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Panipat News: नौल्था में 994 वर्ष से मनाया जा रहा ब्रज का फाग उत्सव, आज भी परंपरा कायम
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नौल्था गांव में रंगों की डाट लगाते ग्रामीण। स्रोत : आर्काइव
कुलदीप सिंह आर्य
इसराना। आज भी पानीपत जिले के नौल्था गांव में 994 वर्ष पुरानी फाग उत्सव की परंपरा को मनाया जा रहा है। इस बार ग्राम पंचायत व युवा फाग उत्सव को और भी बेहतर ढंग से मनाने की तैयारी की हैं। गांव में सूखी डाट लगने के बाद से महोत्सव का शुभारंभ हो चुका है। फाग के दिन रंगों की डाट लगाई जाएगी। हर बार आसपास के गांवों से ही नहीं बल्कि दूर-दूर से लोग नौल्था का फाग देखने आते हैं। आजादी से पहले अंग्रेजों ने एक बार फाग पर प्रतिबंध लगा दिया था। ग्रामीणों की जिद्द के आगे अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा और एक सप्ताह बाद फाग उत्सव मनाया गया।
कोट्स फोटो
बाबा लाठे वाले व देवी देवताओं की निकाली जाती हैं झांकियां
ग्रामीण चंद्र सिंह जागलान ने बताया कि फाग के दिन बाबा लाठे वाले व देवी देवताओं की झांकियां निकाल कर गांव की सभी चौपालों पर कढ़ायों में रंग उबाल कर रंगों की डाट खेली जाती है। एक समय था कि जब गांव के घूमन जैलदार के बेटे सरदारा की फाग के दिन मौत हो गई। पूरे गांव में मातम छा गया था। फाग उत्सव को रोक दिया गया था। वर्षों से चली आ रही परंपरा को बनाए रखने के लिए घूमन जैलदार ने अपने बेटे के शव को रंग की पिचकारी मारी और ग्रामीणों के साथ फाग उत्सव मनाया। इसके बाद संस्कार किया गया।
कोट्स फोटो
रंग पकाकर कढायों में भर लेते
ग्रामीण तेजबीर जागलान ने बताया कि फाग से कई दिन पूर्व गांव की चौपाल की दीवार के साथ दोनों तरफ ग्रामीण दोनों हाथ ऊपर उठा कर खड़े होकर जोर आजमाइश करते हैं। इसको सूखी डाट कहा जाता है। फाग के दिन ग्रामीण चौपाल के ऊपर रंग पकाकर कढाइयों में भर लेते हैं। लोग चौपाल के नीचे खड़े हो जाते हैं और उन पर ऊपर से रंग डाला जाता है। इसे रंगों की डाट कहते है। फाग उत्सव को एक बार अंग्रेजी सरकार ने 1944 में रोक के आदेश दिए थे। इसके बाद लोगों में रोष के चलते सात दिन बाद सीली सातम को फाग मनाने की छूट दी थी।
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कोट्स फोटो
इस संबंध में ग्राम पंचायत सरपंच बलराज जागलान ने बताया कि फाग उत्सव में चली आ रही परंपराओं को पूरा करने के लिए तैयारियां चल रही हैं। संचालन के लिए तीन स्तरीय कमेटी बनाई हैं। ग्रामीण मिलकर परंपरा को निभाएंगे।
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इसराना। आज भी पानीपत जिले के नौल्था गांव में 994 वर्ष पुरानी फाग उत्सव की परंपरा को मनाया जा रहा है। इस बार ग्राम पंचायत व युवा फाग उत्सव को और भी बेहतर ढंग से मनाने की तैयारी की हैं। गांव में सूखी डाट लगने के बाद से महोत्सव का शुभारंभ हो चुका है। फाग के दिन रंगों की डाट लगाई जाएगी। हर बार आसपास के गांवों से ही नहीं बल्कि दूर-दूर से लोग नौल्था का फाग देखने आते हैं। आजादी से पहले अंग्रेजों ने एक बार फाग पर प्रतिबंध लगा दिया था। ग्रामीणों की जिद्द के आगे अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा और एक सप्ताह बाद फाग उत्सव मनाया गया।
कोट्स फोटो
बाबा लाठे वाले व देवी देवताओं की निकाली जाती हैं झांकियां
ग्रामीण चंद्र सिंह जागलान ने बताया कि फाग के दिन बाबा लाठे वाले व देवी देवताओं की झांकियां निकाल कर गांव की सभी चौपालों पर कढ़ायों में रंग उबाल कर रंगों की डाट खेली जाती है। एक समय था कि जब गांव के घूमन जैलदार के बेटे सरदारा की फाग के दिन मौत हो गई। पूरे गांव में मातम छा गया था। फाग उत्सव को रोक दिया गया था। वर्षों से चली आ रही परंपरा को बनाए रखने के लिए घूमन जैलदार ने अपने बेटे के शव को रंग की पिचकारी मारी और ग्रामीणों के साथ फाग उत्सव मनाया। इसके बाद संस्कार किया गया।
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रंग पकाकर कढायों में भर लेते
ग्रामीण तेजबीर जागलान ने बताया कि फाग से कई दिन पूर्व गांव की चौपाल की दीवार के साथ दोनों तरफ ग्रामीण दोनों हाथ ऊपर उठा कर खड़े होकर जोर आजमाइश करते हैं। इसको सूखी डाट कहा जाता है। फाग के दिन ग्रामीण चौपाल के ऊपर रंग पकाकर कढाइयों में भर लेते हैं। लोग चौपाल के नीचे खड़े हो जाते हैं और उन पर ऊपर से रंग डाला जाता है। इसे रंगों की डाट कहते है। फाग उत्सव को एक बार अंग्रेजी सरकार ने 1944 में रोक के आदेश दिए थे। इसके बाद लोगों में रोष के चलते सात दिन बाद सीली सातम को फाग मनाने की छूट दी थी।
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इस संबंध में ग्राम पंचायत सरपंच बलराज जागलान ने बताया कि फाग उत्सव में चली आ रही परंपराओं को पूरा करने के लिए तैयारियां चल रही हैं। संचालन के लिए तीन स्तरीय कमेटी बनाई हैं। ग्रामीण मिलकर परंपरा को निभाएंगे।

नौल्था गांव में रंगों की डाट लगाते ग्रामीण। स्रोत : आर्काइव

नौल्था गांव में रंगों की डाट लगाते ग्रामीण। स्रोत : आर्काइव

नौल्था गांव में रंगों की डाट लगाते ग्रामीण। स्रोत : आर्काइव