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क्रांतिवीरों की लेखनी से भी डरते थे अंग्रेज, जब्त की थीं 28 हजार रचनाएं
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The British were also afraid of the writings of revolutionaries, had confiscated 28 thousand works
- फोटो : Karnal
मोहित धुपड़
करनाल। ब्रितानी हुकूमत को आजादी के दीवानों की क्रांतिकारी गतिविधियों के साथ-साथ उनकी लेखनी से भी डर लगता था। आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों का साहित्य राष्ट्रीय चेतना के लिए बड़ा मददगार बना। उन्नसवीं और बीसवीं सदी में लोगों को झकझोरते हुए आजादी की लड़ाई से जोड़ने वाला ये साहित्य खूब लिखा गया। मगर जब इसके असरदार प्रभाव से अंग्रेजों को खतरे का अहसास हुआ तो उन्होंने इस साहित्य को जब्त करना शुरू कर दिया।
इस दौरान पंजाबी, गुजराती, बंगला, हिंदी, उर्दू, कन्नड़, उडिया, असमिया व अंग्रेजी भाषाओं में लिखित 28 हजार से अधिक रचनाओं को जब्त कर भारत से लंदन स्थित इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी भेज वहां अलमारियों में तालाबंद कर दिया गया। मगर अब यह गोपनीय साहित्य शोधकर्ताओं के लिए खुला है। हरियाणा अभिलेखागार विभाग की पूर्व उप निदेशक एवं लेखिका डा. राजवंती मान इसी गोपनीय साहित्य पर शोध कर रही हैं।
मूल रूप से रोहतक की रहने वाली डा. राजवंती मान बताती हैं कि वैसे तो सन 1857 में आजादी की पहली लड़ाई के बाद से ही ऐसा साहित्य लिखा जाने लगा। मगर जलियांवाला बाग हत्याकांड, शहीदे-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी, सत्याग्रह व असहयोग आंदोलन की घटना के बाद तो देशवासियों को अंग्रेजों के खिलाफ लामबंद करते हुए उन्हें आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए आह्वान करने वाला ये साहित्य खूब लिखा गया।
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माहौल यह था कि ऐसा साहित्य लिखने वालों को अंग्रेज गिरफ्तार कर उन पर अत्याचार करने लगे। डा. मान ने बताया कि आईपीसी (1860) की धारा 124 एक के तहत इस साहित्य को जब्त कर प्रकाशकों व लेखकों पर जुर्माने लगाए जाने लगे। कुछ ही प्रतियां गुप्त रूप से बचती थी, शेष को इंग्लैंड भेज दिया जाता था। जो प्रतियां बचती थी, उनकी रचनाओं को आजादी के दीवाने कंठस्थ कर मेलों, पर्वों व जन सभाओं में लोगों को अपने मुख से सुनाकर जंग-ए-आजादी के लिए प्रेरित करते थे। इस तरह ये क्रांतिकारी साहित्य मुंह से मुंह तक सफर करता हुआ लोक चेतना के ध्येय को पूरा करता रहा।
कुछ साहित्य तो उस दौर में ऐसे प्रकाशित हुए जिन्होंने अंग्रेजों के जुल्मों की इंतहा को आमजन तक एक अलग ही तरीके से पहुंचाने का काम किया। इसमें जलियांवाला बाग त्रासदी पर आधारित लाला किशन चंद जेबा का सन 1922 में लिखा नाटक ‘जख्मी पंजाब’, सन 1930 में प्रकाशित भोलानाथ ‘बेढब’ की रचना ‘आजादी की तोप’, भगत, राजगुरु व सुखदेव की फांसी के बाद सन 1931 में लिखी पंडित प्रभु नारायण मिश्र की रचना ‘लाहौर की सूली’ वीर सावरकर की पुस्तक ‘1857 का स्वतंत्र्य समर’, ‘अमर शहीद सरदार भगत सिंह’, ‘भारतीय वीर’, इत्यादि कई रचनाएं ऐसी थीं, जिनसे अंग्रेजों को क्रांति की आग ज्यादा भड़कने का डर था। नतीजतन उन्होंने ऐसे साहित्य को जब्त व प्रतिबंधित कर इंग्लैंड भेज दिया। सन 1947 के बाद इस साहित्य को इंग्लैंड में तालाबंद अलमारियों से बाहर निकाला गया और इसके अलग कैटलॉग तैयार कर ‘गोपनीय संग्रह’ के तौर पर अलग रख दिया गया। मगर अब साहित्यिक शोधकर्ताओं के लिए इसे खोल दिया गया है।
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करनाल। ब्रितानी हुकूमत को आजादी के दीवानों की क्रांतिकारी गतिविधियों के साथ-साथ उनकी लेखनी से भी डर लगता था। आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों का साहित्य राष्ट्रीय चेतना के लिए बड़ा मददगार बना। उन्नसवीं और बीसवीं सदी में लोगों को झकझोरते हुए आजादी की लड़ाई से जोड़ने वाला ये साहित्य खूब लिखा गया। मगर जब इसके असरदार प्रभाव से अंग्रेजों को खतरे का अहसास हुआ तो उन्होंने इस साहित्य को जब्त करना शुरू कर दिया।
इस दौरान पंजाबी, गुजराती, बंगला, हिंदी, उर्दू, कन्नड़, उडिया, असमिया व अंग्रेजी भाषाओं में लिखित 28 हजार से अधिक रचनाओं को जब्त कर भारत से लंदन स्थित इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी भेज वहां अलमारियों में तालाबंद कर दिया गया। मगर अब यह गोपनीय साहित्य शोधकर्ताओं के लिए खुला है। हरियाणा अभिलेखागार विभाग की पूर्व उप निदेशक एवं लेखिका डा. राजवंती मान इसी गोपनीय साहित्य पर शोध कर रही हैं।
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मूल रूप से रोहतक की रहने वाली डा. राजवंती मान बताती हैं कि वैसे तो सन 1857 में आजादी की पहली लड़ाई के बाद से ही ऐसा साहित्य लिखा जाने लगा। मगर जलियांवाला बाग हत्याकांड, शहीदे-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी, सत्याग्रह व असहयोग आंदोलन की घटना के बाद तो देशवासियों को अंग्रेजों के खिलाफ लामबंद करते हुए उन्हें आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए आह्वान करने वाला ये साहित्य खूब लिखा गया।
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माहौल यह था कि ऐसा साहित्य लिखने वालों को अंग्रेज गिरफ्तार कर उन पर अत्याचार करने लगे। डा. मान ने बताया कि आईपीसी (1860) की धारा 124 एक के तहत इस साहित्य को जब्त कर प्रकाशकों व लेखकों पर जुर्माने लगाए जाने लगे। कुछ ही प्रतियां गुप्त रूप से बचती थी, शेष को इंग्लैंड भेज दिया जाता था। जो प्रतियां बचती थी, उनकी रचनाओं को आजादी के दीवाने कंठस्थ कर मेलों, पर्वों व जन सभाओं में लोगों को अपने मुख से सुनाकर जंग-ए-आजादी के लिए प्रेरित करते थे। इस तरह ये क्रांतिकारी साहित्य मुंह से मुंह तक सफर करता हुआ लोक चेतना के ध्येय को पूरा करता रहा।
कुछ साहित्य तो उस दौर में ऐसे प्रकाशित हुए जिन्होंने अंग्रेजों के जुल्मों की इंतहा को आमजन तक एक अलग ही तरीके से पहुंचाने का काम किया। इसमें जलियांवाला बाग त्रासदी पर आधारित लाला किशन चंद जेबा का सन 1922 में लिखा नाटक ‘जख्मी पंजाब’, सन 1930 में प्रकाशित भोलानाथ ‘बेढब’ की रचना ‘आजादी की तोप’, भगत, राजगुरु व सुखदेव की फांसी के बाद सन 1931 में लिखी पंडित प्रभु नारायण मिश्र की रचना ‘लाहौर की सूली’ वीर सावरकर की पुस्तक ‘1857 का स्वतंत्र्य समर’, ‘अमर शहीद सरदार भगत सिंह’, ‘भारतीय वीर’, इत्यादि कई रचनाएं ऐसी थीं, जिनसे अंग्रेजों को क्रांति की आग ज्यादा भड़कने का डर था। नतीजतन उन्होंने ऐसे साहित्य को जब्त व प्रतिबंधित कर इंग्लैंड भेज दिया। सन 1947 के बाद इस साहित्य को इंग्लैंड में तालाबंद अलमारियों से बाहर निकाला गया और इसके अलग कैटलॉग तैयार कर ‘गोपनीय संग्रह’ के तौर पर अलग रख दिया गया। मगर अब साहित्यिक शोधकर्ताओं के लिए इसे खोल दिया गया है।

The British were also afraid of the writings of revolutionaries, had confiscated 28 thousand works- फोटो : Karnal