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शिक्षा की अलख को बढ़ने लगा कारवां...
नारनौल
Updated Sun, 25 May 2014 01:32 AM IST
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पहाड़ पर बकरी चराते नन्हें बच्चों को देखा। अचानक मन में ख्याल आया कि बिना पढ़े-लिखे इन नौनिहालों का भविष्य क्या होगा? थोड़ी उत्सुकता उनके परिजनों से मिलने की हुई। फिर क्या था, बकरी के पीछे बच्चे और उनके पीछे मैं। पहाड़ी के नीचे उतरे तलहटी में तंबू के पास पहुंचे।
सोचा शायद यही इनका घर है। बच्चों के अभिभावकों से मिलकर बच्चों को पढ़ाने की बात कही। उन्होंने तर्क दिया कि तंबू से स्कूल की दूरी दो से ढाई किलोमीटर है। बच्चे छोटे हैं, रोजाना का झंझट रहेगा। यह सुनकर संघीवाड़ा स्कूल के मास्टर सूबे सिंह ने फैसला लिया कि कुछ भी हो वह रोजाना बच्चों को स्कूल और फिर वापस घर छोड़ेंगे लेकिन पढ़ाएंगे जरूर।
नारनौल शहर के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में राजकीय प्राथमिक पाठशाला संघीवाड़ा हैं। स्कूल में रिकार्ड के मुताबिक 38 बच्चों के नाम रजिस्टर में दर्ज थे। स्कूल में सिर्फ 7-8 बच्चे ही पहुंच रहे थे। बीआरपी (ब्लाक रिसर्च पर्सनल) की रिपोर्ट में भी यह तथ्य दर्ज है। खैर, इस साल रजिस्टर में ही 13 नाम दर्ज हुए हैं और उतने ही बच्चे स्कूल में आते हैं। स्कूल में शिक्षा विभाग ने जेबीटी सूबे सिंह की तैनाती की। उन्होंने स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रयास शुरू किए।
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बुआ के घर जाते मिले तीन ‘स्टूडेंट’
टीचर सूबे सिंह ने बताया कि फरवरी माह के अंतिम सप्ताह में बुआ के घर ठाठवाड़ी जा रहे थे। रास्ते में कुलताजपुर रोड पर पहाड़ी किनारे दो-तीन छोटे बच्चों को बकरी चराते देखा तो बाइक रोक दी। बच्चे घबरा गए और बकरी लेकर सड़क किनारे चल पड़े। कुछ दूरी पर ही उनका अस्थायी घर (डेरा) था। वहां परिजनों से बातचीत की तो पता चला कि वह कई सालों से यहां रह रहे हैं। शहर में दिनभर मजदूरी करते हैं और बच्चे बकरी चराते हैं या फिर खाली बोतल एकत्रित कर बेचते हैं।
कुछ ऐसे ही गुजारा चल रहा है। डेरे में किसी बच्चे के स्कूल जाने के सवाल पर वह चुप हो गए। सरकारी स्कूल में फ्री पढ़ाई, खाना, किताब और वर्दी मिलने की बात पर बच्चों के परिजनों ने कहा कि यहां से स्कूल करीब दो से ढाई किलोमीटर है। इतनी दूर अकेले बच्चों को भेज नहीं सकते। डर लगता है, रास्ते पर वैसे भी वाहनों की भरमार है। जवाब सुना तो कुछ देर चुप रहा। उसके बाद उनसे कहा कि, अगर आपके बच्चों को रोजाना मैं स्कूल लेकर जाऊं और छोड़कर जाऊं तो कोई दिक्कत नहीं। यह बात सुनकर परिजनों ने हाथ जोड़े और हामी भर दी।
यह होती है दिनचर्या
सूबे सिंह बताते हैं कि उनका गांव सेका है। स्कूल से गांव की दूसरी 9 किलोमीटर है। वह पहले स्कूल में आते हैं, फिर बच्चों को लेने उनके डेरे तक जाते हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद पहले बच्चों को बाइक से ही छोड़ते हैं। उसके बाद वापस नारनौल आकर अपने गांव जाते हैं।
अभी तीन बच्चे, बढ़ेगी संख्या
सूबे सिंह का कहना है कि फिलहाल वह बाइक पर तीन बच्चों (देवाराम, राजेश और किशन) को लेकर आ रहे हैं। इस पहल से डेरे में रहने वाले अन्य परिजनों ने भी उत्सुकता जाहिर की है। दूसरे परिजनों का कहना है कि वह उनके बच्चों को भी स्कूल लेकर जाए। बाइक पर तीन से ज्यादा बच्चे आ नहीं सकते। इसलिए उच्चाधिकारियों से बातचीत कर समस्या का समाधान भी निकाला जाएगा।
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सोचा शायद यही इनका घर है। बच्चों के अभिभावकों से मिलकर बच्चों को पढ़ाने की बात कही। उन्होंने तर्क दिया कि तंबू से स्कूल की दूरी दो से ढाई किलोमीटर है। बच्चे छोटे हैं, रोजाना का झंझट रहेगा। यह सुनकर संघीवाड़ा स्कूल के मास्टर सूबे सिंह ने फैसला लिया कि कुछ भी हो वह रोजाना बच्चों को स्कूल और फिर वापस घर छोड़ेंगे लेकिन पढ़ाएंगे जरूर।
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नारनौल शहर के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में राजकीय प्राथमिक पाठशाला संघीवाड़ा हैं। स्कूल में रिकार्ड के मुताबिक 38 बच्चों के नाम रजिस्टर में दर्ज थे। स्कूल में सिर्फ 7-8 बच्चे ही पहुंच रहे थे। बीआरपी (ब्लाक रिसर्च पर्सनल) की रिपोर्ट में भी यह तथ्य दर्ज है। खैर, इस साल रजिस्टर में ही 13 नाम दर्ज हुए हैं और उतने ही बच्चे स्कूल में आते हैं। स्कूल में शिक्षा विभाग ने जेबीटी सूबे सिंह की तैनाती की। उन्होंने स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रयास शुरू किए।
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बुआ के घर जाते मिले तीन ‘स्टूडेंट’
टीचर सूबे सिंह ने बताया कि फरवरी माह के अंतिम सप्ताह में बुआ के घर ठाठवाड़ी जा रहे थे। रास्ते में कुलताजपुर रोड पर पहाड़ी किनारे दो-तीन छोटे बच्चों को बकरी चराते देखा तो बाइक रोक दी। बच्चे घबरा गए और बकरी लेकर सड़क किनारे चल पड़े। कुछ दूरी पर ही उनका अस्थायी घर (डेरा) था। वहां परिजनों से बातचीत की तो पता चला कि वह कई सालों से यहां रह रहे हैं। शहर में दिनभर मजदूरी करते हैं और बच्चे बकरी चराते हैं या फिर खाली बोतल एकत्रित कर बेचते हैं।
कुछ ऐसे ही गुजारा चल रहा है। डेरे में किसी बच्चे के स्कूल जाने के सवाल पर वह चुप हो गए। सरकारी स्कूल में फ्री पढ़ाई, खाना, किताब और वर्दी मिलने की बात पर बच्चों के परिजनों ने कहा कि यहां से स्कूल करीब दो से ढाई किलोमीटर है। इतनी दूर अकेले बच्चों को भेज नहीं सकते। डर लगता है, रास्ते पर वैसे भी वाहनों की भरमार है। जवाब सुना तो कुछ देर चुप रहा। उसके बाद उनसे कहा कि, अगर आपके बच्चों को रोजाना मैं स्कूल लेकर जाऊं और छोड़कर जाऊं तो कोई दिक्कत नहीं। यह बात सुनकर परिजनों ने हाथ जोड़े और हामी भर दी।
यह होती है दिनचर्या
सूबे सिंह बताते हैं कि उनका गांव सेका है। स्कूल से गांव की दूसरी 9 किलोमीटर है। वह पहले स्कूल में आते हैं, फिर बच्चों को लेने उनके डेरे तक जाते हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद पहले बच्चों को बाइक से ही छोड़ते हैं। उसके बाद वापस नारनौल आकर अपने गांव जाते हैं।
अभी तीन बच्चे, बढ़ेगी संख्या
सूबे सिंह का कहना है कि फिलहाल वह बाइक पर तीन बच्चों (देवाराम, राजेश और किशन) को लेकर आ रहे हैं। इस पहल से डेरे में रहने वाले अन्य परिजनों ने भी उत्सुकता जाहिर की है। दूसरे परिजनों का कहना है कि वह उनके बच्चों को भी स्कूल लेकर जाए। बाइक पर तीन से ज्यादा बच्चे आ नहीं सकते। इसलिए उच्चाधिकारियों से बातचीत कर समस्या का समाधान भी निकाला जाएगा।