{"_id":"622a5f865dad9220a422d7ea","slug":"the-head-was-broken-due-to-a-friend-s-mistake-but-even-today-yarana-is-sure-karnal-news-knl101495563","type":"story","status":"publish","title_hn":"दोस्त की गलती से फूटा था सिर मगर आज भी याराना पक्का","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दोस्त की गलती से फूटा था सिर मगर आज भी याराना पक्का
विज्ञापन
माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। समय के साथ-साथ होली पर्व को मनाने के तरीके बदल गए हैं। होली पर पहले जैसा उत्साह आज के दौर में नहीं दिखता। होली की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाया करती थी और बैर भाव मिटाकर सभी मिलकर उत्साह से होली खेला करते थे। उस जमाने की होली को याद कर आज बुजुर्ग खासे उत्साहित हो जाते हैं। अमर उजाला से बातचीत में इन बुजुर्गों ने अपने जमाने की होली के संस्मरणों का साझा किया।
जब होली के दिन बने थे दूल्हे राजा
68 वर्षीय सराफा कारोबारी विजेंद्र बंसल वो दिन नहीं भूलते जिस दिन वे दूल्हे राजा बने थे। संयोग से वो दिन होली का था। इधर होली की हुड़दंग थी और उधर वह दूल्हे बनकर घोड़ी पर चढ़ने की तैयारी में थी। तभी अचानक उनका एक दोस्त दोहरी खुशी (एक तो यार की शादी की और दूसरी होली की) बरदाश्त नहीं कर पा रहा था। इसी उत्साह में वह लठ घुमा रहा था और वह लठ उनके सिर पर आ लगा। सिर से खून बहने लगा। यह देखकर हड़कंप मच गया। तुरंत मौके पर डॉक्टर को बुलाया गया और मरहम पट्टी कर दूल्हे को फिर बरात के लिए तैयार किया गया।
विजेंद्र बताते हैं कि उस दिन डॉक्टर भी उनकी बरात में साथ ही रहा ताकि कहीं दूल्हे राजा को फिर कोई परेशानी न हो जाए। विजेंद्र के अनुसार उन्होंने अपने इस दोस्त की गलती को उसी क्षण क्षमा कर दिया और आज वही उनका जिगरी दोस्त है। वह बताते हैं कि उनके दौर की होली कुछ अलग ही होती थी। सुबह बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद के साथ उन लोगों की दोस्तों संग होली शुरू होती थी और शाम तक जारी रहती थी। कोई मनमुटाव नहीं, कोई वैरभाव नहीं, सिर्फ उत्साह और उत्साह होता था।
विज्ञापन
सालियों के धोखे में पत्नी पर भी डाल दिया इंजन ऑयल
जोड़ियां कुआं निवासी साठ वर्षीय वीना बजाज (गोगी आंटी) बताती हैं कि होली की तैयारी 21 दिन पहले से ही शुरू हो जाती थी। घरों के आसपास मैदान खाली हुआ करते थे। युवा खाली मैदान में एक जगह लकड़ियां इकट्ठी किया करते थे। पर्व की शुरूआत बुजुर्गों के पैरों पर रंग लगाने से होती थी, कोई उनके चेहरे को रंग लगाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाता था। उसके बाद मंदिरों में जाकर ईश्वर के दर्शन करते थे और फिर क्या घर तो क्या मैदान हर जगह होली के रंग ही दिखते थे। एक किस्सा याद कर गोगी आंटी उत्साहित हो जाती हैं। वह कहती हैं कि उनके पति ने गलती से रंग समझकर इंजन ऑयल का डिब्बा उठा लिया और अपनी सालियों को रंगने के चक्कर में उनके ऊपर भी इंजन ऑयल पलट दिया। इंजन ऑयल का रंग ऐसा चढ़ा कि कई दिन तक नहीं उतरा।
विज्ञापन
करनाल। समय के साथ-साथ होली पर्व को मनाने के तरीके बदल गए हैं। होली पर पहले जैसा उत्साह आज के दौर में नहीं दिखता। होली की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाया करती थी और बैर भाव मिटाकर सभी मिलकर उत्साह से होली खेला करते थे। उस जमाने की होली को याद कर आज बुजुर्ग खासे उत्साहित हो जाते हैं। अमर उजाला से बातचीत में इन बुजुर्गों ने अपने जमाने की होली के संस्मरणों का साझा किया।
जब होली के दिन बने थे दूल्हे राजा
68 वर्षीय सराफा कारोबारी विजेंद्र बंसल वो दिन नहीं भूलते जिस दिन वे दूल्हे राजा बने थे। संयोग से वो दिन होली का था। इधर होली की हुड़दंग थी और उधर वह दूल्हे बनकर घोड़ी पर चढ़ने की तैयारी में थी। तभी अचानक उनका एक दोस्त दोहरी खुशी (एक तो यार की शादी की और दूसरी होली की) बरदाश्त नहीं कर पा रहा था। इसी उत्साह में वह लठ घुमा रहा था और वह लठ उनके सिर पर आ लगा। सिर से खून बहने लगा। यह देखकर हड़कंप मच गया। तुरंत मौके पर डॉक्टर को बुलाया गया और मरहम पट्टी कर दूल्हे को फिर बरात के लिए तैयार किया गया।
विज्ञापन
विजेंद्र बताते हैं कि उस दिन डॉक्टर भी उनकी बरात में साथ ही रहा ताकि कहीं दूल्हे राजा को फिर कोई परेशानी न हो जाए। विजेंद्र के अनुसार उन्होंने अपने इस दोस्त की गलती को उसी क्षण क्षमा कर दिया और आज वही उनका जिगरी दोस्त है। वह बताते हैं कि उनके दौर की होली कुछ अलग ही होती थी। सुबह बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद के साथ उन लोगों की दोस्तों संग होली शुरू होती थी और शाम तक जारी रहती थी। कोई मनमुटाव नहीं, कोई वैरभाव नहीं, सिर्फ उत्साह और उत्साह होता था।
विज्ञापन
सालियों के धोखे में पत्नी पर भी डाल दिया इंजन ऑयल
जोड़ियां कुआं निवासी साठ वर्षीय वीना बजाज (गोगी आंटी) बताती हैं कि होली की तैयारी 21 दिन पहले से ही शुरू हो जाती थी। घरों के आसपास मैदान खाली हुआ करते थे। युवा खाली मैदान में एक जगह लकड़ियां इकट्ठी किया करते थे। पर्व की शुरूआत बुजुर्गों के पैरों पर रंग लगाने से होती थी, कोई उनके चेहरे को रंग लगाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाता था। उसके बाद मंदिरों में जाकर ईश्वर के दर्शन करते थे और फिर क्या घर तो क्या मैदान हर जगह होली के रंग ही दिखते थे। एक किस्सा याद कर गोगी आंटी उत्साहित हो जाती हैं। वह कहती हैं कि उनके पति ने गलती से रंग समझकर इंजन ऑयल का डिब्बा उठा लिया और अपनी सालियों को रंगने के चक्कर में उनके ऊपर भी इंजन ऑयल पलट दिया। इंजन ऑयल का रंग ऐसा चढ़ा कि कई दिन तक नहीं उतरा।