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Panipat News: खौफ के साये में बीते चार माह, हर दिन मिलता था लक्ष्य, पूरा न होने पर मिलती थी सजा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 15 Jan 2026 02:36 AM IST
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Four months passed in fear, every day a target was set, and if it was not met, punishment was meted out.
पानीपत। साइबर क्राइम थाने पर पहुंचकर युवक ने आपबीती सुनाई तो पुलिसकर्मी भी हैरान रह गए। चार माह तक वह खौफ के साये में रहा, हर दिन नया टारगेट मिलता था, पूरा होने पर सजा दी जाती थी। कई बार तो उसके साथियों को रातभर खड़ा रहने की सजा दी गई, उसके साथ भारत के अन्य राज्यों पश्चिमी बंगाल, मध्यप्रदेश, यूपी और कर्नाटक के युवक भी बंधक बनाए गए थे। उसे न्यूयार्क की ब्यूटी पार्लर संचालिका के नाम से आईडी बनाकर दी गई। लिंक्ड इन आईडी से अमेरिकी व्यक्तियों के नंबर और डिटेल लेने और चैट करने का लक्ष्य रखा गया।
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युवक ने बताया कि वह जैसे ही बैंकॉक से ताक पहुंचे और वहां से ताक के होटल में ले जाया गया। यहां तक तो सब ठीक रहा, लेकिन अगले दिन तीन-चार युवक आए और उसे कार में बैठाकर ले गए। दो घंटे चलने के बाद ही कार जंगलों में पहुंच गई जहां पर अन्य कार और युवक भी थे। इसके बाद काफी देर तक कार जंगलों के रास्तों पर ही चलती रही, जिस पर उसे गलत हाथों में पड़ने की आशंका हो गई थी। इसके बाद नदी पार कराकर उन्हें केके पार्क पहुंचा।
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गेट पर पहुंचते ही कंपनी के एक कर्मचारी ने उन्हें बता दिया था कि साइबर स्कैम करना होगा। उसने वापस आने को कहा तो कंपनी ने कहा कि उस पर पांच हजार डालर खर्च हो गए, पैसे देकर जा सकते हैं। चेतावनी दी गई कि भागने का प्रयास करने पर गोली मार देंगे। एक चाइनीज व्यक्ति ने उसका इंटरव्यू लिया और उसे न्यूयार्क की ब्यूटी पार्लर संचालिका महिला के नाम से आईडी बनाकर दी। कंपनी ने लिंक्डइन आईडी से अमेरिका नागरिकों के नंबर और डिटेल उठाने का काम दिया गया। एक दिन में करीब 300 नंबरों का लक्ष्य दिया गया था। इन नंबरों को आगे भेजा जाता था जहां पर नंबरों पर चैट होती थी। साइबर ठगी का शिकार होने पर उन्हें 10 फीसदी का बोनस दिया जाता था और टारगेट पूरा न होने पर सजा मिलती थी। कई बार उसके साथ काम करने वाले युवकों को रातभर खड़ा रहने की सजा दी गई।
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घर पर बात करते समय होती थी निगरानी
वह जून से 25 अक्तूबर तक एक कंपनी में रहा, जहां पर उन्हें हर दिन धमकी दी जाती थी। उनका पासपोर्ट और अन्य दस्तावेज भी कंपनी ने अपने पास रख लिए थे। जब वह घर पर बात करते थे तो उनकी निगरानी होती थी। वाईफाई से की बात की जाती थी। जैसे ही वह कॉल करते थे तो कंपनी के कर्मचारियों को इसका पता चल जाता था। उन्हें फोटो तक खींचने की अनुमति नहीं थी। जिस कारण वह हर दिन खौफ के साये में रहा।


जो आर्मी सुरक्षा में थी उसी ने की कार्रवाई
जिस कंपनी में वह काम कर रहा था उसमें 25 अक्तूबर को छापामारी हुई थी, जिस प्राइवेट आर्मी ने उन्हें कंपनी तक पहुंचाया था उसी ने छापेमारी की, जिसके बाद कंपनी ने उन्हें दूसरी कंपनी को बेच दिया। 25 अक्तूबर से 25 नवंबर तक उससे दूसरी कंपनी ने काम कराया। वहां पर भी दबिश पड़ी तो वह भाग निकला और थाई सेना के एक जवान की मदद से रेस्क्यू सेंटर पहुंच गया।
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