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Karnal News: अब खाइए सुपाच्य जौ की पोषक पूड़ी और चपाती

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 07 Jun 2023 02:42 AM IST
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Now eat nutritious poori and chapati of digestible barley
- मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा नियंत्रण और पथरी बनने से रोकेगी
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- आईआईडब्ल्यूबीआर ने तैयार की जौ की पूड़ी, चपाती, दलिया बनाने की तकनीक

- पांच दशकों में पांच गुना घटा रकबा, अब रकबा के साथ उत्पादन बढ़ाने पर भी रहेगा जोर

देव शर्मा

करनाल। भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) करनाल के वैज्ञानिकों ने अब जौ की पूड़ी, चपाती और दलिया तैयार की है। खास बात ये है कि इसे बनाने में जहां तेल कम लगेगा, वहीं यह स्वादिष्ट, पोषणयुक्त और औषधीय गुणों से भरपूर भी है। यह डायबिटीज, कोलेस्ट्रोल और उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में फायदेमंद होगी। यह गेहूं की पूड़ी, चपाती के बजाय अधिक सुपाच्य भी है।
दरअसल, पिछले 52 वर्षो में जौ का रकबा और उत्पादन तेजी के साथ घटा है, लेकिन भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान करनाल के वैज्ञानिकों ने इसका रकबा व उत्पादन बढ़ाने की भी कवायद शुरू कर दी है। आईआईडब्ल्यूबीआर के प्रधान वैज्ञानिक (जौ सुधार) डॉ. ओमबीर सिंह ने बताया कि गेहूं के बढ़ते उपयोग में जौ पीछे छूट गया है, लेकिन अब उसकी उपयोगिता प्रमाणित हो चुकी है, जौ से बने उत्पादों को खाद्य सामग्री में शामिल करना समय की आवश्यकता है। जौ की पूड़ी बनाने की तकनीक तैयार करके इसे संस्थान में तैयार भी किया गया है। जिसे काफी पसंद किया गया है। इसकी चपाती भी तैयार की जा रही है और दलिया भी। साथ ही इससे अन्य रुचिकर व स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों को भी तैयार किया जाएगा। जलवायु परिवर्तन के बीच जौ का उत्पादन बढ़ाने के लिए संस्थान नई किस्मों पर भी काम कर रहा है, शीघ्र ही नई किस्मों को भी तैयार कर किसानों को दिया जाएगा।
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दो तरह की प्रजातियां

जौ में दो तरह की प्रजातियां हैं, पहली छिलका सहित और दूसरी छिलका रहित। छिलका रहित किस्म वाले जौ से पूड़ी, चपाती और दलिया काफी अच्छा और स्वादिष्ट बनता है। छिलका रहित जौ की पीएल-891, गीतांजलि व आईआईडब्ल्यूबीआर की ओर से तैयार की गई किस्म कर्ण-16 खास है। इसमें गीतांजलि किस्म के जौ के बीजों के उत्पादन पर काम चल रहा है, इस किस्म के बीज को अगले साल तक किसानों को उपलब्ध करा दिया जाएगा। इसके अलावा छिलके वाली प्रजाति डीडब्ल्यूबीआर-182, डीडब्ल्यूबीआर-123 व डीडब्ल्यूबीआर-168 भी है, जो माल्ट बनाने के अधिक काम आती है, इससे बीयर, व्हिस्की आदि तैयार होती है, इससे पूड़ी, चपाती या दलिया बन तो सकता है, लेकिन उतना अच्छा नहीं बनता।
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इन रोगों में लाभकारी है जौ की पूड़ी और चपाती
आईआईडब्ल्यूबीआर के प्रधान वैज्ञानिक (जौ सुधार) डॉ. ओमबीर सिंह ने बताया कि जौ की पूड़ी, चपाती या दलिया के नियमित सेवन से शरीर में कोलेस्ट्रोल कम होगा, क्योंकि इसमें वीटा क्लूकॉन होता है। जो वजन कम करने में भी सहायक होता है। मधुमेह के रोगियों के लिए यह बेहद फायदेमंद होगी, साथ ही इसके खाने से पित्त की थैली में पथरी नहीं बनती। बड़ी आंत का कैंसर नहीं बनता है। ये पूड़ी तेल अधिक शोषित नहीं करती, इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 28 है, जबकि गेहूं का ग्लाइसेमिक इंडेक्स 60 होता है। यही कारण है कि इससे खून में शुगर की मात्रा कम बढ़ती है। सबसे खास बात ये है कि यह गेहूं के मुकाबले काफी सुपाच्य होती है।


1970 में देश में जौ का क्षेत्रफल 33 लाख हेक्टेयर था और उत्पादन करीब 5.6 मिलियन टन था। इसके बाद गेहूं का रकबा व उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन जौ का रकबा 2022 में सिर्फ छह लाख हेक्टेयर रह गया, इसी के साथ ही जौ का उत्पादन भी सिर्फ 1.7 मिलियन टन रह गया। हालांकि उत्पादकता तो बढ़ी, क्योंकि कई नई प्रजातियां भी आईं थी। लेकिन अब जौ व उससे बने उत्पाद समय की आवश्यकता है, इसलिए जौ के बने खाद्य पदार्थों पर कार्य किया जा रहा है। जौ की पूड़ी इसी दिशा में एक कदम है।

- डॉ. ओमवीर सिंह, प्रधान वैज्ञानिक (जौ सुधार), भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान करनाल
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