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उद्योगपतियों ने अपने प्रयासों से 12 एमएलडी पानी किया कम, बचा रहे भूजल

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 19 Jul 2022 02:51 AM IST
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Industrialists reduced 12 mld water with their efforts, saving groundwater
पानीपत। जिले का 40 प्रतिशत क्षेत्र डार्क जोन में आ चुका है। शहर में हर रोज पांच हजार करोड़ पानी का दोहन हो रहा है। उद्यमियों ने अपने प्रयासों से पानी दोहन को काफी कम कर लिया है। दो साल पहले तक आठ हजार करोड़ लीटर पानी का दोहन होता था। अब सेक्टर-29 पार्ट वन एवं पार्ट टू के लगभग 800 उद्योगों से 30 एमएलडी पानी निकाला जा रहा है, जो कि पहले 42 एमएलडी था।
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यहां 42 एमएलडी के हिसाब से यहां सीटीईपी भी लगाया गया था। दो साल पहले तक इसकी क्षमता 21 एमएलडी थी। 21 एमएलडी पानी सड़कों पर बहता था। अब उद्यमियों ने बिना पानी के इस्तेमाल के धागा बनाना शुरू कर दिया है। बॉयलर व मशीनों में भी पानी का कम इस्तेमाल किया जा रहा है। पानी का दोहन करने की बजाय उद्यमी नहरी पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। उद्यमियों के इस प्रयास को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी सराहा है।
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बिना पानी के इस्तेमाल के हर रोज बन रहा 10 लाख किलोग्राम रंगीन धागा
अब पानीपत के उद्यमी हर रोज 10 लाख किलोग्राम रंगीन धागे का उत्पादन कर रहे हैं। पानीपत का धागा घरेलू मार्केट के साथ-साथ विश्व भर में पहुंचाया जा रहा है। इस धागे की क्वालिटी भी दूसरे देशों के धागे से काफी अच्छी बताई जा रही है। अब धागा मिल जर्मनी में बनी अत्याधुनिक मशीन का इस्तेमाल कर रहे हैं। 510 मशीनों से मिलों में धागा उत्पादन किया जा रहा है। एनजीटी और सीपीसीबी की कार्रवाई से बचने के लिए उद्यमी जर्मनी में बनी अत्याधुनिक मशीनें लगाना शुरू कर चुके हैं। नई मशीन से पानीपत में प्रदूषण नियंत्रण में मदद मिली है। धागे बनाने में पानी का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। इसलिए भू-जल का दोहन भी नहीं हो रहा है।
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भूजल प्राधिकरण की कार्रवाई से भी कम हुआ पानी का दोहन
भूजल प्राधिकरण ने भूजल दोहन को लेकर कड़े कदम उठाए हैं। जो उद्योग बिना परमिशन के भूजल का दोहन करते मिल रहे हैं उनको हर्जाना देना पड़ रहा है। अब 10 हजार लीटर पानी का दोहन करने वालों के लिए भी परमिशन का अनिवार्य कर दिया गया है। इसलिए उद्यमी अब पानी का बहुत कम दोहन कर रहे हैं।
डाइंग में भी कम इस्तेमाल हो रहा पानी
एक बड़ा डाइंग यूनिट हर रोज 50-80 हजार लीटर पानी का दोहन करता है। बॉयलर पर डाइंग का पूरा कारोबार निर्भर है। उद्यमियों ने अब डाइंग में उन केमिकल का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया जिनमें पानी की लागत कम है। डाइंग करते हुए पहले के मुकाबले काफी कम पानी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

पहले 42 एमएलडी पानी निकलता था- भीम
दो साल पहले तक उद्योगों से 42 एमएलडी पानी निकलता था। इसलिए यहां पर 42 एमएलडी की क्षमता का एसटीईपी लगाया गया था। 21 एमएलडी पानी पहले सड़कों पर बह जाता था। अब उद्योगों से 30 एमएलडी पानी निकल रहा है। उद्यमियों के प्रयासों से 12 एमएलडी पानी का इस्तेमाल कम कर दिया गया है। आने वाले समय में ये और भी कम होगा।
भीम राणा, प्रधान डायर्स एसोसिएशन पानीपत।
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