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तानों को पीछे छोड़ आईएएस बनीं
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पानीपत। मधुमिता व अपने पिता महावीर के साथ।
- फोटो : Panipat
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पानीपत। लोगों के तानों ने 26 वर्षीय मधुमिता के इरादे इतने मजबूत कर दिए कि उन्होंने अपने मेहनत से आईएएस में ऑल इंडिया 86वीं रैंक हासिल की। बेटी पढ़ाओ... की मिसाल बनकर आज ओडिशा के शहर गंजम में सब कलेक्टर हैं। अपनी सफलता को उन्होंने लड़कियों के लिए प्रेरणा में बदल दिया है।
पानीपत निवासी मधुमिता ने बताया कि वह परिवार की पहली लड़की हैं, जो इतना पढ़ सकीं। परिवार में 20 से 22 वर्ष की उम्र में विवाह का सोचना शुरू कर दिया जाता है लेकिन उनका इरादा अटल था। उनका तीसरा प्रयास था और रिश्ते एवं नातेदारों के तानें कानों में पड़ने लगे कि इसकी शादी कब कराएंगे। इन तानों ने उनके इरादे बेहद मजबूत कर दिए। आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण की और इस वक्त ओडिशा के गंजम में सब कलेक्टर हैं, उनकी ट्रेनिंग चल रही है।
अलमारी पर लगाई थी पिता की फोटो, मिलती थी प्रेरणा
मधुमिता ने बताया कि उन्होंने तैयारी के दौरान अलमारी पर अपने पिता की फोटो लगाकर रखी थी। जिसे देखकर प्रेरणा मिलती थी। इस सफलता के पीछे उनके पिता महावीर सिंह का सबसे बड़ा योगदान रहा। उन्होंने ही आईएएस बनने के लिए हौसला दिया। पिता महावीर सिंह ने 1987 में आईएएस बनने का सपना देखा। परीक्षा में बैठे लेकिन किन्हीं कारणों से उत्तीर्ण नहीं हो सके। इसके बाद उन्होंने दोबारा परीक्षा ही नहीं दी।
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पानीपत निवासी मधुमिता ने बताया कि वह परिवार की पहली लड़की हैं, जो इतना पढ़ सकीं। परिवार में 20 से 22 वर्ष की उम्र में विवाह का सोचना शुरू कर दिया जाता है लेकिन उनका इरादा अटल था। उनका तीसरा प्रयास था और रिश्ते एवं नातेदारों के तानें कानों में पड़ने लगे कि इसकी शादी कब कराएंगे। इन तानों ने उनके इरादे बेहद मजबूत कर दिए। आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण की और इस वक्त ओडिशा के गंजम में सब कलेक्टर हैं, उनकी ट्रेनिंग चल रही है।
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अलमारी पर लगाई थी पिता की फोटो, मिलती थी प्रेरणा
मधुमिता ने बताया कि उन्होंने तैयारी के दौरान अलमारी पर अपने पिता की फोटो लगाकर रखी थी। जिसे देखकर प्रेरणा मिलती थी। इस सफलता के पीछे उनके पिता महावीर सिंह का सबसे बड़ा योगदान रहा। उन्होंने ही आईएएस बनने के लिए हौसला दिया। पिता महावीर सिंह ने 1987 में आईएएस बनने का सपना देखा। परीक्षा में बैठे लेकिन किन्हीं कारणों से उत्तीर्ण नहीं हो सके। इसके बाद उन्होंने दोबारा परीक्षा ही नहीं दी।
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