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Panipat News: सूचनाओं के लिए लंबी तारीख का इंतजार
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पानीपत। सूचनाओं की सुनवाई के लिए लंबी तारीख का सिलसिला खत्म नहीं हो रहा है। फरियादियों का इंतजार बढ़ता ही जा रहा है। राज्य सूचना आयोग में 7216 केस विचाराधीन हैं। आयोग काम के बोझ के चलते लंबी तारीख दे रहा है। ऐसे में अपीलकर्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इनको निपटाने की दिशा में तेजी से काम किया जाएं तो करीब आठ वर्ष लग सकते हैं।
यह खुलासा राज्य सूचना आयोग द्वारा दी एक सूचना में हुआ है। काबिलेगौर है कि आयोग सूचना अधिकारियों पर लगाई पूरी जुर्माना राशि भी वसूल नहीं कर पाया है। आयोग ने 5.86 करोड़ में से 2.84 करोड़ की जुर्माना राशि वसूली है। बाकी 3.02 करोड़ की वसूली नहीं हो सकी है। इन 20 सालों में सूचना आयोग पर 128.39 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। बात आरटीआई एक्ट के बारे में जनता को जागरूक करने की करें तो पिछले 14 वर्षों में कोई उल्लेखनीय खर्च नहीं किया गया है। हालांकि आयोग ने 92.22 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति अपीलकर्ताओं को जरूर दिलवाया है।
यह सूचना पानीपत के आरटीआई कार्यकर्ता पीपी कपूर ने ने मांगी थी। पीपी कपूर ने बताया कि लोगों को आरटीआई एक्ट लागू होने के बाद किसी प्रकार की सूचना मांगने और सूचना न देने पर त्वरित कार्रवाई की उम्मीद जगी थी। आयोग में ही मामलों की सुनवाई लंबी चलने लगी। उन्होंने बताया कि सूचना आयोग से आरटीआई के अंतर्गत विभिन्न अपीलों व शिकायतों के 7216 केस लंबित है । आयोग में सूचना आयुक्तों व स्टाफ के वेतन पर पिछले बीस वर्षो में 92 करोड़ रुपये व कैपिटल हेड पर 36.39 करोड़ रुपये सहित 128.39 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। जबकि पिछले 20 वर्ष में आरटीआई एक्ट बारे जनता को जागरूक करने पर मात्र 2.50 लाख रुपये खर्च किए हैं। पिछले 14 वर्ष में इस पर कोई पैसा नहीं लगाया। सूचना न देने के डिफाल्टर सूचना अधिकारियों पर आयोग ने 5.86 करोड़ का जुर्माना लगाया लेकिन इन अधिकारियों ने सिर्फ 2.84 करोड़ रुपये जुर्माना जमा कराया। जबकि 3.02 करोड़ की जुर्माना राशि वसूलना बाकी है । आयोग ने पिछले 20 वर्षों में 92.22 लाख रुपये की क्षति पूर्ति मुआवजा राशि भी आवेदकों को दोषी सूचना अधिकारियों से दिलवाई। एक्ट के उल्लंघन व समय से सूचना न देने के 1974 सूचना अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने के लिए सरकार को अनुशंसा की।
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पीपी कपूर ने आरोप लगाया कि आरटीआई एक्ट को खत्म किया जा रहा है। सूचना अधिकारी समय से सूचना नहीं देते और फिर सूचना आयोग में अपील करने पर कोर्ट से भी लंबी तारीख लगाकर अपीलकर्ताओं को चक्कर कटाए जा रहे हैं। कपूर ने आयोग में लंबित सभी केसों को युद्ध स्तर पर तय समय में निपटाने, आरटीआई एक्ट को प्रभावी ढंग से लागू करने, डिफाल्टर सूचना अधिकारियों से बकाया 3.02 करोड़ रुपये की जुर्माना राशि वसूल करने की मांग की है। इसके साथ जन सूचना अधिकारियों व प्रथम अपीलीय अधिकारियों को आरटीआई एक्ट-2005 का प्रशिक्षण दिया जाएं।
बॉक्स
आयोग के पास अधिकारियों की सूची तक नहीं
सूचना आयोग के पास प्रदेश के जन सूचना अधिकारियों व प्रथम अपीलीय अधिकारियों की सूची तक नहीं है। ऐसे में सूचना लेने के लिए आमजन को परेशानी हो ही है। आवेदक किसको आरटीआई लगाएं। किसे प्रथम अपील करें। इसके अलावा राज्य जन सूचना अधिकारियों व प्रथम अपीलीय अधिकारियों को आरटीआई एक्ट-2005 के कोई प्रशिक्षण को लेकर भी कोई जानकारी नहीं है।
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एक साल में सिर्फ 1124 केस पिटाए
एक जनवरी 2024 में आयोग में लंबित 8340 थे। 31 दिसंबर 2024 में घट कर 7216 रह गए हैं। यानि पूरे वर्ष में सिर्फ 1124 लंबित केसों का निपटान किया गया। यही गति रही तो लंबित केसों का निबटान होने में करीब आठ वर्ष लग सकते हैं ।
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यह खुलासा राज्य सूचना आयोग द्वारा दी एक सूचना में हुआ है। काबिलेगौर है कि आयोग सूचना अधिकारियों पर लगाई पूरी जुर्माना राशि भी वसूल नहीं कर पाया है। आयोग ने 5.86 करोड़ में से 2.84 करोड़ की जुर्माना राशि वसूली है। बाकी 3.02 करोड़ की वसूली नहीं हो सकी है। इन 20 सालों में सूचना आयोग पर 128.39 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। बात आरटीआई एक्ट के बारे में जनता को जागरूक करने की करें तो पिछले 14 वर्षों में कोई उल्लेखनीय खर्च नहीं किया गया है। हालांकि आयोग ने 92.22 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति अपीलकर्ताओं को जरूर दिलवाया है।
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यह सूचना पानीपत के आरटीआई कार्यकर्ता पीपी कपूर ने ने मांगी थी। पीपी कपूर ने बताया कि लोगों को आरटीआई एक्ट लागू होने के बाद किसी प्रकार की सूचना मांगने और सूचना न देने पर त्वरित कार्रवाई की उम्मीद जगी थी। आयोग में ही मामलों की सुनवाई लंबी चलने लगी। उन्होंने बताया कि सूचना आयोग से आरटीआई के अंतर्गत विभिन्न अपीलों व शिकायतों के 7216 केस लंबित है । आयोग में सूचना आयुक्तों व स्टाफ के वेतन पर पिछले बीस वर्षो में 92 करोड़ रुपये व कैपिटल हेड पर 36.39 करोड़ रुपये सहित 128.39 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। जबकि पिछले 20 वर्ष में आरटीआई एक्ट बारे जनता को जागरूक करने पर मात्र 2.50 लाख रुपये खर्च किए हैं। पिछले 14 वर्ष में इस पर कोई पैसा नहीं लगाया। सूचना न देने के डिफाल्टर सूचना अधिकारियों पर आयोग ने 5.86 करोड़ का जुर्माना लगाया लेकिन इन अधिकारियों ने सिर्फ 2.84 करोड़ रुपये जुर्माना जमा कराया। जबकि 3.02 करोड़ की जुर्माना राशि वसूलना बाकी है । आयोग ने पिछले 20 वर्षों में 92.22 लाख रुपये की क्षति पूर्ति मुआवजा राशि भी आवेदकों को दोषी सूचना अधिकारियों से दिलवाई। एक्ट के उल्लंघन व समय से सूचना न देने के 1974 सूचना अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने के लिए सरकार को अनुशंसा की।
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पीपी कपूर ने आरोप लगाया कि आरटीआई एक्ट को खत्म किया जा रहा है। सूचना अधिकारी समय से सूचना नहीं देते और फिर सूचना आयोग में अपील करने पर कोर्ट से भी लंबी तारीख लगाकर अपीलकर्ताओं को चक्कर कटाए जा रहे हैं। कपूर ने आयोग में लंबित सभी केसों को युद्ध स्तर पर तय समय में निपटाने, आरटीआई एक्ट को प्रभावी ढंग से लागू करने, डिफाल्टर सूचना अधिकारियों से बकाया 3.02 करोड़ रुपये की जुर्माना राशि वसूल करने की मांग की है। इसके साथ जन सूचना अधिकारियों व प्रथम अपीलीय अधिकारियों को आरटीआई एक्ट-2005 का प्रशिक्षण दिया जाएं।
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आयोग के पास अधिकारियों की सूची तक नहीं
सूचना आयोग के पास प्रदेश के जन सूचना अधिकारियों व प्रथम अपीलीय अधिकारियों की सूची तक नहीं है। ऐसे में सूचना लेने के लिए आमजन को परेशानी हो ही है। आवेदक किसको आरटीआई लगाएं। किसे प्रथम अपील करें। इसके अलावा राज्य जन सूचना अधिकारियों व प्रथम अपीलीय अधिकारियों को आरटीआई एक्ट-2005 के कोई प्रशिक्षण को लेकर भी कोई जानकारी नहीं है।
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एक साल में सिर्फ 1124 केस पिटाए
एक जनवरी 2024 में आयोग में लंबित 8340 थे। 31 दिसंबर 2024 में घट कर 7216 रह गए हैं। यानि पूरे वर्ष में सिर्फ 1124 लंबित केसों का निपटान किया गया। यही गति रही तो लंबित केसों का निबटान होने में करीब आठ वर्ष लग सकते हैं ।