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Panipat News: कांता महाराज ने सुनाया परीक्षित-शुकदेव प्रसंग
Fri, 22 May 2026 01:11 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
Updated Fri, 22 May 2026 01:11 AM IST
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प्रेम मंदिर में कथा सुनाती कांता देवी महाराज। स्रोत : समिति
पानीपत। प्रेम मंदिर में पुरुषोत्तम मास में चल रही साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन वीरवार को कथाव्यास कांता देवी महाराज ने कथा में परीक्षित-शुकदेव का प्रसंग सुनाया और श्रद्धालुओं को मोह व त्याग का संदेश दिया।
उन्होेंने बताया कि एक बार शिकार से लौटते हुए राजा परीक्षित को प्यास लगी। वे शमीक ऋषि के आश्रम पहुंचे। ऋषि समाधि में लीन थे, इसलिए उन्होंने राजा का अभिवादन नहीं किया। प्यास और अहंकार में आकर राजा ने एक मृत सांप ऋषि के गले में डाल दिया। तब शमीक ऋषि के पुत्र शृंगी को यह बात पता चली तो उन्होंने क्रोध में परीक्षित को शाप दिया कि आज से सातवें दिन तक्षक नामक नाग उन्हें डंस लेगा। राजा परीक्षित को अपनी गलती का अहसास हुआ, तो उन्होंने राजपाट त्याग दिया और गंगा तट पर मृत्यु का इंतजार करने लगे। उन्हें ज्ञान देने के लिए ज्ञानी और विरक्त संत शुकदेव महाराज वहां पधारे। राजा ने उनसे पूछा कि जिसकी मृत्यु सामने हो उसे क्या करना चाहिए। शुकदेव ने परीक्षित को सात दिनों तक निरंतर श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा सुनाई। शुकदेव ने समझाया कि शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है। मृत्यु केवल चोला बदलती है। कथा के प्रभाव से राजा परीक्षित को आत्म-ज्ञान प्राप्त हुआ और वे मोह-माया से विरक्त हो गए। सातवें दिन तक्षक नाग के काटने पर उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। कथा के बाद महिला मंडली ने भजन-कीर्तन किया और भगवान की महिमा का वर्णन किया। मंदिर समिति की सदस्य सुमन ने बताया कि मंदिर में कथा कांता देवी महाराज द्वारा साढ़े पांच से साढ़े आठ बजे तक तीन घंटे की जा रही है। कथा का विश्राम 26 मई को होगा। समापन पर सुबह कथा और विशाल भंडारा होगा।
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उन्होेंने बताया कि एक बार शिकार से लौटते हुए राजा परीक्षित को प्यास लगी। वे शमीक ऋषि के आश्रम पहुंचे। ऋषि समाधि में लीन थे, इसलिए उन्होंने राजा का अभिवादन नहीं किया। प्यास और अहंकार में आकर राजा ने एक मृत सांप ऋषि के गले में डाल दिया। तब शमीक ऋषि के पुत्र शृंगी को यह बात पता चली तो उन्होंने क्रोध में परीक्षित को शाप दिया कि आज से सातवें दिन तक्षक नामक नाग उन्हें डंस लेगा। राजा परीक्षित को अपनी गलती का अहसास हुआ, तो उन्होंने राजपाट त्याग दिया और गंगा तट पर मृत्यु का इंतजार करने लगे। उन्हें ज्ञान देने के लिए ज्ञानी और विरक्त संत शुकदेव महाराज वहां पधारे। राजा ने उनसे पूछा कि जिसकी मृत्यु सामने हो उसे क्या करना चाहिए। शुकदेव ने परीक्षित को सात दिनों तक निरंतर श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा सुनाई। शुकदेव ने समझाया कि शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है। मृत्यु केवल चोला बदलती है। कथा के प्रभाव से राजा परीक्षित को आत्म-ज्ञान प्राप्त हुआ और वे मोह-माया से विरक्त हो गए। सातवें दिन तक्षक नाग के काटने पर उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। कथा के बाद महिला मंडली ने भजन-कीर्तन किया और भगवान की महिमा का वर्णन किया। मंदिर समिति की सदस्य सुमन ने बताया कि मंदिर में कथा कांता देवी महाराज द्वारा साढ़े पांच से साढ़े आठ बजे तक तीन घंटे की जा रही है। कथा का विश्राम 26 मई को होगा। समापन पर सुबह कथा और विशाल भंडारा होगा।
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प्रेम मंदिर में कथा सुनाती कांता देवी महाराज। स्रोत : समिति
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