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70 प्रतिशत लेबर का हुआ पलायन, ऑर्डर न मिलने से बंद हो रहीं फैक्टरियां
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संदीप भौरिया
पानीपत। शहर के ढाई लाख श्रमिक बिहार, बंगाल, यूपी, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान अपने घरों को पलायन कर चुके हैं। ऐसे में 90 हजार करोड़ रुपये का घरेलू व्यापार करने वाली और सरकार को सालाना 12 हजार करोड़ रुपये टेक्स देने वाली टेक्सटाइल नगरी आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है। उद्यमियों को लॉकडाउन के कारण ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। जिन उद्यमियों को ऑर्डर मिल रहे हैं, वे लेबर की कमी के कारण ऑर्डर पूरे नहीं कर पा रहे हैं। सात हजार से अधिक टेक्सटाइल व कंबल फैक्टरियों में मात्र 30 प्रतिशत ही उत्पादन हो रहा है। अब आर्डर न मिलने और लेबर की कमी के कारण उद्यमियों को फैक्टरियां बंद भी करनी पड़ रहीं हैं।
शहर का 10 हजार उद्यमियों का टेक्सटाइल कारोबार गंभीर संकट में है। यहां बनने वाले कारपेट, बाथमेट व दरी देश और विदेशों में सप्लाई होते हैं। लॉकडाउन में फैक्टरी खोलने पर छूट तो है, लेकिन 70 प्रतिशत यानि करीब ढाई लाख श्रमिक अपने घर की ओर यहां से पलायन कर चुके हैं। यहां पर 30 प्रतिशत प्रवासी और 10 प्रतिशत स्थानीय श्रमिक ही बचे हैं। अब इनमें से भी श्रमिक अपने घरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
पेमेंट फंसी हुई है : राकेश
पानीपत के उद्यमियों की बाहर के कारोबारियों व व्यापारियों में पेमेंट फंसी हुई है। अब नए ऑर्डर भी नहीं मिल रहे हैं। कोरोना महामारी में उद्योग आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। लॉकडाउन के कारण फैक्टरियों में काम ही नहीं है। इसलिए अब अधिकतर फैक्टरियों को बंद करना पड़ रहा है।
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-राकेश चुघ, उद्योगपति
डाइंग के लिए माल नहीं मिल रहा : राणा
उद्योग पर पिछले डेढ़ साल से आर्थिक मंदी की मार पड़ रही है। उन्होंने काफी मुश्किल से कुछ लेबर को रोका है, लेकिन डाइंग के लिए माल नहीं मिल रहा है। दिल्ली में लॉकडाउन के कारण पानीपत को सबसे अधिक नुकसान हो रहा है, क्योंकि दिल्ली की मार्केट ही पानीपत के लिए संजीवनी है।
- भीम राणा, प्रधान डायर्स एसोसिएशन
जब लेबर आएगी, तब काम शुरू होगा : अनिल
पानीपत में पांच हजार करोड़ की कारपेट इंडस्ट्री है। हरदोई के बाद पानीपत दूसरी बड़ी मंडी है। लेबर पलायन कर चुकी है, इसलिए उत्पादन काफी कम हो रहा है। जब लेबर वापस आएगी तब दोबारा काम पटरी पर आएगा।
- अनिल मितल, सचिव कारपेट मैन्यूफैक्चरिंग एसोसिएशन
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पानीपत। शहर के ढाई लाख श्रमिक बिहार, बंगाल, यूपी, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान अपने घरों को पलायन कर चुके हैं। ऐसे में 90 हजार करोड़ रुपये का घरेलू व्यापार करने वाली और सरकार को सालाना 12 हजार करोड़ रुपये टेक्स देने वाली टेक्सटाइल नगरी आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है। उद्यमियों को लॉकडाउन के कारण ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। जिन उद्यमियों को ऑर्डर मिल रहे हैं, वे लेबर की कमी के कारण ऑर्डर पूरे नहीं कर पा रहे हैं। सात हजार से अधिक टेक्सटाइल व कंबल फैक्टरियों में मात्र 30 प्रतिशत ही उत्पादन हो रहा है। अब आर्डर न मिलने और लेबर की कमी के कारण उद्यमियों को फैक्टरियां बंद भी करनी पड़ रहीं हैं।
शहर का 10 हजार उद्यमियों का टेक्सटाइल कारोबार गंभीर संकट में है। यहां बनने वाले कारपेट, बाथमेट व दरी देश और विदेशों में सप्लाई होते हैं। लॉकडाउन में फैक्टरी खोलने पर छूट तो है, लेकिन 70 प्रतिशत यानि करीब ढाई लाख श्रमिक अपने घर की ओर यहां से पलायन कर चुके हैं। यहां पर 30 प्रतिशत प्रवासी और 10 प्रतिशत स्थानीय श्रमिक ही बचे हैं। अब इनमें से भी श्रमिक अपने घरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
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पेमेंट फंसी हुई है : राकेश
पानीपत के उद्यमियों की बाहर के कारोबारियों व व्यापारियों में पेमेंट फंसी हुई है। अब नए ऑर्डर भी नहीं मिल रहे हैं। कोरोना महामारी में उद्योग आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। लॉकडाउन के कारण फैक्टरियों में काम ही नहीं है। इसलिए अब अधिकतर फैक्टरियों को बंद करना पड़ रहा है।
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-राकेश चुघ, उद्योगपति
डाइंग के लिए माल नहीं मिल रहा : राणा
उद्योग पर पिछले डेढ़ साल से आर्थिक मंदी की मार पड़ रही है। उन्होंने काफी मुश्किल से कुछ लेबर को रोका है, लेकिन डाइंग के लिए माल नहीं मिल रहा है। दिल्ली में लॉकडाउन के कारण पानीपत को सबसे अधिक नुकसान हो रहा है, क्योंकि दिल्ली की मार्केट ही पानीपत के लिए संजीवनी है।
- भीम राणा, प्रधान डायर्स एसोसिएशन
जब लेबर आएगी, तब काम शुरू होगा : अनिल
पानीपत में पांच हजार करोड़ की कारपेट इंडस्ट्री है। हरदोई के बाद पानीपत दूसरी बड़ी मंडी है। लेबर पलायन कर चुकी है, इसलिए उत्पादन काफी कम हो रहा है। जब लेबर वापस आएगी तब दोबारा काम पटरी पर आएगा।
- अनिल मितल, सचिव कारपेट मैन्यूफैक्चरिंग एसोसिएशन