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खेलकूद से भी होता है नाम... चार बेटियों ने दिखाया दम
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पानीपत। रीत।
- फोटो : Panipat
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पानीपत। पढ़ाई के साथ खेलकूद में भी रुचि रखने वाली बेटियों ने खंड स्तरीय खेल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक प्राप्त कर बताया कि खेलकूद से भी नाम कमाया जा सकता है। इनमें उग्राखेड़ी की रीत, अंसल की विभूती, जाटल की मोनू और इसराना की सान्या शामिल हैं।
इनमें किसी बेटी ने आर्मी भर्ती के लिए दौड़ना शुरू किया था तो किसी ने आईपीएस का फिजिकल क्लियर करने के बाद ताइक्वांडो शुरू की थी। किसी के भाई ने प्रतिभा पहचान और किसी के पिता ने। अब इन लड़कियों की मेहनत रंग लाई और खंड स्तरीय खेल प्रतियोगिता में इन्होंने स्वर्ण पदक प्राप्त किए हैं।
खिलाड़ी-1
मां के गुजरने के बाद छोड़ दिया था खेलना, भाई के समझाने के बाद किया शुरू, जीता स्वर्ण
उग्राखेड़ी गांव की रहने वाली 11 साल की रीत मलिक ने जैवलिन थ्रो में अपना पहना मेडल प्राप्त किया है। एक साल पहले ही जैवलिन थ्रो खेल सीखने वाली 11 वर्षीय रीत ने अपने मां के गुजरने के बाद खेलना ही शुरू कर दिया था। इसके बाद उसके चाचा के लड़के अमन मलिक ने समझाया और उसे अभ्यास के लिए रोजाना स्टेडियम में ले जाना शुरू किया तो उसने फिर से खेल में वापसी की। रीत ने बताया कि दोबारा खेल शुरू करने के बाद उसे मां की याद आती थी। रीत केवल 11 साल की उम्र में ही 26 मीटर जेवलिन थ्रो कर लेती हैं, जिसकी बदौलत खंड स्तरीय खेल प्रतियोगिता में रीत ने प्रथम स्थान हासिल किया है।
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पढ़ाई में मन नहीं लगता था तो खेलना किया था शुरू
रीत पढ़ाई में ज्यादा होशियार नहीं थी। घर वालों ने समझाया कि यदि पढ़ाई में मन नहीं लग रहा है तो वह खेल में भाग लेना शुरू कर दो। इसके बाद उसके बड़े भाई अमन ने उसे रोजाना अपने साथ दौड़ाना शुरू करवाया और गांव के जैवलिन थ्रोअर विक्रांत मलिक ने रीत को भाला फेंकना सिखाया। शुरुआत में भाला फेंकने के दौरान भागते हुए पैर मुड़ जाते थे, फिर उसने तकनीक को सीखा और आसानी से अब 25 से 26 मीटर भाला फेंक लेती हैं।
खिलाड़ी-2
पैर की हड्डी टूटने के एक महीने बाद ही शुरू कर दिया था दौड़ना, अब जीता स्वर्ण
अंसल निवासी बाल विकास प्रोग्रेसिव स्कूल में 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली विभूती भाटिया ने पिछले साल पैर की हड्डी टूटने के बाद भी हार नहीं मानी और एक महीने बाद ही फिर से अभ्यास करना शुरू कर दिया। विभूती की माता निधि ने बताया कि वह कभी चोट के डर से रुकी नहीं। बल्कि जब भी उसे चोट लगती है उसके ठीक होने के बाद वह और भी ज्यादा मेहनत करने लग जाती है।
आईपीएस का फिजिकल क्लियर करने के लिए खेलना किया था शुरू
विभूति का सपना है कि वह आईपीएस ऑफिसर बने, जिसके लिए उसने दूसरी क्लास से ही खेलकूद में भाग लेना शुरू कर दिया था ताकि उसका फिजिकल टेस्ट आसानी से निकल जाए। विभूति ने सबसे पहले ताइक्वांडो खेलना शुरू किया था। उसने पिछले छह से सात साल में नेशनल ताइक्वांडो चैंपियनशिप में स्वर्ण और राज्य स्तरीय ताइक्वांडो चैंपियनशिप में तीन स्वर्ण पदक प्राप्त किए है। विभूती ताइक्वांडो की तैयारी के साथ साथ रोजाना दो से तीन घंटे दौड़ भी लगाती है। उनके कोच अशोक जैन रोजाना अंसल में खेल का अभ्यास कराते हैं।
खिलाड़ी-3
आर्मी में जाने के लिए लगाती है 15 किलोमीटर की दौड़
जाटल गांव की रहने वाली मोनू का सपना आर्मी में जाने का है, जिसके लिए वह रोजाना दौड़ लगाती हैं और अपनी क्षमता को देखने के लिए हर मंगलवार को 15 से 20 किलोमीटर दौड़ लगाती है। रोजना दौड़ लगाने की आदत के कारण ही मोनू ने खंड स्तरीय खेल प्रतियोगिता में एक दिन में ही 1500 मीटर और 3000 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। मोनू अपने गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ती हैं और अपने गांव के स्टेडियम में ही रोजाना छह घंटे खेल अभ्यास करती हैं। मोनू के पिता खेतीबाड़ी करने के साथ साथ दूध बेचने का भी काम करते हैं। मोनू के पिता ने बताया कि वह रोजाना दूध और लस्सी पीती हैं।
खिलाड़ी-4
बेटी को अच्छा दौड़ता देखा तो लांग जंप खिलवाई, जीता स्वर्ण
इसराना की रहने वाली सान्या को तीन साल पहले अच्छा दौड़ता देख पिता ने अपनी बेटी को लंबी कूद खेलने के प्रेरित किया। इसके बाद बेटी ने खेलना शुरू किया और तीन साल बाद अब खंड स्तरीय चैंपियनशिप में पहला स्वर्ण पदक जीता हैै। पिता नरेंद्र ने बताया कि जिले में इससे पहले खंड स्तरीय खेल नहीं हो रहे थे जिससे पहली बार बेटी को खेलने का मौका मिला है। सान्या इससे पहले स्कूल में खो-खो खेलती थीं। सान्या ने सातवीं कक्षा से ही खेलना शुरू कर दिया था।
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इनमें किसी बेटी ने आर्मी भर्ती के लिए दौड़ना शुरू किया था तो किसी ने आईपीएस का फिजिकल क्लियर करने के बाद ताइक्वांडो शुरू की थी। किसी के भाई ने प्रतिभा पहचान और किसी के पिता ने। अब इन लड़कियों की मेहनत रंग लाई और खंड स्तरीय खेल प्रतियोगिता में इन्होंने स्वर्ण पदक प्राप्त किए हैं।
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खिलाड़ी-1
मां के गुजरने के बाद छोड़ दिया था खेलना, भाई के समझाने के बाद किया शुरू, जीता स्वर्ण
उग्राखेड़ी गांव की रहने वाली 11 साल की रीत मलिक ने जैवलिन थ्रो में अपना पहना मेडल प्राप्त किया है। एक साल पहले ही जैवलिन थ्रो खेल सीखने वाली 11 वर्षीय रीत ने अपने मां के गुजरने के बाद खेलना ही शुरू कर दिया था। इसके बाद उसके चाचा के लड़के अमन मलिक ने समझाया और उसे अभ्यास के लिए रोजाना स्टेडियम में ले जाना शुरू किया तो उसने फिर से खेल में वापसी की। रीत ने बताया कि दोबारा खेल शुरू करने के बाद उसे मां की याद आती थी। रीत केवल 11 साल की उम्र में ही 26 मीटर जेवलिन थ्रो कर लेती हैं, जिसकी बदौलत खंड स्तरीय खेल प्रतियोगिता में रीत ने प्रथम स्थान हासिल किया है।
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पढ़ाई में मन नहीं लगता था तो खेलना किया था शुरू
रीत पढ़ाई में ज्यादा होशियार नहीं थी। घर वालों ने समझाया कि यदि पढ़ाई में मन नहीं लग रहा है तो वह खेल में भाग लेना शुरू कर दो। इसके बाद उसके बड़े भाई अमन ने उसे रोजाना अपने साथ दौड़ाना शुरू करवाया और गांव के जैवलिन थ्रोअर विक्रांत मलिक ने रीत को भाला फेंकना सिखाया। शुरुआत में भाला फेंकने के दौरान भागते हुए पैर मुड़ जाते थे, फिर उसने तकनीक को सीखा और आसानी से अब 25 से 26 मीटर भाला फेंक लेती हैं।
खिलाड़ी-2
पैर की हड्डी टूटने के एक महीने बाद ही शुरू कर दिया था दौड़ना, अब जीता स्वर्ण
अंसल निवासी बाल विकास प्रोग्रेसिव स्कूल में 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली विभूती भाटिया ने पिछले साल पैर की हड्डी टूटने के बाद भी हार नहीं मानी और एक महीने बाद ही फिर से अभ्यास करना शुरू कर दिया। विभूती की माता निधि ने बताया कि वह कभी चोट के डर से रुकी नहीं। बल्कि जब भी उसे चोट लगती है उसके ठीक होने के बाद वह और भी ज्यादा मेहनत करने लग जाती है।
आईपीएस का फिजिकल क्लियर करने के लिए खेलना किया था शुरू
विभूति का सपना है कि वह आईपीएस ऑफिसर बने, जिसके लिए उसने दूसरी क्लास से ही खेलकूद में भाग लेना शुरू कर दिया था ताकि उसका फिजिकल टेस्ट आसानी से निकल जाए। विभूति ने सबसे पहले ताइक्वांडो खेलना शुरू किया था। उसने पिछले छह से सात साल में नेशनल ताइक्वांडो चैंपियनशिप में स्वर्ण और राज्य स्तरीय ताइक्वांडो चैंपियनशिप में तीन स्वर्ण पदक प्राप्त किए है। विभूती ताइक्वांडो की तैयारी के साथ साथ रोजाना दो से तीन घंटे दौड़ भी लगाती है। उनके कोच अशोक जैन रोजाना अंसल में खेल का अभ्यास कराते हैं।
खिलाड़ी-3
आर्मी में जाने के लिए लगाती है 15 किलोमीटर की दौड़
जाटल गांव की रहने वाली मोनू का सपना आर्मी में जाने का है, जिसके लिए वह रोजाना दौड़ लगाती हैं और अपनी क्षमता को देखने के लिए हर मंगलवार को 15 से 20 किलोमीटर दौड़ लगाती है। रोजना दौड़ लगाने की आदत के कारण ही मोनू ने खंड स्तरीय खेल प्रतियोगिता में एक दिन में ही 1500 मीटर और 3000 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। मोनू अपने गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ती हैं और अपने गांव के स्टेडियम में ही रोजाना छह घंटे खेल अभ्यास करती हैं। मोनू के पिता खेतीबाड़ी करने के साथ साथ दूध बेचने का भी काम करते हैं। मोनू के पिता ने बताया कि वह रोजाना दूध और लस्सी पीती हैं।
खिलाड़ी-4
बेटी को अच्छा दौड़ता देखा तो लांग जंप खिलवाई, जीता स्वर्ण
इसराना की रहने वाली सान्या को तीन साल पहले अच्छा दौड़ता देख पिता ने अपनी बेटी को लंबी कूद खेलने के प्रेरित किया। इसके बाद बेटी ने खेलना शुरू किया और तीन साल बाद अब खंड स्तरीय चैंपियनशिप में पहला स्वर्ण पदक जीता हैै। पिता नरेंद्र ने बताया कि जिले में इससे पहले खंड स्तरीय खेल नहीं हो रहे थे जिससे पहली बार बेटी को खेलने का मौका मिला है। सान्या इससे पहले स्कूल में खो-खो खेलती थीं। सान्या ने सातवीं कक्षा से ही खेलना शुरू कर दिया था।

पानीपत। विभूति अपने पिता के साथ।- फोटो : Panipat

पानीपत। मोनू अपने माता-पिता के साथ।- फोटो : Panipat