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Mahendragarh-Narnaul News: वीरों की कहानियों से सजा मालड़ा, जहां अंग्रेजों से ऑपरेशन सिंदूर तक निभाई देशभक्ति
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फोटो संख्या: 60 विरेंद्र सिंह
- फोटो : कानपुर में विजयी खिलाड़ी संगठन
महेंद्रगढ़। आजादी से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक मालड़ा गांव के सैकड़ों जवान सेना में रहकर देश की सीमाओं की रक्षा कर चुके हैं। करीब 350 जवान अभी भी अलग-अलग सैन्य इकाइयों में तैनात हैं जबकि लगभग 500 जवान सेवा पूरी कर चुके हैं। गांव में हर घर से कोई न कोई सेना से जुड़ा रहा है। यही वजह है कि मालड़ा को लोग वीरों का गांव कहते हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि गांव के इतिहास में कई ऐसे नाम दर्ज हैं जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिया। गांव के वीर सपूत झाबर सिंह आजादी से पहले अंग्रेजों की सेना में तैनात थे और आजादी के युद्ध में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में शामिल होने चाहते थे लेकिन अंग्रेजी हकुमत की बाधाओं के कारण उनका चयन नहीं हो पाया।
इसके बाद उन्होंने सेना के साथ मिलकर स्वयं ही अंग्रेजों के साथ लड़े। यह देखकर अंग्रेजों ने उनके खिलाफ हुए सभी जवानों को बिना बताए जहाज में बैठाकर विदेश भेज दिया। युद्ध के दौरान पांच साल तक उनका कोई समाचार नहीं मिला तो परिजनों ने उनको मृत समझ लिया था।
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इसके बाद जब वह सकुशल घर लौटे तो परिवार और ग्रामीण पहचान नहीं पाए थे। पहली बार बेटे की आवाज सुनकर उनके पिता को कानों पर विश्वास नहीं हुआ और बहरूपिया समझकर बाहर निकाल दिया। बाद में उन्होंने स्वयं झाबर सिंह होने का सबूत दिया तो घर में खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
देश की रक्षा में शहीद हुए नायक रूपचंद
ग्रामीणों ने बताया कि शहीद नायक रूपचंद का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वर्ष 1971 में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान वे देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके सम्मान में गांव में शहीद स्मारक बनाया गया है जो आज भी युवाओं को राष्ट्र सेवा और देशभक्ति के लिए प्रेरित करता है।
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गांव की कहानी पूर्व सैनिकों की जुबानी
अब भी गांव में सैनिक परंपरा लगातार आगे बढ़ रही है। करीब 350 जवान देश की विभिन्न सीमाओं और सैन्य इकाइयों में तैनात हैं जबकि 500 सैनिक सेना से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। -सूबेदार सतीश यादव, पूर्व सैनिक
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मेरे पिताजी ने आजादी की लड़ाई लड़ी और हमने कारगिल व अन्य युद्ध देखे। इसमें हमारी भूमिका केवल अप्रत्यक्ष रूप से ही रही। अब हमारी चौथी पीढ़ी सेना में देशसेवा कर रही है। अब भी परिवार के बच्चे सेना में जाने की तैयारी कर रहे हैं।-सूबेदार गजराज सिंह, पूर्व सैनिक
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मेरी तीसरी पीढी अब सेना में सेवा कर रही है। मेरे पिता मानकचंद ग्रेनेडियर ग्रुप में सिपाही थे। मैं भी इसी ग्रुप में नायक और भाई मलखान हवलदार व गोधाराम नायक सूबेदार के पद पर सेवा दी। अब मलखान के बेटे सुरजीत नायक सूबेदार के पद पर कार्यरत हैं।-नायक विरेंद्र सिंह, पूर्व सैनिक
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गांव में पूर्व सैनिक युवाओं को सेना में जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। अगर किसी घर में शहीद होता है तो लोग इसको देखकर घबराते नहीं हैं और बच्चों को सेना में जाने की ही तैयारी करवाते हैं। अगर पिता शहीद होता है तो बेटे को भी सपना पूरा कराने के लिए सेना में भेजते हैं।-शीशराम सिंह, वरिष्ठ नागरिक
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ग्रामीणों ने बताया कि गांव के इतिहास में कई ऐसे नाम दर्ज हैं जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिया। गांव के वीर सपूत झाबर सिंह आजादी से पहले अंग्रेजों की सेना में तैनात थे और आजादी के युद्ध में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में शामिल होने चाहते थे लेकिन अंग्रेजी हकुमत की बाधाओं के कारण उनका चयन नहीं हो पाया।
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इसके बाद उन्होंने सेना के साथ मिलकर स्वयं ही अंग्रेजों के साथ लड़े। यह देखकर अंग्रेजों ने उनके खिलाफ हुए सभी जवानों को बिना बताए जहाज में बैठाकर विदेश भेज दिया। युद्ध के दौरान पांच साल तक उनका कोई समाचार नहीं मिला तो परिजनों ने उनको मृत समझ लिया था।
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इसके बाद जब वह सकुशल घर लौटे तो परिवार और ग्रामीण पहचान नहीं पाए थे। पहली बार बेटे की आवाज सुनकर उनके पिता को कानों पर विश्वास नहीं हुआ और बहरूपिया समझकर बाहर निकाल दिया। बाद में उन्होंने स्वयं झाबर सिंह होने का सबूत दिया तो घर में खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
देश की रक्षा में शहीद हुए नायक रूपचंद
ग्रामीणों ने बताया कि शहीद नायक रूपचंद का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वर्ष 1971 में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान वे देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके सम्मान में गांव में शहीद स्मारक बनाया गया है जो आज भी युवाओं को राष्ट्र सेवा और देशभक्ति के लिए प्रेरित करता है।
गांव की कहानी पूर्व सैनिकों की जुबानी
अब भी गांव में सैनिक परंपरा लगातार आगे बढ़ रही है। करीब 350 जवान देश की विभिन्न सीमाओं और सैन्य इकाइयों में तैनात हैं जबकि 500 सैनिक सेना से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। -सूबेदार सतीश यादव, पूर्व सैनिक
मेरे पिताजी ने आजादी की लड़ाई लड़ी और हमने कारगिल व अन्य युद्ध देखे। इसमें हमारी भूमिका केवल अप्रत्यक्ष रूप से ही रही। अब हमारी चौथी पीढ़ी सेना में देशसेवा कर रही है। अब भी परिवार के बच्चे सेना में जाने की तैयारी कर रहे हैं।-सूबेदार गजराज सिंह, पूर्व सैनिक
मेरी तीसरी पीढी अब सेना में सेवा कर रही है। मेरे पिता मानकचंद ग्रेनेडियर ग्रुप में सिपाही थे। मैं भी इसी ग्रुप में नायक और भाई मलखान हवलदार व गोधाराम नायक सूबेदार के पद पर सेवा दी। अब मलखान के बेटे सुरजीत नायक सूबेदार के पद पर कार्यरत हैं।-नायक विरेंद्र सिंह, पूर्व सैनिक
गांव में पूर्व सैनिक युवाओं को सेना में जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। अगर किसी घर में शहीद होता है तो लोग इसको देखकर घबराते नहीं हैं और बच्चों को सेना में जाने की ही तैयारी करवाते हैं। अगर पिता शहीद होता है तो बेटे को भी सपना पूरा कराने के लिए सेना में भेजते हैं।-शीशराम सिंह, वरिष्ठ नागरिक

फोटो संख्या: 60 विरेंद्र सिंह- फोटो : कानपुर में विजयी खिलाड़ी संगठन

फोटो संख्या: 60 विरेंद्र सिंह- फोटो : कानपुर में विजयी खिलाड़ी संगठन

फोटो संख्या: 60 विरेंद्र सिंह- फोटो : कानपुर में विजयी खिलाड़ी संगठन

फोटो संख्या: 60 विरेंद्र सिंह- फोटो : कानपुर में विजयी खिलाड़ी संगठन

फोटो संख्या: 60 विरेंद्र सिंह- फोटो : कानपुर में विजयी खिलाड़ी संगठन