपनी माता के गर्भ में ही रहे। जब स्वयं भगवान कृष्ण ने आकर उन्हें आश्वासन दिया कि माया उन्हें स्पर्श नहीं करेगी, तब वे गर्भ से बाहर आए। वे जन्म लेते ही संसार के बंधनों से मुक्त होकर वन की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। वन में रहने के बाद भी भगवान कृष्ण की लीलाओं से आकर्षित होकर वे वेदव्यास के पास लौट आते हैं। उन्होंने संपूर्ण श्रीमद्भागवत का अध्ययन किया और बाद में राजा परीक्षित को यह कथा सुनाकर उनका उद्धार किया। भगवान नरसिंह ने प्रहलाद की निस्वार्थ और सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि प्रहलाद के पिता की आत्मा को पहले ही परम गति मिल चुकी है। इसके साथ ही भगवान ने प्रहलाद को वरदान दिया कि तुम्हारे जैसे शुद्ध हृदय वाले भक्त के कारण तुम्हारे कुल में उत्पन्न इक्कीस पीढ़ियों तक के पूर्वजों की आत्मा का उद्धार हो जाता है। उसके बाद कथाव्यास ने वामन अवतार के साथ कथा को विश्राम दिया। कथा के बाद ब्रह्मकुमारीज बहनों और महिला मंडली ने भजन-कीर्तन किया और भगवान की महिमा का वर्णन किया। समापन पर सभी को प्रसाद वितरित किया गया। संवाद
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