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पिता के लिए ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में जीते पदक
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ट्रॉफी दिखाती हुई नैंसी सिवाच।
- फोटो : Panipat
पानीपत। पिता के सपने को अपना लक्ष्य बनाकर भाई नितेश और बहन नैंसी ने ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में सफलता की इबारत लिखी। कबड्डी चैंपियनशिप में नैंसी ने रजत पदक प्राप्त किया वहीं कुश्ती में नितेश सिवाच ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को चित कर 97 किलोग्राम भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। जीत के बाद पिता आनंद ने अपने बेटे-बेटी का घर पर स्वागत किया और कहा कि मेरा सपना अब धीरे धीरे पूरा हो रहा है।
पिता आनंद बोले कि उनका सपना है कि उनके बच्चे खेल में अच्छा प्रदर्शन करके ओलंपिक में जाए और पदक जीतकर देश का नाम रोशन करें। इसके लिए उन्होंने अपने दोनों बच्चों को 12 साल की उम्र से ही खेलने के लिए प्रेरित किया था।
दूध बेचकर पिता ने खिलाया दोनों बच्चों को खेल
दिन-रात दूध बेचकर पिता आनंद सिवाच ने अपने बेटे नितेश और बेटी नैंसी को खेलना शुरू करवाया। नितेश और नैंसी ने बताया कि कई बार घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और उन्हें कहा कि तुम दोनों सिर्फ खेल पर ध्यान दो। तुम्हारे मेडल ही मेरे हर एक दर्द का मरहम का काम करेंगे। पिता आनंद ने बताया कि उन्होंने 15 साल पहले खुली आंखों से सपना देखा था कि उनके बच्चे खेल में अच्छा प्रदर्शन कर देश और हरियाणा का नाम रोशन करें जो अब वह कर रहे हैं।
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घुटने में चोट पर दो साल नहीं खेल पाए थे कुश्ती
नितेश सिवाच ने 2012 में कुश्ती खेलना शुरू किया था, लेकिन 2015 में घुटने पर चोट लग गई। घुटने का ऑपरेशन हुआ, जिससे उबरने में नितेश को दो साल लग गए। इसके बाद भी नितेश ने खेलना नहीं छोड़ा, उन्होंने फिर कुश्ती खेलनी शुरू की। खेल फिर से शुरू करने के कुछ महीने बाद से ही नितेश ने राष्ट्र स्तरीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतने शुरू कर दिए जबकि इससे पहले नितेश की राष्ट्रीय स्तर पर कोई खास पहचान नहीं बन पाई थी। नितेश ने जूनियर नेशनल चैंपियनशिप और खेलो इंडिया में स्वर्ण पदक जीतने के साथ-साथ कुल छह राष्ट्र स्तरीय मेडल जीते हैं। एशियन चैंपियनशिप में रजत पदक भी जीता है। नितेश का सपना है कि वह तीन साल और अभ्यास करके 2024 के ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतें और देश का नाम रोशन करें।
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पिता आनंद बोले कि उनका सपना है कि उनके बच्चे खेल में अच्छा प्रदर्शन करके ओलंपिक में जाए और पदक जीतकर देश का नाम रोशन करें। इसके लिए उन्होंने अपने दोनों बच्चों को 12 साल की उम्र से ही खेलने के लिए प्रेरित किया था।
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दूध बेचकर पिता ने खिलाया दोनों बच्चों को खेल
दिन-रात दूध बेचकर पिता आनंद सिवाच ने अपने बेटे नितेश और बेटी नैंसी को खेलना शुरू करवाया। नितेश और नैंसी ने बताया कि कई बार घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और उन्हें कहा कि तुम दोनों सिर्फ खेल पर ध्यान दो। तुम्हारे मेडल ही मेरे हर एक दर्द का मरहम का काम करेंगे। पिता आनंद ने बताया कि उन्होंने 15 साल पहले खुली आंखों से सपना देखा था कि उनके बच्चे खेल में अच्छा प्रदर्शन कर देश और हरियाणा का नाम रोशन करें जो अब वह कर रहे हैं।
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घुटने में चोट पर दो साल नहीं खेल पाए थे कुश्ती
नितेश सिवाच ने 2012 में कुश्ती खेलना शुरू किया था, लेकिन 2015 में घुटने पर चोट लग गई। घुटने का ऑपरेशन हुआ, जिससे उबरने में नितेश को दो साल लग गए। इसके बाद भी नितेश ने खेलना नहीं छोड़ा, उन्होंने फिर कुश्ती खेलनी शुरू की। खेल फिर से शुरू करने के कुछ महीने बाद से ही नितेश ने राष्ट्र स्तरीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतने शुरू कर दिए जबकि इससे पहले नितेश की राष्ट्रीय स्तर पर कोई खास पहचान नहीं बन पाई थी। नितेश ने जूनियर नेशनल चैंपियनशिप और खेलो इंडिया में स्वर्ण पदक जीतने के साथ-साथ कुल छह राष्ट्र स्तरीय मेडल जीते हैं। एशियन चैंपियनशिप में रजत पदक भी जीता है। नितेश का सपना है कि वह तीन साल और अभ्यास करके 2024 के ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतें और देश का नाम रोशन करें।

पदक दिखाते हुए पिता आनंद के साथ नितेश सिवाच।- फोटो : Panipat