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भूरिश्रवा तीर्थ : भगवान शिव की भक्ति ने दिलाई प्रतिष्ठाः भगवान शिव की भक्ति ने दिलाई प्रतिष्ठा

Sun, 12 Oct 2025 02:02 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र Updated Sun, 12 Oct 2025 02:02 AM IST
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Bhurishrava Tirtha: Devotion to Lord Shiva brought prestige: Devotion to Lord Shiva brought prestige
चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव
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कुरुक्षेत्र। महाभारत के युद्ध में दो पक्ष थे कौरव और पांडव। दोनों ओर से महाबली मैदान में थे। सभी अपने-अपने पक्ष के जीत दिलाने में सक्षम थे। ऐसे ही एक महायोद्धा थे भूरिश्रवा। जिनका वध श्रीकृष्ण के चचेरे भाई सात्यकि ने किया था।
मान्यता है कि भगवान शिव के परम भक्त होने के कारण मृत्यु के पश्चात् भूरिश्रवा की आत्मा भगवान शिव में विलीन हो गई थी। इसीलिए जिस स्थान पर भूरिश्रवा का वध हुआ वहां स्थापित मंदिर आज भूरिश्रवेश्वर महादेव का स्थान कहलाता है। जिला मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित भोर सैयदां गांव में स्थित है यह मंदिर।
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महाभारत में मिले उल्लेख और लोक मान्यताओं के अनुसार, 18 दिन के महाभारत के युद्ध में सात्यकि पांडवों के सेनापतियों में एक थे। जबकि कुरुवंशी राजा सोमदत के पुत्र की भूरिश्रवा कौरवों के सेनापतियों में शामिल थे। युद्ध के चौदहवें दिन अर्जुन, भीम और सात्यकि के साथ सिंधु नरेश जयद्रथ को घेरने की कोशिश कर रहे थे। उसी समय भूरिश्रवा अपनी जगह छोड़कर सात्यकि के सामने आ खड़े हुए। दोनों ओर से भयानक युद्ध हुआ। सात्यकि के सारे अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गए। सात्यकि निहत्थे हो गए तो लड़ाई हाथापाई में बदल गई। सात्यकि मूर्छित हो चुके थे। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को तत्काल खतरे के प्रति आगाह किया। भूरिश्रवा, सात्विक को मारने वाले ही थे तभी अर्जुन ने बाण के प्रहार से उनकी एक भुजा काट दी। भूरिश्रवा ने इसे छल माना और हथियार छोड़कर युद्ध भूमि में ही ध्यान लगाकर बैठ गए। इसी दौरान सात्यकि की मूर्छा टूटी और वह भूरिश्रवा का सिर अलग कर देते हैं। कौरव पक्ष के योद्धा इसे उस समय के युद्ध के नियमों के विपरीत मानते हैं और सात्विक के कृत्य की सार्वजनिक रूप से निंदा होती है। ऐसी मान्यता है कि भूरिश्रवा की मृत्यु के बाद ही सात्विक की भी मौत हो जाती है।
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