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Palwal News: बैसाखी पर नगर कीर्तन और लंगर सेवा से गूंजा राजधानी का हर कोना

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 14 Apr 2026 07:00 PM IST
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On Baisakhi, every corner of the capital resonated with Nagar Kirtan and Langar Seva.
गुरुद्वारों में सजे दीवान, नगर कीर्तन और दस्तार सजाने की अनूठी पहल
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। देशभर विशेषकर पंजाब की तरह दिल्ली में भी मंगलवार को बैसाखी पर्व पूरे उत्साह, श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई। इस अवसर पर गुरुद्वारों में विशेष दीवान सजाए गए, जहां गुरबाणी का पाठ हुआ और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मत्था टेकने पहुंचे। इसके अलावा विभिन्न इलाकों में भव्य नगर कीर्तन निकाले गए, धार्मिक झांकियों, कीर्तन और सेवा भाव के साथ निकले इन नगर कीर्तनों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। जगह-जगह श्रद्धालुओं ने लंगर का आयोजन किया और राहगीरों को प्रसाद वितरित किया।
राजधानी के सिख बहुल क्षेत्रों जैसे तिलक नगर, हरी नगर, सुभाष नगर, राजा गार्डन, विष्णु गार्डन, मानसरोवर गार्डन, मोती नगर आदि इलाकों में सुबह से ही चहल-पहल देखने को मिली। इन इलाकों में जगह-जगह लंगर लगाए गए और गर्मी को देखते हुए पानी की छबीलें लगाई गईं, जहां लोगों को ठंडा मीठा पानी पिलाया गया। गुरुद्वारों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी रही। ‘पालकी साहिब’ के दर्शन और प्रसाद ग्रहण करने के लिए संगत में विशेष उत्साह देखने को मिला। कई स्थानों पर कीर्तन दरबार आयोजित किए गए, जहां रागी जत्थों ने गुरबाणी का गायन कर वातावरण को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया।
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बैसाखी उत्सव में एक खास पहल देखने को मिली, जहां युवाओं ने बड़े स्तर पर दस्तार (पगड़ी) बांधने की शुरुआत की। गुरुद्वारों में दस्तार बांधने के विशेष शिविर लगाए, जिनमें युवाओं और बच्चों को पारंपरिक तरीके से पगड़ी बांधना सिखाया गया। इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी को सिख परंपरा और पहचान से जोड़ना था। इन शिविरों में अनुभवी गुरसिख युवाओं ने न केवल दस्तार बांधने की तकनीक सिखाई, बल्कि इसके धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को भी समझाया। बड़ी संख्या में युवाओं ने उत्साह के साथ इसमें भाग लिया और अपनी पहचान पर गर्व व्यक्त किया। कई स्थानों पर दस्तार सजाने की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं, जिससे युवाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला।
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बैसाखी का पर्व सिख धर्म में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की थी। यही कारण है कि यह पर्व न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। राजधानी में पूरे दिन श्रद्धा, सेवा और उत्सव का संगम देखने को मिला, जहां लंगर, सेवा, कीर्तन और दस्तार की परंपरा के जरिए भाईचारे और सांस्कृतिक गर्व का संदेश दिया गया।
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