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मजदूरों पर भारी पड़ रही है नोटबंदी की मार

Thu, 01 Dec 2016 04:39 PM IST
palwal
palwal Updated Thu, 01 Dec 2016 04:39 PM IST
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नोटबंदी के चलते सबसे अधिक गरीबी की मार दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ी है। शहर में मध्यप्रदेश, बिहार झारखंड व अन्य स्थानों से आए लोगों की बहुतायत है, जो कि मेहनत-मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का गुजर बसर कर रहे हैं।
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नोटबंदी के बाद उनके पास दो वक्त का खाना भी जुटाना भारी हो रहा है। स्थिति ज्यादा बिगड़ती देख काफी मजदूर तो वापस भी जा चुके है। मजदूरों का कहना है कि स्थानीय निवासी को तो बाजार से सामान उधार भी मिल जाता है, लेकिन उन्हें अपना पेट भरना भी भारी पड़ रहा है, और अब मकानों का किराया कैसे चुकाया जाए, इसकी चिंता सताने लगी है। 
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शहर के आगरा चौक पर बेलदारी का काम करने वाले कुछ मजदूरों ने बताया कि कई-कई दिन बीत जाते हैं, काम नहीं मिलता। अगर मिलता है तो मजदूरी कराने वाले मालिक मजदूरी कराने के बाद शाम को 500 या 1000 का नोट उन्हें थमा देते हैं। जिसको वे मजबूरी में गुजर-बसर करने के लिए 100 से 300 रुपये तक घाटे से चला रहे हैं।
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मैं एमपी के रहने वाला हूं, व पिछले 15 वर्ष से पलवल में रहकर मेहनत-मजदूरी कर रहा हूं। नोटबंदी के बाद काम मिलना बहुत कम हो गया है। मंदी के चलते पहले मेहनताना भी कम मिलता है। मिस्त्री को पहले 500 रुपये और बेलदार को 300 रुपये मिलते थे। अब मिस्त्री 400 व बेलदार को 250 मिल रहे हैं। 
-रामचरण, राज मिस्त्री 

कुछ रोज 30 लोग इकठ्ठे रहते थे। लेकिन अब आर्थिक तंगी के चलते उनके ज्यादातर साथी अपने गांवो के लिए रवाना हो चुके हैं। मालिक या तो पुराने नोट देता है या फिर नए नोट में दो हजार का नोट देता है। 100-200 रुपये के सामान के लिए दो हजार को नोट कोई भी लेने के लिए तैयार नही है जिससे घर में आटे तक का संकट गहरा रहा है। 

-सुनील, राज मिस्त्री

दिन भर तो मजदूरी करती हूं, और शाम को रसोई का सामान लाने के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है। क्योंकि मालिक पुराने नोट देते हैं या फिर दो हजार का नोट दिखाते है। हालत यह है कि बच्चों का पेट भरने तक का संकट गहरा गया है। यदि कुछ ओर दिन यही हाल रहा, तो वापिस अपने प्रदेश को लौटना पडे़गा।
-ममता, बेलदार
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