{"_id":"6271763e009901438e561bcc","slug":"direct-sowing-of-paddy-will-save-35-water-panchkula-news-pkl449527754","type":"story","status":"publish","title_hn":"धान की सीधी बुआई से बचेगा 35 फीसदी पानी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
धान की सीधी बुआई से बचेगा 35 फीसदी पानी
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चंडीगढ़। भूजल के गहरे संकट से निपटने की ओर कदम बढ़ाते हुए पंजाब सरकार ने इस खरीफ बुआई सीजन के लिए अहम फैसला लिया है। इस बार धान की बुआई के लिए पारंपरिक रोपाई विधि की जगह सीधी बिजाई तकनीक के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके लिए कृषि विशेषज्ञों का दावा है कि धान की पैदावार पर कोई विपरीत असर भी नहीं होगा और सिंचाई में करीब 35 फीसदी पानी की बचत भी होगी।
कृषि विभाग के अनुसार, पंजाब में सीधी बिजाई की विधि से धान की बुआई का प्रयोग पिछले साल भी हुआ लेकिन किसानों के बीच विभिन्न आशंकाओं के कारण बहुत बड़े रकबे में यह विधि लागू नहीं की जा सकी। इस साल प्रदेश सरकार ने किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए, सीधी बिजाई करने वाले किसानों को 1500 रुपये प्रति एकड़ मुआवजा देने का एलान पहले की कर दिया है। इसके साथ ही धान की ऐसी बुआई दस दिन पहले 20 मई को ही शुरू करने की अनुमति भी दे दी है लेकिन किसान संगठन इस मुआवजा राशि को अपर्याप्त मानते हुए 5000 रुपये प्रति एकड़ दिए जाने की मांग कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि पंजाब में धान की सीधी बिजाई करने का फैसला वर्ष 2002 में ले लिया गया था जब कुछ कृषि विशेषज्ञों ने विभिन्न जिलों में किसानों द्वारा धान के बाद बोई गई अगली फसल में भी धान की पौध को बढ़ते देखा। विशेषज्ञों ने पाया कि खेत को कद्दू किए बिना भी धान उगाई जा सकती है। इस पर शोध के बाद यह मामला तत्कालीन योजना बोर्ड के डिप्टी चेयरमैन सरदारा सिंह जोहल तक पहुंचा और उन्होंने इस पद्धति को राज्य में लागू करने पर सहमति दे दी। इसके बाद यह मामला पीएयू के चांसलर तक पहुंचा, जिन्होंने यह राय दी कि खेत को कद्दू किए बिना धान उगाई ही नहीं जा सकती। इसके चलते, राज्य में धान की सीधी बिजाई की विधि को लागू नहीं किया जा सका।
विज्ञापन
धान की रोपाई विधि के आदी हो चुके हैं किसान
कृषि विशेषज्ञ भले ही सीधी बिजाई की विधि को लाभदायक बता रहे हैं लेकिन खेती के पारंपरिक तरीकों से बंधे रहे किसान धान उगाने की पुरानी विधि पर ही अधिक भरोसा कर रहे हैं। किसानों का मानना है कि रोपाई विधि के तहत खेत को कद्दू करके धान की पनीरी बीजने से 30-35 दिन में एक मरले में 2-3 किलो धान की तैयारी हो जाती है जबकि सीधी बिजाई में एक किल्ला जमीन में 8 किलो बीज डालकर भी फसल कम और देर से होती है। इस बारे में कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जमीन को कद्दू करके लगाई जाने वाली पनीरी बहुत घनी होती है जो अधिक फसल होने की झलक तो देती है लेकिन 30-35 दिन में ही इतना पानी और बिजली की जरूरत पड़ती है कि किसान का लाभ घट जाता है। विशेषज्ञों का दावा है कि रोपाई विधि से उगाए गए 1 किलो धान के लिए 4-5 हजार लीटर पानी खर्च हो जाता है, वहीं सीधी बिजाई में पूरी फसल को दो बार ही पानी देने की जरूरत पड़ती है।
हर साल एक मीटर तक गिरा भूजल स्तर
भारत के जलशक्ति राज्य मंत्री बिश्वेश्वर टुडु ने 3 फरवरी, 2022 को संसद में बताया कि पंजाब में 78.9 फीसदी ब्लॉकों को ‘अतिशोषित’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है। राज्य के कुल 149 ब्लाकों में से 132 ब्लाक में भूजल अत्यंत चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुका है जबकि 17 ब्लाक ही सुरक्षित हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) द्वारा किए एक अध्ययन में पाया गया कि 1998 और 2018 के बीच हर साल पंजाब के 22 जिलों में से 18 में जलस्तर एक मीटर से अधिक गिरा। अध्ययन में कहा गया कि 1970-71 में पंजाब में 192,000 ट्यूबवेल थे जो 2011-12 तक बढ़कर 13.8 लाख हो गए। वहीं, पिछले 60 वर्षों में नहर से सिंचित क्षेत्र का आकार 58.4 से गिरकर 28 फीसदी हो गया है, जबकि नलकूप से सिंचित क्षेत्र 41.1 से बढ़कर 71.3 फीसदी हो गया है।
विज्ञापन
कृषि विभाग के अनुसार, पंजाब में सीधी बिजाई की विधि से धान की बुआई का प्रयोग पिछले साल भी हुआ लेकिन किसानों के बीच विभिन्न आशंकाओं के कारण बहुत बड़े रकबे में यह विधि लागू नहीं की जा सकी। इस साल प्रदेश सरकार ने किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए, सीधी बिजाई करने वाले किसानों को 1500 रुपये प्रति एकड़ मुआवजा देने का एलान पहले की कर दिया है। इसके साथ ही धान की ऐसी बुआई दस दिन पहले 20 मई को ही शुरू करने की अनुमति भी दे दी है लेकिन किसान संगठन इस मुआवजा राशि को अपर्याप्त मानते हुए 5000 रुपये प्रति एकड़ दिए जाने की मांग कर रहे हैं।
विज्ञापन
उल्लेखनीय है कि पंजाब में धान की सीधी बिजाई करने का फैसला वर्ष 2002 में ले लिया गया था जब कुछ कृषि विशेषज्ञों ने विभिन्न जिलों में किसानों द्वारा धान के बाद बोई गई अगली फसल में भी धान की पौध को बढ़ते देखा। विशेषज्ञों ने पाया कि खेत को कद्दू किए बिना भी धान उगाई जा सकती है। इस पर शोध के बाद यह मामला तत्कालीन योजना बोर्ड के डिप्टी चेयरमैन सरदारा सिंह जोहल तक पहुंचा और उन्होंने इस पद्धति को राज्य में लागू करने पर सहमति दे दी। इसके बाद यह मामला पीएयू के चांसलर तक पहुंचा, जिन्होंने यह राय दी कि खेत को कद्दू किए बिना धान उगाई ही नहीं जा सकती। इसके चलते, राज्य में धान की सीधी बिजाई की विधि को लागू नहीं किया जा सका।
विज्ञापन
धान की रोपाई विधि के आदी हो चुके हैं किसान
कृषि विशेषज्ञ भले ही सीधी बिजाई की विधि को लाभदायक बता रहे हैं लेकिन खेती के पारंपरिक तरीकों से बंधे रहे किसान धान उगाने की पुरानी विधि पर ही अधिक भरोसा कर रहे हैं। किसानों का मानना है कि रोपाई विधि के तहत खेत को कद्दू करके धान की पनीरी बीजने से 30-35 दिन में एक मरले में 2-3 किलो धान की तैयारी हो जाती है जबकि सीधी बिजाई में एक किल्ला जमीन में 8 किलो बीज डालकर भी फसल कम और देर से होती है। इस बारे में कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जमीन को कद्दू करके लगाई जाने वाली पनीरी बहुत घनी होती है जो अधिक फसल होने की झलक तो देती है लेकिन 30-35 दिन में ही इतना पानी और बिजली की जरूरत पड़ती है कि किसान का लाभ घट जाता है। विशेषज्ञों का दावा है कि रोपाई विधि से उगाए गए 1 किलो धान के लिए 4-5 हजार लीटर पानी खर्च हो जाता है, वहीं सीधी बिजाई में पूरी फसल को दो बार ही पानी देने की जरूरत पड़ती है।
हर साल एक मीटर तक गिरा भूजल स्तर
भारत के जलशक्ति राज्य मंत्री बिश्वेश्वर टुडु ने 3 फरवरी, 2022 को संसद में बताया कि पंजाब में 78.9 फीसदी ब्लॉकों को ‘अतिशोषित’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है। राज्य के कुल 149 ब्लाकों में से 132 ब्लाक में भूजल अत्यंत चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुका है जबकि 17 ब्लाक ही सुरक्षित हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) द्वारा किए एक अध्ययन में पाया गया कि 1998 और 2018 के बीच हर साल पंजाब के 22 जिलों में से 18 में जलस्तर एक मीटर से अधिक गिरा। अध्ययन में कहा गया कि 1970-71 में पंजाब में 192,000 ट्यूबवेल थे जो 2011-12 तक बढ़कर 13.8 लाख हो गए। वहीं, पिछले 60 वर्षों में नहर से सिंचित क्षेत्र का आकार 58.4 से गिरकर 28 फीसदी हो गया है, जबकि नलकूप से सिंचित क्षेत्र 41.1 से बढ़कर 71.3 फीसदी हो गया है।