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हाईकोर्ट: जिस श्रेणी का नहीं था हकदार, उसमें बिताए 17 साल... अब प्रशासन को देना होगा पांच लाख का मुआवजा
Fri, 29 Sep 2023 01:33 AM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Fri, 29 Sep 2023 01:33 AM IST
सार
याची के पिता पंजाब सचिवालय में कार्यरत थे और उन्हें सुपरिंटेंडेंट ग्रेड 1 के अनुसार चंडीगढ़ में आवास अलॉट किया गया था। 2001 में उनकी मौत के बाद याची ने अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन किया था। याची को 2004 में क्लर्क की नौकरी दी गई लेकिन वे उच्च श्रेणी के मकान में ही रहते रहे।
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : File Photo
विस्तार
अदालत के आदेश पर जिस श्रेणी के लिए कर्मचारी पात्र नहीं था, उस उच्च श्रेणी के मकान में 17 साल तक रहा ऐसे में उसे इसके लिए मुआवजा चुकाना ही होगा। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने याची को आदेश दिया है कि वह मुआवजे के तौर पर यूटी प्रशासन को 5 लाख रुपये दे। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार के एक कर्मचारी की याचिका को आंशिक तौर पर मंजूर करते हुए यह आदेश जारी किया है।
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गुरनाम सिंह ने बताया कि उसके पिता पंजाब सचिवालय में कार्यरत थे और उन्हें सुपरिंटेंडेंट ग्रेड 1 के अनुसार चंडीगढ़ में आवास अलॉट किया गया था। याची के पिता की 2001 में मौत हो गई थी और याची ने अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन किया था। इस दौरान पंजाब में दो साल के लिए बैन था और याची को 2004 में क्लर्क की नौकरी दी गई।
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बीच की अवधि में यूटी प्रशासन ने याची के पिता के नाम पर हुई अलॉटमेंट रद्द कर मकान खाली करने का आदेश जारी कर दिया, साथ ही अलॉटमेंट रद्द होने के बाद के समय का पीनल रेंट लगा दिया। कोर्ट को बताया गया कि कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में परिवार को केवल एक वर्ष तक सरकारी आवास में बने रहने का अधिकार होता है।
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हाईकोर्ट ने ही लगाई थी पीनल रेंट पर रोक
याची ने इस आदेश को 2005 में हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने पीनल रेंट और अलॉटमेंट रद्द करने के आदेश पर रोक लगा दी थी। अब कोर्ट ने याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि याची को पिता की मौत के बाद अनुकंपा आधार पर नौकरी मिली थी और ऐसे में वह मकान की आउट ऑफ टर्न अलॉटमेंट का हकदार था।
पिता के नाम अलॉट मकान में याची ने अदालत के अंतरिम आदेश के चलते रहना जारी रखा। इस दौरान अदालत को यह नहीं बताया गया था कि याची उस श्रेणी के मकान का पात्र ही नहीं था जिसमें वह रह रहा है। न ही प्रशासन ने अदालत के इस अंतरिम आदेश को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी। इसी के चलते अदालती आदेश के सहारे वह 17 साल उस उच्च श्रेणी के मकान में रहा जिसके लिए वह पात्र नहीं था। अब अपना मकान बनने पर उसने सरकारी आवास छोड़ दिया है।
कोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार वह पिता की मौत पर अनुकंपा आधार पर नौकरी मिलने के चलते आउट ऑफ टर्न अलॉटमेंट का हकदार था। ऐसे में उसके खिलाफ पीनल रेंट सही नहीं है लेकिन प्रशासन को उसके कानूनी बकाया से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसे में याचिका को हाईकोर्ट ने आंशिक रूप से मंजूर करते हुए पीनल रेंट का आदेश खारिज कर दिया लेकिन मुआवजे के तौर पर उसे प्रशासन को 5 लाख रुपये अदा करने का आदेश दिया है।