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चांदनी रातों में अब चौपालों-गलियारों में नहीं गूंजते होली गीत

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 11 Mar 2022 01:38 AM IST
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Holi songs no longer resonate in the chaupal-corridors in moonlit nights
पानीपत। होली ए, होली तेरा लांबा टीका, लांबी डस की डोरी...जैैसे गीतों की गूंज अब चौपालों-गलियारों में सुनाई नहीं देती। पहले जो होली पर्व का लोगों में चाव था, वो अब फीका पड़ता जा रहा है। साल-दर-साल पुराने रीति-रिवाज को भुलाकर लोग माडर्न सोच के साथ होली मना रहे हैं। हर साल फाग के रंगों की चमक फीकी पड़ती जा रही है। होली पर्व को लेकर यह कहना है जिले की कुछ बुजुर्ग लोगों व महिलाओं का। उन्होंने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में कहा कि आज होली पर्व मनाने के तौर-तरीके ही बदल गए हैं।
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बुजुर्गों का कहना है कि पुराने समय में तो फाग का माह शुरू होते ही होली उत्सव शुरू हो जाता था। महिला फाग की चांदनी रात्रि में होली पर विभिन्न खेल करती थी। गांव के मेन चौक, गलियारे, चौपाल आदि में एकत्र होकर महिलाएं होली के गीत गाती थीं। होली गीतों में महिलाएं अपने परिजनों के नाम लेकर मंगलकामना करतीं थीं।
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होली हे, होली तेरा लांबा टीका, लांबा डस की डोरी गीत सबसे लोकप्रिय होता था। इस गीत को महिलाएं रात के समय समूह में बैठकर गाती थी। रात के समय चौक में लड़कियां एकत्र होकर फेरी लगाती थी और लूर डालती थीं। महिलाओं का कहना है कि मौजूदा फाग माह में गलियां सूनी रहती हैं। गांवों की गलियों व चौक में होली के गीतों की गूंज लुप्त हो गई है।
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ऐसे थे होली के लोकगीत
- बहणा आया है फागुन मास सखी, सब हिलमिल खेले होली
- कल मिला मुझे नंदलाला, रंग हंसी-हंसी में डाला
- मैं तो बंसी वाले तै हारी, चलावै नैनों से पिचकारी
- अरे मनमोहन मदन गोपाल सखियन संग खेले होली
- रंग से कैसे होली खेलूंगी मैं कान्हाजी के संग
समय के साथ गायब हुआ गलियारों का हुड़दंग
वो बच्चों की टोलियां का गलियारों में हुड़दंग मचाना, गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले महिलाओं का होली के लोकगीत गाना, दस दिन पहले ही मित्रों संग होली का हुड़दंग मचाना, इसका अलग ही आनंद था। गली-गली होली का चंदा जमा करना, बड़ा ही सुहाना था वो होली का त्योहार। कभी आस-पड़ोस में मौसी की गुझिया और कांजी के बड़े खाना, तो कभी अपने दोस्तों संग हल्ला मचाना। होली आते ही जहां घरों में पकवान की खुशबू महक उठती थी, वहीं मेहमानों की आवभगत भी खूब होती थी। अब स्वादिष्ट पकवान हों या गली मोहल्ले का माहौल, सब कुछ बदल गया है। - सुभाष चंद, गांव भालसी।
खत्म हो गया मेल-मिलाप
उस समय तो अपने आस पास की बहू बेटियों को भी बिल्कुल अपना समझा जाता था। सगे तो सगे आस-पड़ोस वालों के रिश्तेदारों तक मेल मिलाप चला करता था। पूरा दिन घरों में पकवान बनते थे और मेहमानों की आवभगत होती थी, लेकिन अब तो सबकुछ बस घरों में ही सिमट कर रह गया है। सदर निवासी ललतेश कहती है आजकल तो मानों रिश्तों में मेल-मिलाप की कोई जगह ही न रही हो। - रमेश कुमार, ग्रामीण, मडलौडा।
गलियों में नहीं गूंजते होली के रंगीले गीत
आज होली के रंगीले एवं हरियाणवी गीत गलियों और चौपालों में नहीं गूंजते। उनके समय तो फागण शुरू होते ही मस्ती का दौर शुरू हो जाता था। रात के समय महिलाएं होली खेलती थी आज होली पर्व की रिवाज आदि सब गायब हो गई हैं। - रोशनी देवी, गांव भालसी।

आज भी याद है वो कोरडे़ का फाग
म्हारे टैम म्ह तो कोरड़ा से फाग खेलते थे। फाग के दिन चौक में कढ़ाई में पानी डालकर लोग-लुगाई इकट्ठे होली खेलते थे। गांव की छोरियां गीत गाते सिर पर पानी लाकर कढ़ाई को भरतीं थीं। कढ़ाई पर होली खेलने के बाद प्रसाद यानी शक्कर व पतासा बांटा जाता था। आज समाज में वैरभाव बढ़ा है। आपसी प्रेमभाव नहीं रहा। - बिमला देवी, गांव नौल्था।
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