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Karnal News: हरियाणा में खेती के लिए अधिक नाइट्रोजन की जरूरत नहीं

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 17 Dec 2024 02:29 AM IST
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No more nitrogen is needed for farming in Haryana
देव शर्मा
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करनाल। हरियाणा में गेहूं की फसल उगाने के लिए जमीन में अधिक नाइट्रोजन की जरूरत नहीं है। विशेषज्ञों ने शोध के बाद किसानों काे सलाह दी है कि गेहूं के लिए प्रदेश की मिट्टी में पर्याप्त नाइट्रोजन माैजूद है। लिहाजा वे अंधाधुंध मनमर्जी से इसका उपयोग न करें।
वैज्ञानिकों का मानना है कि गेहूं की फसल में प्रति एकड़ तीन बैग यानी 125 किलो यूरिया से अधिक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। देखने में आ रहा है कि पौधों की बढ़वार और हरियाली लाने की होड़ में किसान अंधाधुंध यूरिया का प्रयोग करते हैं। ऐसा करना भूमि की उपजाऊ शक्ति के लिए तो नुकसानदेह होगा ही, साथ ही इसका विपरीत असर गेहूं के पाैधे पर भी पड़ता है। पाैधा कमजोर होकर बीमारियों की चपेट में आ जाता है।
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भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), क्षेत्रीय केंद्र करनाल के वैज्ञानिक (सस्य विज्ञान) डॉ. संदीप सिहाग ने बताया कि कई अनुसंधानों और मिट्टी की जांच में ये पाया गया है कि हरियाणा की मिट्टी को तय मात्रा से अधिक नाइट्रोजन की आवश्यकता नहीं है।
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100 किलो यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होता है। इस हिसाब से किसानों को गेहूं की फसल में प्रति एकड़ 125 किलोग्राम (तीन बैग) यूरिया के लगाने चाहिए। उन्होंने बताया कि बुवाई के समय डीएपी (नाइट्रोजन, फास्फोरस) 50 किलो वाला एक बैग प्रति एकड़ लगाना चाहिए। गेहूं की फसल में पहला पानी (सिंचाई) बुवाई के 21 दिन के बाद लगाना चाहिए। सिंचाई के सात से 10 दिन के बाद यानी जब खेत में पैर टिकने लगे तो एक बैग यूरिया (45 किलो) प्रति एकड़ के हिसाब से लगाना चाहिए। राजस्थान में इसके साथ जिंक भी देनी होती है लेकिन हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नहीं।

दूसरा पानी (सिंचाई) बुवाई के 45 से 50 दिन के बाद लगाना चाहिए, जब खेत थोड़ा सूख जाए तो फिर प्रति एकड़ एक बैग यूरिया का लगाना चाहिए।
इसके बाद गेहूं की फसल को यूरिया नहीं देनी चाहिए, क्योंकि इस दौरान कल्ले (किलरिंग) बन जाते हैं। उसके बाद नाइट्रोजन का कोई फायदा नहीं है। जितने कल्ले अधिक होंगे, फसल उतनी अच्छी होगी।
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