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हाईकोर्ट ने पनग्रेन को लगाई फटकार: कहा-कर्मचारियों को नियमित करने के बाद यू-टर्न नहीं ले सकता निगम
Fri, 20 Feb 2026 02:06 AM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Fri, 20 Feb 2026 02:06 AM IST
सार
जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि निगम की कार्रवाई मनमानी, भेदभावपूर्ण और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कर्मचारियों को नियमित करने के मामले में यू टर्न लेने पर पनग्रेन को कड़ी फटकार लगाते हुए उसकी सभी अपील खारिज कर दी हैं।
हाईकोर्ट ने 2016-17 में नियमित नियुक्ति प्राप्त कर्मचारियों को 10,300-34,800 रुपये के वेतनमान, 4,400 रुपये ग्रेड पे तथा सभी भत्तों और परवर्ती लाभ देने के एकल न्यायाधीश के आदेश को यथावत रखा।
जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि निगम की कार्रवाई मनमानी, भेदभावपूर्ण और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार सेवाएं नियमित करने के बाद बिना किसी ठोस और न्यायोचित कारण के लाभ वापस नहीं लिए जा सकते।
मामला 2009-11 के बीच पारदर्शी विज्ञापन प्रक्रिया से भर्ती कर्मचारियों से जुड़ा है। ये कर्मचारी पहले अनुबंध पर कार्यरत रहे और बाद में दिसंबर 2016 तथा जनवरी 2017 में उन्हें नियमित नियुक्ति पत्र जारी किए गए। निगम के निदेशक मंडल ने 25 नवंबर 2011 और 28 जुलाई 2016 के प्रस्तावों के माध्यम से राज्य की 2011 नियमितीकरण नीति अपनाई थी। इसके अनुसार तीन वर्ष की सेवा पूरी करने वालों को नियमित किया जाना था। इसके बावजूद निगम ने नियमित वेतनमान जारी नहीं किया।
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वर्ष 2020 और 2021 में प्रबंध निदेशक ने बोर्ड की स्वीकृति के बिना पहले दिए गए लाभ वापस लेने के आदेश पारित कर दिए। प्रभावित कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जहां एकल न्यायाधीश ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। इसके खिलाफ निगम ने अपील दायर की थी।
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हाईकोर्ट ने 2016-17 में नियमित नियुक्ति प्राप्त कर्मचारियों को 10,300-34,800 रुपये के वेतनमान, 4,400 रुपये ग्रेड पे तथा सभी भत्तों और परवर्ती लाभ देने के एकल न्यायाधीश के आदेश को यथावत रखा।
जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि निगम की कार्रवाई मनमानी, भेदभावपूर्ण और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार सेवाएं नियमित करने के बाद बिना किसी ठोस और न्यायोचित कारण के लाभ वापस नहीं लिए जा सकते।
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मामला 2009-11 के बीच पारदर्शी विज्ञापन प्रक्रिया से भर्ती कर्मचारियों से जुड़ा है। ये कर्मचारी पहले अनुबंध पर कार्यरत रहे और बाद में दिसंबर 2016 तथा जनवरी 2017 में उन्हें नियमित नियुक्ति पत्र जारी किए गए। निगम के निदेशक मंडल ने 25 नवंबर 2011 और 28 जुलाई 2016 के प्रस्तावों के माध्यम से राज्य की 2011 नियमितीकरण नीति अपनाई थी। इसके अनुसार तीन वर्ष की सेवा पूरी करने वालों को नियमित किया जाना था। इसके बावजूद निगम ने नियमित वेतनमान जारी नहीं किया।
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वर्ष 2020 और 2021 में प्रबंध निदेशक ने बोर्ड की स्वीकृति के बिना पहले दिए गए लाभ वापस लेने के आदेश पारित कर दिए। प्रभावित कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जहां एकल न्यायाधीश ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। इसके खिलाफ निगम ने अपील दायर की थी।