{"_id":"5cd46cf0bdec2207726895e7","slug":"61557425392-panipat-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"रोक के बावजूद घरों में ही कराई जा रही डिलिवरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
रोक के बावजूद घरों में ही कराई जा रही डिलिवरी
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पानीपत। डिलिवरी के दौरान गर्भवती महिलाओं और शिशुओं की जान बचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग बीते दो वर्ष से हर महीने कैंप लगा रहा है, इसके बावजूद घरों में हो रही डिलिवरी पर स्वास्थ्य विभाग लगाम नहीं लगा सका है। इतना ही नहीं बीते एक वर्ष में डिलिवरी के दौरान 17 गर्भवती महिलाओं की मौत हो चुकी और सबसे बड़ी बात इन कैंपों के बावजूद आज भी जिले की 65 फीसदी गर्भवती महिलाओं में खून की कमी है। नतीजा प्रिमैच्योर डिलिवरी की संख्या बढ़ गई है। आंकड़ों पर गौर करें तो रोज औसतन चार शिशु प्रिमैच्योर पैैदा हो रहे हैं। यह आंकड़े स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है, जिसके लिए दो वर्ष से कैंप लगा रहे है, उसमें उनके सफलता नहीं मिल सकी है। ऐसे में कहीं न कहीं कमी है, नतीजा बच्चों की डिलिवरी के दौरान माताओं की मौत हो रही है और कमजोर बच्चे पैदा हो रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग गर्भवती महिलाओं को बचाने, प्री मैच्योर डिलिवरी रोकने, घरों में दाइयों की ओर से डिलिवरी कराने और शिशु मृत्यु दर को रोकने में इतने खर्च के बावजूद नाकाम साबित हो रहा है। पिछले 5 माह में 188 प्री मैच्योर डिलिवरी हुई हैं। स्वास्थ्य विभाग गर्भवती महिलाओं को स्वस्थ रखने के लिए हर माह की 9 की तारीख को प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा अभियान के तहत जिले के सरकारी अस्पताल समेत 13 केंद्रों पर गर्भवती चेकअप कैंप लगाया जाता है। औसतन 600-650 प्रसूताओं की यहां जांच होती है। हर माह 60-80 महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के दायरे में मिलती है।
घरों डिलिवरी पर रोक के बावजूद जिले में 150 दाइयां सक्रिय, दो साल में 550 शिशुओं की मौत : स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पानीपत में पिछले डेढ़ साल में 2310 महिलाओं की डिलिवरी घर पर हुई है। यह संख्या जिले भर में हुए प्रसव की 7.5 प्रतिशत है। पानीपत में पिछले डेढ़ साल में डिलीवरी दौरान 29 महिलाओं की मौत हुई। इनमें से अधिकतर महिलाएं वो हैं जिन्होंने दाई से डिलवरी कराने का प्रयास किया। जब उनकी स्थिति बिगड़ी तो उनको सिविल अस्पताल लाया गया, जहां तबियत गंभीर होने पर उनकी मौत हो गई। जिले में विभिन्न कारणों से दो साल में एक से पांच वर्ष की आयु के 550 नवजातों की मौत हुई। स्वास्थ्य विभाग सरकार के निर्देशों के बाद भी आज तक दाईयों के खिलाफ केस दर्ज नहीं करवा पाया है। जबकि जिले में लगभग 150 दाई सक्रिय है।
विज्ञापन
सरकारी अस्पतालों में ये मिलती है सुविधा:
1. सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में डिलिवरी कराने पर सरकार की ओर से गरीब परिवारों को 1500 रुपये मिलते हैं।
2. गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने के लिए सरकार की ओर फ्री सेवा है।
3. जन्म के 42 दिन बाद तक नवजात व 30 दिन तक महिला को अस्पताल आने जाने के लिए फ्री एंबुलेंस है।
4. डिलिवरी के बाद जच्चा को साफ टांगे लगते हैं। इससे उनमे संक्रमण का खतरा नहीं रहता।
5. किसी भी आपातकाल की स्थिति में जच्चा की केयर के लिए गायनोकॉलॉजिस्ट व बच्चे के लिए बाल रोग विशेषज्ञ होता है।
पिछले एक साल में हुई 17 महिलाओं की मौत : 2018 में जिले में कुल 28030 डिलिवरी हुई है। सरकारी अस्पताल में 15305 डिलिवरी हुई है, जबकि निजी अस्पताल में 11415 व होम डिलिवरी 1310 हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 17 गर्भवती महिलाओं की इस दौरान मौत हुई है।
इन कारणों से नहीं बंद हो रही घर में डिलिवरी : सबसे ज्यादा दाई सनौली, बापौली व यमुना से सटे गांवों में सक्रिय है। इन क्षेत्र में डॉक्टरों के अनुसार 50-70 दाई सक्रिय है। विभाग कई बार इनको घर पर डिलीवरी न करने की चेतावनी दे चुका है। फिर भी इन्हीं क्षेत्रों से डिलिवरी के अधिक मामले सामने आते हैं। इसका बड़ा कारण जागरूकता की कमी, शिक्षा का अभाव, स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्रवाई, स्वास्थ्य विभाग की ग्राउंड स्तर पर पहुंच की कमी होम डिलिवरी का बड़ा कारण है।
प्री मैच्योर डिलीवरी बढ़ रही है : जिले में लगातार प्री मैच्योर डिलीवरी बढ़ रही है। सिविल अस्पताल में हर रोज 30 से 35 डिलीवरी होती है। इनमें औसतन 4-5 प्री मैच्योर डिलीवरी होती है। प्री मैच्योर डिलिवरी का बड़ा कारण महिलाओं में संक्रमण, हाइपरटेंशन और प्री एक्लेम्शिया, खून की कमी व हाई ग्रेड फीवर है।
वीरवार को 13 स्वास्थ्य केंद्र पर 590 महिलाओं की हुई जांच : प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा अभियान के तहत जिले भर के 13 स्वास्थ्य केंद्रों पर 17 डॉक्टरों ने 590 गर्भवती महिलाओं की जांच की। जांच में 65 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी मिली। 70 महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के दायरे में पाई गई। इनको सिविल अस्पताल रेफर किया गया। सभी डॉक्टरों ने शाम तक अपनी रिपोर्ट सिविल सर्जन कार्यालय में जमा कराई।
होम डिलीवरी रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग प्रयासरत है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में गर्भवती महिलाओं के लिए विभिन्न प्रकार की सेवाएं भी है, लेकिन होम डिलिवरी का बड़ा कारण अशिक्षा और जागरूकता की कमी है। उनका प्रयास है कि लोगों तक सरकारी सेवाएं पहुंचे और उन्हें जागरूक किया जाए। दाईयों पर भी अंकुश लगाने के प्रयास जारी है।
डॉ. जितेंद्र कादियान, सिविल सर्जन पानीपत।
विज्ञापन
स्वास्थ्य विभाग गर्भवती महिलाओं को बचाने, प्री मैच्योर डिलिवरी रोकने, घरों में दाइयों की ओर से डिलिवरी कराने और शिशु मृत्यु दर को रोकने में इतने खर्च के बावजूद नाकाम साबित हो रहा है। पिछले 5 माह में 188 प्री मैच्योर डिलिवरी हुई हैं। स्वास्थ्य विभाग गर्भवती महिलाओं को स्वस्थ रखने के लिए हर माह की 9 की तारीख को प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा अभियान के तहत जिले के सरकारी अस्पताल समेत 13 केंद्रों पर गर्भवती चेकअप कैंप लगाया जाता है। औसतन 600-650 प्रसूताओं की यहां जांच होती है। हर माह 60-80 महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के दायरे में मिलती है।
विज्ञापन
घरों डिलिवरी पर रोक के बावजूद जिले में 150 दाइयां सक्रिय, दो साल में 550 शिशुओं की मौत : स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पानीपत में पिछले डेढ़ साल में 2310 महिलाओं की डिलिवरी घर पर हुई है। यह संख्या जिले भर में हुए प्रसव की 7.5 प्रतिशत है। पानीपत में पिछले डेढ़ साल में डिलीवरी दौरान 29 महिलाओं की मौत हुई। इनमें से अधिकतर महिलाएं वो हैं जिन्होंने दाई से डिलवरी कराने का प्रयास किया। जब उनकी स्थिति बिगड़ी तो उनको सिविल अस्पताल लाया गया, जहां तबियत गंभीर होने पर उनकी मौत हो गई। जिले में विभिन्न कारणों से दो साल में एक से पांच वर्ष की आयु के 550 नवजातों की मौत हुई। स्वास्थ्य विभाग सरकार के निर्देशों के बाद भी आज तक दाईयों के खिलाफ केस दर्ज नहीं करवा पाया है। जबकि जिले में लगभग 150 दाई सक्रिय है।
विज्ञापन
सरकारी अस्पतालों में ये मिलती है सुविधा:
1. सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में डिलिवरी कराने पर सरकार की ओर से गरीब परिवारों को 1500 रुपये मिलते हैं।
2. गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने के लिए सरकार की ओर फ्री सेवा है।
3. जन्म के 42 दिन बाद तक नवजात व 30 दिन तक महिला को अस्पताल आने जाने के लिए फ्री एंबुलेंस है।
4. डिलिवरी के बाद जच्चा को साफ टांगे लगते हैं। इससे उनमे संक्रमण का खतरा नहीं रहता।
5. किसी भी आपातकाल की स्थिति में जच्चा की केयर के लिए गायनोकॉलॉजिस्ट व बच्चे के लिए बाल रोग विशेषज्ञ होता है।
पिछले एक साल में हुई 17 महिलाओं की मौत : 2018 में जिले में कुल 28030 डिलिवरी हुई है। सरकारी अस्पताल में 15305 डिलिवरी हुई है, जबकि निजी अस्पताल में 11415 व होम डिलिवरी 1310 हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 17 गर्भवती महिलाओं की इस दौरान मौत हुई है।
इन कारणों से नहीं बंद हो रही घर में डिलिवरी : सबसे ज्यादा दाई सनौली, बापौली व यमुना से सटे गांवों में सक्रिय है। इन क्षेत्र में डॉक्टरों के अनुसार 50-70 दाई सक्रिय है। विभाग कई बार इनको घर पर डिलीवरी न करने की चेतावनी दे चुका है। फिर भी इन्हीं क्षेत्रों से डिलिवरी के अधिक मामले सामने आते हैं। इसका बड़ा कारण जागरूकता की कमी, शिक्षा का अभाव, स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्रवाई, स्वास्थ्य विभाग की ग्राउंड स्तर पर पहुंच की कमी होम डिलिवरी का बड़ा कारण है।
प्री मैच्योर डिलीवरी बढ़ रही है : जिले में लगातार प्री मैच्योर डिलीवरी बढ़ रही है। सिविल अस्पताल में हर रोज 30 से 35 डिलीवरी होती है। इनमें औसतन 4-5 प्री मैच्योर डिलीवरी होती है। प्री मैच्योर डिलिवरी का बड़ा कारण महिलाओं में संक्रमण, हाइपरटेंशन और प्री एक्लेम्शिया, खून की कमी व हाई ग्रेड फीवर है।
वीरवार को 13 स्वास्थ्य केंद्र पर 590 महिलाओं की हुई जांच : प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा अभियान के तहत जिले भर के 13 स्वास्थ्य केंद्रों पर 17 डॉक्टरों ने 590 गर्भवती महिलाओं की जांच की। जांच में 65 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी मिली। 70 महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के दायरे में पाई गई। इनको सिविल अस्पताल रेफर किया गया। सभी डॉक्टरों ने शाम तक अपनी रिपोर्ट सिविल सर्जन कार्यालय में जमा कराई।
होम डिलीवरी रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग प्रयासरत है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में गर्भवती महिलाओं के लिए विभिन्न प्रकार की सेवाएं भी है, लेकिन होम डिलिवरी का बड़ा कारण अशिक्षा और जागरूकता की कमी है। उनका प्रयास है कि लोगों तक सरकारी सेवाएं पहुंचे और उन्हें जागरूक किया जाए। दाईयों पर भी अंकुश लगाने के प्रयास जारी है।
डॉ. जितेंद्र कादियान, सिविल सर्जन पानीपत।