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Karnal News: 87 साल पहले लगी थी कर्णनगरी में आरएसएस की पहली शाखा
Mon, 06 Oct 2025 12:45 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
Updated Mon, 06 Oct 2025 12:45 AM IST
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देव शर्मा
करनाल। आजादी से पूर्व आज से करीब 87 वर्ष पहले करनाल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की पहली शाखा लगी थी। मौजूदा समय में अब करीब 25 शाखाएं लगती है, जिनमें नियमित 20 से 25 लोग आते हैं। चाहे श्रीराम मंदिर आंदोलन हो या फिर आपातकाल, करनाल के स्वयंसेवकों ने सभी में बढ़-चढ़कर भागीदारी की है।
संघ के पुराने स्वयंसेवक ओमप्रकाश अत्रेजा बताते हैं कि वर्ष 1938 में दिल्ली से आयुर्वेद की डिग्री लेकर चौधरी रतिराम करनाल आए थे, वह दिल्ली में ही स्वयंसेवक संघ से जुड़ चुके थे। उन्होंने बताया कि पहली बार जुंडला गेट के पास, जहां गौड़ धर्मशाला है, आरएसएस की शाखा लगाई थी। यहां पहले संस्कृत विद्यालय था। विद्यालय बंद हुआ तो शाखा भी बंद हो गई। बाद में वैद्य रतिराम ने ही 1938 में राम स्वरूप गुप्ता एडवोकेट के रुई के बिक्री केंद्र के पास खाली मैदान में शाखा शुरू की। कुछ समय के बाद उत्तर प्रदेश से यहां एक प्रचारक आए, जिनका नाम था सोहन सिंह। उन्होंने यहां शाखा को नियमित किया।
वर्ष 1947 में जब देश आजाद हुआ और बंटवारे के बाद पाकिस्तान क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग करनाल आए तो इसके बाद ओमप्रकाश अत्रेजा, रमेश शर्मा, रमेश प्रकाश जैसे कई लोग संघ से जुड़े और शाखा को नियमित किया। रमेश शर्मा व रमेश प्रकाश तो अब दिवंगत हो चुके थे, इन्हीं में से एक पुराने संघी ओमप्रकाश अत्रेजा अभी भी शाखा में जाते हैं।
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उन्होंने बताया कि आपातकाल के दौरा वह खुद करनाल क्षेत्र में सत्याग्रह के इंचार्ज रहे। उन्हें और उनके साथी सरदार रघुवीर सिंह, चौधरी राम लाल वधवा, मूलचंद जैन को मीसा में बंद किया गया। दो महीने उन्होंने सत्याग्रह चलाया। करनाल के कई लोग इसमें हिस्सेदार रहे। यही स्थित श्रीराम मंदिर आंदोलन के दौरान रही। 1984 में श्रीराम मंदिर का शिलान्यास किया गया। करनाल में आंदोलन किया गया। चार बार करनाल बंद रहा। जुलूस निकाले गए।
कारसेवा में गए थे अयोध्या
कारसेवा में बड़ी संख्या में लोग अयोध्या के लिए निकले। 1990 में 107 लोगों के जत्थे को सात भागों में विभाजित करके निकाला गया। एक जत्थे का नेतृत्व उन्होंने खुद किया था। अधिकतर जत्थे से रास्ते में ही पकड़ लिए गए लेकिन वह अपने साथियों के साथ प्रयागराज पहुंचे। वहां से पैदल अयोध्या के लिए निकले, जिसमें दस लोग शामिल रहे। संघ के स्वयंसेवकों ने बहुत परेशानियां और यातनाएं झेली, लेकिन अब वक्त बदल चुका है। अब संघ के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को हर जगह सम्मान मिल रहा है।
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करनाल। आजादी से पूर्व आज से करीब 87 वर्ष पहले करनाल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की पहली शाखा लगी थी। मौजूदा समय में अब करीब 25 शाखाएं लगती है, जिनमें नियमित 20 से 25 लोग आते हैं। चाहे श्रीराम मंदिर आंदोलन हो या फिर आपातकाल, करनाल के स्वयंसेवकों ने सभी में बढ़-चढ़कर भागीदारी की है।
संघ के पुराने स्वयंसेवक ओमप्रकाश अत्रेजा बताते हैं कि वर्ष 1938 में दिल्ली से आयुर्वेद की डिग्री लेकर चौधरी रतिराम करनाल आए थे, वह दिल्ली में ही स्वयंसेवक संघ से जुड़ चुके थे। उन्होंने बताया कि पहली बार जुंडला गेट के पास, जहां गौड़ धर्मशाला है, आरएसएस की शाखा लगाई थी। यहां पहले संस्कृत विद्यालय था। विद्यालय बंद हुआ तो शाखा भी बंद हो गई। बाद में वैद्य रतिराम ने ही 1938 में राम स्वरूप गुप्ता एडवोकेट के रुई के बिक्री केंद्र के पास खाली मैदान में शाखा शुरू की। कुछ समय के बाद उत्तर प्रदेश से यहां एक प्रचारक आए, जिनका नाम था सोहन सिंह। उन्होंने यहां शाखा को नियमित किया।
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वर्ष 1947 में जब देश आजाद हुआ और बंटवारे के बाद पाकिस्तान क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग करनाल आए तो इसके बाद ओमप्रकाश अत्रेजा, रमेश शर्मा, रमेश प्रकाश जैसे कई लोग संघ से जुड़े और शाखा को नियमित किया। रमेश शर्मा व रमेश प्रकाश तो अब दिवंगत हो चुके थे, इन्हीं में से एक पुराने संघी ओमप्रकाश अत्रेजा अभी भी शाखा में जाते हैं।
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उन्होंने बताया कि आपातकाल के दौरा वह खुद करनाल क्षेत्र में सत्याग्रह के इंचार्ज रहे। उन्हें और उनके साथी सरदार रघुवीर सिंह, चौधरी राम लाल वधवा, मूलचंद जैन को मीसा में बंद किया गया। दो महीने उन्होंने सत्याग्रह चलाया। करनाल के कई लोग इसमें हिस्सेदार रहे। यही स्थित श्रीराम मंदिर आंदोलन के दौरान रही। 1984 में श्रीराम मंदिर का शिलान्यास किया गया। करनाल में आंदोलन किया गया। चार बार करनाल बंद रहा। जुलूस निकाले गए।
कारसेवा में गए थे अयोध्या
कारसेवा में बड़ी संख्या में लोग अयोध्या के लिए निकले। 1990 में 107 लोगों के जत्थे को सात भागों में विभाजित करके निकाला गया। एक जत्थे का नेतृत्व उन्होंने खुद किया था। अधिकतर जत्थे से रास्ते में ही पकड़ लिए गए लेकिन वह अपने साथियों के साथ प्रयागराज पहुंचे। वहां से पैदल अयोध्या के लिए निकले, जिसमें दस लोग शामिल रहे। संघ के स्वयंसेवकों ने बहुत परेशानियां और यातनाएं झेली, लेकिन अब वक्त बदल चुका है। अब संघ के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को हर जगह सम्मान मिल रहा है।