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जो अपनी उपयोगिता का एहसास नहीं करा सकता वह किसी काम का नहीं : उपेंद्र मुनि
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संवाद न्यूज एजेंसी
समालखा। जैन स्थानक में चातुर्मास प्रवास कर रहे उपेंद्र मुनि ने सोमवार को धर्म प्रचार पर प्रवचन दिए और श्रावक के आचरण के लिए व्याख्यान दिया। मुनि ने कहा कि धर्म सभा में आने वाले लोग संतों के प्रति श्रद्धा भाव लेकर आते हैं। इसलिए लोग संतों के व्यवहार पक्ष की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं। वैसे भी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने वाली चीज व्यवहार है निश्चय नहीं। इसलिए संत को सदैव सात्विक व्यवहार के लिए जागरूक रहना चाहिए।
संत के जीवन में यदि सुंदर व्यवहार, सुंदर आचरण और जुबान पर सुंदर बोल नहीं तथा वह कुव्यसनों का सेवन करता है लेकिन सत्संग नहीं करता है तो वो संत किसी काम का नहीं है। वो श्रावक भी किसी काम का नहीं जिसमें संत के प्रति श्रद्धा नहीं है और जो अणुव्रतों की आराधना और साधु संतों की सेवा नहीं करता, धर्म के प्रचार प्रसार के लिए तन, मन और धन की शक्ति खर्च नहीं करता। जो मनुष्य अपनी उपस्थिति ओर उपयोगिता का एहसास नहीं करा सकता वह किसी काम का नहीं है।
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समालखा। जैन स्थानक में चातुर्मास प्रवास कर रहे उपेंद्र मुनि ने सोमवार को धर्म प्रचार पर प्रवचन दिए और श्रावक के आचरण के लिए व्याख्यान दिया। मुनि ने कहा कि धर्म सभा में आने वाले लोग संतों के प्रति श्रद्धा भाव लेकर आते हैं। इसलिए लोग संतों के व्यवहार पक्ष की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं। वैसे भी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने वाली चीज व्यवहार है निश्चय नहीं। इसलिए संत को सदैव सात्विक व्यवहार के लिए जागरूक रहना चाहिए।
संत के जीवन में यदि सुंदर व्यवहार, सुंदर आचरण और जुबान पर सुंदर बोल नहीं तथा वह कुव्यसनों का सेवन करता है लेकिन सत्संग नहीं करता है तो वो संत किसी काम का नहीं है। वो श्रावक भी किसी काम का नहीं जिसमें संत के प्रति श्रद्धा नहीं है और जो अणुव्रतों की आराधना और साधु संतों की सेवा नहीं करता, धर्म के प्रचार प्रसार के लिए तन, मन और धन की शक्ति खर्च नहीं करता। जो मनुष्य अपनी उपस्थिति ओर उपयोगिता का एहसास नहीं करा सकता वह किसी काम का नहीं है।
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