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Panipat News: बोफोर्स से काट दी थी दुश्मनों की लाइफ लाइन, रातोंरात दूसरे स्थानों पर पहुंचे थे
Sat, 26 Jul 2025 03:46 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
Updated Sat, 26 Jul 2025 03:46 AM IST
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स्वीटी सांगवान
पानीपत। कारगिल युद्ध से पानीपत को जहां गहरे जख्म मिले थे, वहीं यहां के जवानों ने अपनी बहादुरी का परिचय भी दिया था। पानीपत के पांच जवानों ने अपना बलिदान दिया था। इनमें तीन सनौली खंड और दो इसराना खंड के जवान थे। वहीं आठ से दस जवानों ने इस युद्ध में आगे जाकर लड़ाई लड़ी थी। वे आज भी अपनी बहादुरी के किस्से याद कर खुद पर गर्व महसूस करते हैं। शनिवार को कारगिल विजय दिवस के 26 साल होंगे। पूर्व सैनिक संगठन द्वारा जिला सचिवालय पर कार्यक्रम किया जाएगा।
कुराना गांंव के सेवानिवृत सूबेदार मेजर राजेंद्र सिंह ने बताया कि वे 1984 में सेना की ईएमई में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे। वे परीक्षा देकर एचएमटी पदोन्नत हुए थे। कारगिल युद्ध के समय उनकी तैनाती श्रीनगर वेली में थी। दुश्मनों ने भारतीय जवानों पर गोला और गोली चलानी शुरू कर दी थी। वे उस समय सूबेदार मेजर के पद पर थे। उनको बोफोर्स से पाकिस्तान से उनके हिस्से में कारगिल को जोड़ने वाली मुख्य सड़क का टास्क मिला। इसी सड़क से पाकिस्तान की सेना तक राशन और गोला बारूद आ रहा था। उन्होंने टीम के साथ दिनरात इस सड़क पर बोफोर्स से फायर किए और कनेक्टिविटी काट दी। यह बड़ा टास्क था। इसके बाद उनको डाबर गुरेज स्थान का टास्क मिला। यहां बलिदानियों को उठाने तक नहीं दिया जा रहा था। वे रातों रात 25 से 30 किलोमीटर गाड़ी लेकर गए। यहां दुश्मनों पर लगातार फायर किए। इसके बाद उनको तंगधार वेली में जाने का टास्क मिला। उन पर दूसरी तरफ से गोले और बंदूक से लगातार फायर किए जा रहे थे। उन्होंने अपनी गाड़ी रुकने नहीं दी। वे बारामूला से होकर तंगधार वेली में पहुंचे। भारतीय सेना ने हिम्मत के साथ कारगिल युद्ध में विजय पाई।
वर्कशाप में आकर गिरा था गोला
तहसील कैंप निवासी सेवानिवृत सूबेदार मेजर ओमप्रकाश ने बताया कि वे कारगिल स्थित ईएमई की वर्कशाप में तैनात थे। टाइगर हिल समेत दूसरी चौकियों को बर्फ पड़ने के चलते खाली करा दिया जाता था। भारतीय सेना पेट्रोलिंग पार्टी गई तो उन पर फायर कर दिया गया। स्थानीय लोगों ने बताया कि भारतीय चौकी पर पाकिस्तान के जवानों ने कब्जा किया हुआ है। वे सब इसकी तैयारी कर रहे थे। उन्हें आज भी याद है कि शाम के समय उनकी वर्कशाप में गोला आकर गिरा था। सभी लोग बंकर में चले गए थे। कारगिल के दौरान वर्कशाप का काम बढ़ गया था। वे सभी गाड़ियों की बारीकी से जांच कराते थे। इसके बाद ही इनको निकाला जाता था।
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पानीपत। कारगिल युद्ध से पानीपत को जहां गहरे जख्म मिले थे, वहीं यहां के जवानों ने अपनी बहादुरी का परिचय भी दिया था। पानीपत के पांच जवानों ने अपना बलिदान दिया था। इनमें तीन सनौली खंड और दो इसराना खंड के जवान थे। वहीं आठ से दस जवानों ने इस युद्ध में आगे जाकर लड़ाई लड़ी थी। वे आज भी अपनी बहादुरी के किस्से याद कर खुद पर गर्व महसूस करते हैं। शनिवार को कारगिल विजय दिवस के 26 साल होंगे। पूर्व सैनिक संगठन द्वारा जिला सचिवालय पर कार्यक्रम किया जाएगा।
कुराना गांंव के सेवानिवृत सूबेदार मेजर राजेंद्र सिंह ने बताया कि वे 1984 में सेना की ईएमई में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे। वे परीक्षा देकर एचएमटी पदोन्नत हुए थे। कारगिल युद्ध के समय उनकी तैनाती श्रीनगर वेली में थी। दुश्मनों ने भारतीय जवानों पर गोला और गोली चलानी शुरू कर दी थी। वे उस समय सूबेदार मेजर के पद पर थे। उनको बोफोर्स से पाकिस्तान से उनके हिस्से में कारगिल को जोड़ने वाली मुख्य सड़क का टास्क मिला। इसी सड़क से पाकिस्तान की सेना तक राशन और गोला बारूद आ रहा था। उन्होंने टीम के साथ दिनरात इस सड़क पर बोफोर्स से फायर किए और कनेक्टिविटी काट दी। यह बड़ा टास्क था। इसके बाद उनको डाबर गुरेज स्थान का टास्क मिला। यहां बलिदानियों को उठाने तक नहीं दिया जा रहा था। वे रातों रात 25 से 30 किलोमीटर गाड़ी लेकर गए। यहां दुश्मनों पर लगातार फायर किए। इसके बाद उनको तंगधार वेली में जाने का टास्क मिला। उन पर दूसरी तरफ से गोले और बंदूक से लगातार फायर किए जा रहे थे। उन्होंने अपनी गाड़ी रुकने नहीं दी। वे बारामूला से होकर तंगधार वेली में पहुंचे। भारतीय सेना ने हिम्मत के साथ कारगिल युद्ध में विजय पाई।
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वर्कशाप में आकर गिरा था गोला
तहसील कैंप निवासी सेवानिवृत सूबेदार मेजर ओमप्रकाश ने बताया कि वे कारगिल स्थित ईएमई की वर्कशाप में तैनात थे। टाइगर हिल समेत दूसरी चौकियों को बर्फ पड़ने के चलते खाली करा दिया जाता था। भारतीय सेना पेट्रोलिंग पार्टी गई तो उन पर फायर कर दिया गया। स्थानीय लोगों ने बताया कि भारतीय चौकी पर पाकिस्तान के जवानों ने कब्जा किया हुआ है। वे सब इसकी तैयारी कर रहे थे। उन्हें आज भी याद है कि शाम के समय उनकी वर्कशाप में गोला आकर गिरा था। सभी लोग बंकर में चले गए थे। कारगिल के दौरान वर्कशाप का काम बढ़ गया था। वे सभी गाड़ियों की बारीकी से जांच कराते थे। इसके बाद ही इनको निकाला जाता था।
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