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कर्ण की धरती से दुनिया को दिया प्रेम, समरसता और सद्भाव का संदेश

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 20 Sep 2021 02:17 AM IST
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The message of love, harmony and harmony given to the world from the land of Karna
श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मंदिर मंदिर में आयोजित कार्यक्रम में मंच पर उपस्थित विभिन्न समुदाय क?
माई सिटी रिपोर्टर
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करनाल। श्री आत्म मनोहर आराधना जैन मंदिर में उप प्रवर्तक पीयूष मुनि महाराज के संयोजन में कर्ण की नगरी से दुनिया को एक सूत्र में पिरोते हुए सभी धर्मों के सम्मान का संदेश दिया गया। विभिन्न धर्मों के धर्माचार्यों ने एक मंच से एकता का संदेश देते हुए कहा कि जिस तरह से विभिन्न नदिया अलग-अलग बहतीं हैं और अंत में सभी समुद्र में जाकर एक हो जाती हैं, इसी तरह परमात्मा भी एक ही है। सभी धर्म आपसी प्रेम, समरसता और सद्भाव का संदेश देते हैं। हमें इनके मूल तत्वों को समझते हुए अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए दूसरे संप्रदायों की अच्छी परंपराओं का सम्मान करना चाहिए।
सामाजिक सद्भाव दिवस-2021 का आगाज पीयूष मुनि महाराज के साथ देशभर से आए विभिन्न धर्मों से जुड़े साधू संतों, राजनीतिक व सामाजिक हस्तियों ने दीप जलाकर किया। निरंजनी अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी डॉ. शाश्वतानंद ने कहा कि किसी भी धर्म की परिभाषा नकारात्मक नहीं हो सकती। जिसमें सभी समान प्रकार से आगे बढ़ें वहीं समाज है। किसी संप्रदाय का अनुयाई बनना आसान है परंतु सच्चा धार्मिक बनना बहुत कठिन है। दलित शब्द के लिए समाज में स्थान नहीं होना चाहिए।
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आरएसएस की कार्यकारी परिषद के वरिष्ठ सदस्य इंद्रेश कुमार ने एक था राजा और एक थी रानी, दोनों मर गए, खत्म कहानी की कहावत को परिभाषित करते हुए कहा कि हमें ऐसे कार्य करने चाहिए, जिनसे कहानी खत्म न हो, बल्कि सदियों तक चलती रहे। आज दुनिया ऐसे मोड़ पर है, जब उसे तय करना होगा कि वह समरसता के साथ रहेगी या फिर आतंकवाद के साथ। भारत हमेशा से ही समरसता और सत्य के साथ खड़ा रहा है।
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कांग्रेस प्रदेश प्रभारी विवेक बंसल ने अनेकता में एकता की विलक्षण भारतीय गौरवशाली संस्कृति का गुणगान करते हुए संकुचित विचारधारा से ऊपर उठकर उदार हृदय बनने की प्रेरणा दी। आरएसएस प्रचारक विष्णु गोयल ने कहा कि धर्म एक ही है, इसके रूप अनेक हैं। उपप्रवर्तक पीयूष मुनि ने कहा कि संप्रदाय अलग-अलग रास्ते होने पर भी एक ही मंजिल की ओर ले जाते हैं। अहिंसा, संयम तथा तप रूप त्रिविध धर्म जीवन में आने पर साधक देवताओं का भी पूजनीय बन जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्वतंत्र गिरजा ऑफ भारत के संस्थापक अध्यक्ष बिशप डा. जॉनसन कुप्पूस्वामी, मुफ्ती अब्दुस्सामी कासमी, मौलाना डा. शरफुद्दीन सहित कई अन्य धर्माचार्यों, राजनीतिक व सामाजिक हस्तियों ने अपने विचार साझा किए। अध्यक्षता अखिल भारतीय जैन कांफ्रेंस के राष्ट्रीय प्रमुख मार्गदर्शक राम कुमार जैन (लुधियाना) ने की।
वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये जुड़ते हुए कहा कि धर्म सभी को जोड़कर साथ चलने की कला सिखाता है। प्रकृति के अनुसार सभी का सम्मान करते हुए चलने वाला धर्मात्मा है। सभी में समान आत्मा होने के कारण सबका सुख-दुख समान है।
-स्वामी चिदानंद सरस्वती, प्रमुख परमार्थ निकेतन हरिद्वार
ईश्वर तो हमारे अंदर ही हैं, सिर्फ उसे सच्चे मन से देखने की आवश्यक है। नीयत साफ होगी तो वह बिना किसी अनुष्ठान के ही मिल जाएगा। संतों का सत्संग बेहद जरूरी है, सत्संगी परमात्मा को चाहता है, वह रंग-रूप, जाति-धर्म को नहीं देखता। वह तो केवल परमसत्ता के साथ एकाकार होना चाहता है। विनयशीलता ईश्वर तक जाने वाली पहली सीढ़ी है।
-उदय सिंह, नामधारी सतगुरु
जब व्यक्ति संतों से जुड़ता है तो उसमें जीवन में आमूलचूल परिवर्तन आना स्वाभाविक ही है। जब अंदर सद्भावना नहीं लाएंगे, तब तक शांति मिलना नामुमकिन है। अपने संप्रदाय के नियमों का पालन करते हुए दूसरों के धर्म का भी सम्मान करें। धर्म मारकाट तोड़-फोड़ नहीं बल्कि प्रेम-प्यार से रहना सिखाता है।
प्रो. मनजीत सिंह पूर्व जत्थेदार अकाल तख्त
शाखाएं कई हो सकती हैं, लेकिन धर्म एक ही है। संत अलग-अलग पृष्ठभूमि से जुड़े होने पर भी समन्वयात्मक विचार देते हैं। दूसरों के प्रति धीरज न रहने पर सारी गड़बड़ होती है। इसके प्रति सावधान रहने की जरूरत है।
बालयोगी उमेश नाथ, पीठाधीश्वर श्री क्षेत्र वाल्मीकी धाम उज्जैन
बसुदेव कुटुंबकम ही हमारी विशेषता है। भारतीय संस्कृति की यही खासियत है, यह सारे संसार को अपना परिवार मानती है। यह मेरा है, वह बेगाना है। यह संकुचित विचारधारा सारी समस्याओं की जड़ है। मानवता को सुरक्षित और संवर्धित रखना वर्तमान की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
स्वामी धर्मदेव, महामंडलेश्वर एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष पंचनद स्मारक ट्रस्ट
सभी लोगों को बुद्ध बनने का अधिकार है। कलयुग के प्रभाव के कारण परिवार में एक दूसरे को समझने और प्रेमपूर्वक रहने का भी समय नहीं है, तो फिर मानव बुद्ध नहीं बन सकता है। सभी मजहब एक ही मंजिल तक पहुंचने के अलग-अलग रास्ते हैं।
येशी फोंटसोक बौद्ध धर्माचार्य (डिप्टी स्पीकर तिब्बत निर्वासित सरकार)
वीडियो कांफ्रेसिंग के माध्यम से सद्भाव दिवस को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म गुरुओं का समागम अतिशय पुण्य का सूचक होता है। सभी परंपराओं का सम्मान तथा सभी को मिल-जुलकर प्रेम से रहना विश्वगुरु भारत भूमि की विशेषता है। नक्षत्रों, गृहो, धरती, आसमान आदि से जरिये पूरा विश्व एक दूसरे से जुड़ा है। भारतीय संस्कृति सहिष्णुता पर बल देती है और विभिन्नता में एकता का दर्शन करने का बहुमूल्य संदेश देती है।

साध्वी ऋतंभरा
धरती एक है, क्योंकि इसके रचयिता ईश्वर एक हैं। एक दूसरे की सत्ता का सम्मान किए बिना धरती का अस्तित्व नहीं रह सकता। इसलिए हमें हम सभी को एक दूसरे व उनके धर्मो का सम्मान करते हुए दुनिया को आगे लेकर चलना चाहिए।
स्वामी संपूर्णानंद, आर्य समाजी संत
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