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हरियाणा सूचना अधिकार मंच ने आरटीआई एक्ट का किया विरोध
Updated Thu, 26 Jul 2018 12:41 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
नारनौल। केंद्र सरकार सूचना के अधिकार अधिनियम (आरटीआई एक्ट) में संशोधन करने के फैसले का हरियाणा सूचना अधिकार मंच की नारनौल इकाई ने विरोध जताया है। उल्लेखनीय है कि मानसून सत्र में सरकार इस बिल को संशोधन के लिए सदन में पेश करेगी। आरटीआई एक्टिविस्ट और सूचना अधिकार मंच के अध्यक्ष संजय शर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार आरटीआई एक्ट में संशोधन कर उसके कद को चुनाव आयोग की तुलना में कम करना चाहती है। जिससे सरकार उस पर पूरी तरीके से नियंत्रण रख सके। उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन कर केंद्र दो बुनियादी तत्वों को बदलना चाहती है। पहला ये कि सूचना आयोग का कद चुनाव आयोग से कम हो जाए और 5 साल के कार्यकाल में परिवर्तन पर नियंत्रण मजबूत किया जाए। सरकार चुनाव आयोग के मुकाबले सूचना आयोग के आला अधिकारियों के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तों की समानता को समाप्त करने जा रही है।
वर्तमान में सूचना आयोग के आयुक्त का वेतन सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होता है।
आरटीआई विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम एक प्रतिकूल प्रस्ताव है और यह सूचना आयोग और चुनाव आयोग की स्वायत्तता से समझौता करने जैसा होगा। इसके पीछे तर्क है कि कानून द्वारा सीआईसी को चुनाव आयोग के बराबर का स्तर नहीं दिया जा सकता है जोकि पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण है।
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नारनौल। केंद्र सरकार सूचना के अधिकार अधिनियम (आरटीआई एक्ट) में संशोधन करने के फैसले का हरियाणा सूचना अधिकार मंच की नारनौल इकाई ने विरोध जताया है। उल्लेखनीय है कि मानसून सत्र में सरकार इस बिल को संशोधन के लिए सदन में पेश करेगी। आरटीआई एक्टिविस्ट और सूचना अधिकार मंच के अध्यक्ष संजय शर्मा ने कहा कि केंद्र सरकार आरटीआई एक्ट में संशोधन कर उसके कद को चुनाव आयोग की तुलना में कम करना चाहती है। जिससे सरकार उस पर पूरी तरीके से नियंत्रण रख सके। उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन कर केंद्र दो बुनियादी तत्वों को बदलना चाहती है। पहला ये कि सूचना आयोग का कद चुनाव आयोग से कम हो जाए और 5 साल के कार्यकाल में परिवर्तन पर नियंत्रण मजबूत किया जाए। सरकार चुनाव आयोग के मुकाबले सूचना आयोग के आला अधिकारियों के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तों की समानता को समाप्त करने जा रही है।
वर्तमान में सूचना आयोग के आयुक्त का वेतन सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होता है।
आरटीआई विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम एक प्रतिकूल प्रस्ताव है और यह सूचना आयोग और चुनाव आयोग की स्वायत्तता से समझौता करने जैसा होगा। इसके पीछे तर्क है कि कानून द्वारा सीआईसी को चुनाव आयोग के बराबर का स्तर नहीं दिया जा सकता है जोकि पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण है।
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