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अंतरात्मा की पुकार सुनकर मिला है मानव तन : साध्वी देवेशा
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- साध्वी देवेशा ने सुनाया रुक्मिणी विवाह प्रसंग
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से श्री रामचरितमानस स्कूल में आयोजित श्री कृष्ण कथा में साध्वी देवेशा भारती ने रुक्मिणी विवाह प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि रुक्मिणी, आत्मा तो कृष्ण परमात्मा का प्रतीक है। एक आत्मा चौरासी लाख योनियों का भ्रमण करने के बाद मानुष तन को धारण करती है। अंतरात्मा पुकारती है कि मुझे प्रभु मिल जाएं। यही पुकार सुनकर ही मानव का तन मिला है।
उन्होंने कहा कि इंसान मन के पीछे लगकर भगवान से दूर हो गया। मन की इच्छाओं को पूर्ण करने में वह दिन रात प्रयासरत है कभी भी विचार नहीं करता कि वह इस संसार में क्यों आया है। इन सभी प्रश्नों का जवाब एक इंसान को तभी मिलेगा जब उसके जीवन में गुरु का आगमन होगा क्योंकि मात्र गुरु ही हैं जो इंसान की अंतर आत्मा का मिलन भगवान से कराते हैं। जिस भगवान की इंसान अर्चना करता है वह भगवान जानने का विषय है। परंतु एक जिज्ञासु परमात्मा को मानता है लेकिन परमात्मा मानने का नहीं जानने का विषय है। भगवान एक रहस्य है, भेद है और इस भेद का उद्घाटन एक गुरु करते हैं।
जीवन में जब संत सद्गुरु का आगमन होता है सद्गुरु हमारे मस्तिष्क पर हाथ रखते हैं और दोनों भृगुटियों के मध्य स्थित तीसरी आंख को खोलते हैं और फिर एक जिज्ञासु अपने घट के भीतर उसे परमात्मा का दर्शन करता है इसके बाद शाश्वत भक्ति शुरू होती है। कथा के दौरान साध्वी बहनों ने भजनों का गायन कर सबको आनंदित किया कथा का समापन प्रभु की मंगल आरती से हुआ।
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से श्री रामचरितमानस स्कूल में आयोजित श्री कृष्ण कथा में साध्वी देवेशा भारती ने रुक्मिणी विवाह प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि रुक्मिणी, आत्मा तो कृष्ण परमात्मा का प्रतीक है। एक आत्मा चौरासी लाख योनियों का भ्रमण करने के बाद मानुष तन को धारण करती है। अंतरात्मा पुकारती है कि मुझे प्रभु मिल जाएं। यही पुकार सुनकर ही मानव का तन मिला है।
उन्होंने कहा कि इंसान मन के पीछे लगकर भगवान से दूर हो गया। मन की इच्छाओं को पूर्ण करने में वह दिन रात प्रयासरत है कभी भी विचार नहीं करता कि वह इस संसार में क्यों आया है। इन सभी प्रश्नों का जवाब एक इंसान को तभी मिलेगा जब उसके जीवन में गुरु का आगमन होगा क्योंकि मात्र गुरु ही हैं जो इंसान की अंतर आत्मा का मिलन भगवान से कराते हैं। जिस भगवान की इंसान अर्चना करता है वह भगवान जानने का विषय है। परंतु एक जिज्ञासु परमात्मा को मानता है लेकिन परमात्मा मानने का नहीं जानने का विषय है। भगवान एक रहस्य है, भेद है और इस भेद का उद्घाटन एक गुरु करते हैं।
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जीवन में जब संत सद्गुरु का आगमन होता है सद्गुरु हमारे मस्तिष्क पर हाथ रखते हैं और दोनों भृगुटियों के मध्य स्थित तीसरी आंख को खोलते हैं और फिर एक जिज्ञासु अपने घट के भीतर उसे परमात्मा का दर्शन करता है इसके बाद शाश्वत भक्ति शुरू होती है। कथा के दौरान साध्वी बहनों ने भजनों का गायन कर सबको आनंदित किया कथा का समापन प्रभु की मंगल आरती से हुआ।
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