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त्योहार में जाना है घर तो झेल रहे हर सितम

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 07 Nov 2021 12:36 AM IST
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If you have to go to the festival, then you are facing every problem.
संजय चौक पर फ्लाईओवर के नीचे खड़ी बस में सवारियां भरते हुए बस संचालक। - फोटो : Panipat
पानीपत। छठ पर्व पर प्रवासी अपने गांव जा रहे है, लेकिन प्रवासियों को यूपी व बिहार ले जाने वाली बसें फुल हैं। शनिवार को यूपी के गोंडा जिले की ओर जाने वाली निजी बस बस सवारियों से खचाखच भरी थी। इसमें पैर रखने तक की जगह नहीं थी। कोरोना काल में दो गज तो दूर, दो इंच की भी दूरी नहीं थी।
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बस में गर्मी और उमस बनने से बच्चे चिल्ला रहे थे। जवान लोग तक दम घुटने से परेशान हो रहे थे। लोग खिड़कियों से अपने मुंह को बाहर निकाल कर सांस लेने की कोशिश कर रहे थे। कुछ लोग अपने व अपने परिचितों के सामान को बस के ऊपर लाद रहे थे। कुछ लोग नीचे खड़े होकर बस में चढ़ने की बारी का इंतजार कर रहे थे। मजबूरी में अपने घर जाने की चाहत लिए बस में बैठी इन सवारियों को दुर्घटना या कोरोना का तो खौफ नहीं था लेकिन बस संचालकों के लालच के सामने ये बेबस थे, क्योंकि घर पहुंचाने का लालच देकर इन लोगों से एडवांस में ही 1500 रुपये प्रति सवारी किराया वसूल कर लिया गया था।
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किसी में विरोध करने की हिम्मत नहीं
अगर किसी ने मौके पर जाने से मना किया या विरोध किया तो उसका किराया जब्त समझा जाना था। लोग भी मजबूरी में इनके हत्थे चढ़ते दिखाई दिए। कुछ डर के मारे अपने बच्चों को गोद में उठाए बाहर ही खड़े रहे ताकि जब बस चले तब बैठ लेंगे तो कुछ चुपचाप अंदर बैठ गए। विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं दिखी। एक परिवार ने इसका विरोध किया तो उनको जबरदस्ती बस से नीचे उतार दिया गया।
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एक सीट पर तीन बैठाने की कोशिश, विरोध किया तो नीचे उतारा
अपने घर जा रहे एक परिवार के कुछ लोगों ने बस में ठूंस-ठूंस कर भरे जाने का विरोध किया तो बस संचालक ने उन्हें नीचे उतार दिया। इन लोगों ने बताया कि उनके पास बच्चे हैं। बस संचालक पहले ही एक सीट पर तीन-तीन लोगों को बिठाने की कोशिश कर रहा था, जबकि एक सीट पर दूसरा आदमी तक नहीं बैठ सकता। फिर एक सीट पर दो लोग और गोद में बच्चा बिठाने की बात कही। अब 18 घंटे का सफर ऐसे कैसे काटा जा सकता है। इसका विरोध किया तो बस संचालक ने सभी को अभद्र व्यवहार करते हुए नीचे उतार दिया। अब ये लोग इनकी शिकायत पुलिस को करने का मन बना चुके हैं।
मजबूरी के आगे टेके घुटने
हमारी मजबूरी है। दिवाली पर घर जाना था लेकिन साधन नहीं है। अब छठ पर घर जा रहे हैं लेकिन भीड़ बहुत है। 1500 रुपये किराया मांग रहे हैं। इसमें भीड़ बहुत है, साथ में छोटा बच्चा है। कैसे जाएं समझ नहीं आ रहा, परेशान हैं। -रंजीत
अमूमन लगते हैं 350 रुपये तक
आम तौर पर अगर बस या ट्रेन से घर जाएं तो किराया 300 से 350 रुपये तक का लगता है। पहले ट्रेन से जाते थे, अब टिकट नहीं मिल रही। फिर सरकारी बस से, अब वो भी नही मिलती। इसलिए मजबूरी में इनमें जाना पड़ता है। -महेंद्र सिंह
किराया भी ज्यादा और परेशानी भी
इन बसों में बैठकर सवारी करने का बिल्कुल मन नहीं है। अब घर जाने की पूरी तैयारी करके आएं हैं तो जाना ही पड़ेगा। इनका किराया भी ज्यादा है और परेशानी तो सबसे ज्यादा है ही। लेकिन क्या करें विकल्प नहीं है। -अतुल
भीड़ देख बदला मन, नहीं जाएंगे
एक बस में इतनी भीड़ देखकर मन बदल गया है। अब नहीं जाएंगे। इस भीड़ में तो सांस लेना तक दूभर हो रहा है। ऐसे में 18 घंटे कैसे बीतेंगे। जान को हथेली पर रखने की बजाए यहीं रहेंगे तो बेहतर है। -अंकित
विरोध किया तो नीचे उतरा, करेंगे शिकायत
एक सीट पर दो से तीन लोगों को बैठा रहे थे। पहले ही भीड़ ज्यादा है। विरोध किया तो कहा एक पर दो बैठ जाओ और बच्चा गोद में ले लो। ऐसे 18 घंटे का सफर कैसे कट सकता है। विरोध किया तो बदतमीजी करते हुए नीचे उतार दिया। अब इसकी शिकायत पुलिस को करेंगे। -गीता
मजबूरी में भारी परेशानी
ये लोग मजबूरी में हम लोगों को फायदा उठा रहे हैं। अगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट हो तो हम लोग आसानी से आ जा सकते हैं। सरकार को राजस्व का भी फायदा होगा लेकिन मिलीभगत से सरकार को चूना लगाया जा रहा है और लोगों को परेशान किया जा रहा है। -उपेंद्र

इतनी भीड़ में घुटता है दम
बस के अंदर सैकड़ों लोगों को ठूंस-ठूंस कर भरा गया था। ऐसे में अंदर दम घुटने लगा। कोरोना या दुर्घटना की तो बस संचालकों को चिंता ही नहीं है। लोगों की जान से खिलवाड़ किया जा रहा है। यह सरासर गलत है। -कृष्णावती
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