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आजादी के लिए था खून बहाया मगर अंग्रेजी हुकूमत का ‘हुकुम’ नहीं बजाया

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 26 Jan 2022 02:21 AM IST
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Was shed blood for freedom but did not play 'skakum' of British rule
नरेंद्र शर्मा
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करनाल। देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद करवाने में अनेक वीर सपूतों ने प्राणों की आहुति दी। उनमें लाला हुकुम चंद भी शामिल हैं, जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे। इस दौरान अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए उन्होंने मुगल सम्राट खून से पत्र लिखा था, जो बाद में अंग्रेजों के हाथ लग गया। इसके बाद अंग्रेजों ने घर के सामने ही उन्हें फांसी पर लटका दिया था।
अग्रवाल वैश्य समाज हरियाणा के अध्यक्ष अशोक बुवानीवाला ने बताया कि उनका जन्म वर्ष 1816 में कानूनगो दुनीचंद जैन के परिवार में हुआ था। वह फारसी और गणित का अच्छा ज्ञान रखते थे। अपनी शिक्षा व प्रतिभा के चलते उन्हें मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के दरबार में उच्च पद प्राप्त हुआ। 1841 में उन्हें करनाल व हांसी का कानूनगो और प्रबंधकर्ता नियुक्त किया गया था। इसी दौरान अंग्रेजों ने हरियाणा प्रांत को अपने अधीन कर लिया। वह ब्रिटिश शासन में भी कानूनगो बने रहे, लेकिन पराधीनता उन्हें रास नहीं आ रही थी। यही कारण है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए दिल्ली में हुए सम्मेलन में तांत्या टोपे के साथ मिलकर उन्हाेंने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की रणनीति बनाई, जिसमें बहादुर शाह जफर ने भी सहयोग का आश्वासन दिया। उन्होंने हांसी में सभी देश भक्तों को एकत्रित किया और दिल्ली पर धावा बोलने जा रही अंग्रेजों की सेना पर हमला कर उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।
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इस दौरान लाला हुकुम चंद व उनके साथी मिर्जा मुनीर बेग ने दिल्ली मुगल सम्राट को युद्ध में सहायता के लिए खून से पत्र लिखा, लेकिन काफी दिनों तक जवाब नहीं आया और अंग्रेजों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। जांच के दौरान 15 नवंबर 1857 को यह पत्र अंग्रेजों के हाथ लग गया और उन्होेंने दिल्ली कमिश्नर सीएस सांडर्स और हांसी कमिश्नर नव कार्टलैंड को उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए लिखा। अंग्रेजों ने छापेमार कर दोनों देशभक्तों और उनके 13 वर्षीय भतीजे फकीर चंद को गिरफ्तार कर लिया। उन पर मुकदमा चलाया गया, जिसमें 18 जनवरी 1858 को फकीर चंद को मुक्त कर उन दोनों का फांसी की सजा सुनाई गई।
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19 जनवरी को घर के सामने दी फांसी
स्वतंत्रता सेनानी लाला हुकुम चंद और मिर्जा मुनीर बेग को हुकुम चंद के घर के सामने ही फांसी दी गई। अंग्रेजों ने क्रूरता करते हुए मुक्त किए जा चुके 13 वर्षीय फकीर चंद को भी नियम के खिलाफ फांसी पर लटका दिया। वहीं, उनके शवों को परिजनों को सौंपने की बजाय दफना दिया और उनकी संपत्ति को कौड़ियों के भाव नीलाम किया।
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