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Mahendragarh-Narnaul News: बेटे को जहर देने का आरोप, अदालत ने नहीं मानी आगे जांच की मांग
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नारनौल। बेटे की मौत और खुद को जहर दिए जाने के मामले में कनिका की पुनरीक्षण याचिका अदालत ने खारिज कर दी। एडीजे नितिन राज ने कनीना एसडीजेएम के फैसले को बरकरार रखते हुए आगे की जांच की मांग ठुकरा दी।
याचिकाकर्ता के वकील ने आरोप लगाया कि कनिका को ससुराल में दहेज के लिए परेशान किया जाता था। उनका कहना था कि 1 मई 2024 को कनिका के पति तेजपाल और ससुर सत्यनारायण ने उसके मासूम बेटे अर्णव को जहर देकर मार दिया। विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई और उसे भी जबरन जहर पिलाया गया।
वकील ने पुलिस, डीएसपी महेंद्रगढ़ और डॉक्टरों पर आरोपियों से मिलीभगत का आरोप लगाते हुए कहा कि कनिका के बयान बेहोशी की हालत में लिए गए और उससे सादे कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए। उन्होंने कॉल डिटेल रिकॉर्ड और मेडिकल दस्तावेजों में कथित गड़बड़ी की जांच के लिए आगे की जांच कराने की मांग की।
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सरकारी वकील ने इस मांग का विरोध किया। अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि घटना के तुरंत बाद कनिका को सरकारी अस्पताल ले जाया गया था जहां उसकी एमएलआर तैयार हुई। फिट घोषित किए जाने के बाद ही जांच अधिकारी ने उसका बयान दर्ज किया था।
अदालत ने कहा कि पुलिस से मिलीभगत के आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं है। केवल एक पक्ष की असहमति के आधार पर आगे की जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।
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याचिकाकर्ता के वकील ने आरोप लगाया कि कनिका को ससुराल में दहेज के लिए परेशान किया जाता था। उनका कहना था कि 1 मई 2024 को कनिका के पति तेजपाल और ससुर सत्यनारायण ने उसके मासूम बेटे अर्णव को जहर देकर मार दिया। विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई और उसे भी जबरन जहर पिलाया गया।
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वकील ने पुलिस, डीएसपी महेंद्रगढ़ और डॉक्टरों पर आरोपियों से मिलीभगत का आरोप लगाते हुए कहा कि कनिका के बयान बेहोशी की हालत में लिए गए और उससे सादे कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए। उन्होंने कॉल डिटेल रिकॉर्ड और मेडिकल दस्तावेजों में कथित गड़बड़ी की जांच के लिए आगे की जांच कराने की मांग की।
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सरकारी वकील ने इस मांग का विरोध किया। अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि घटना के तुरंत बाद कनिका को सरकारी अस्पताल ले जाया गया था जहां उसकी एमएलआर तैयार हुई। फिट घोषित किए जाने के बाद ही जांच अधिकारी ने उसका बयान दर्ज किया था।
अदालत ने कहा कि पुलिस से मिलीभगत के आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं है। केवल एक पक्ष की असहमति के आधार पर आगे की जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता।