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हॉट सीट : करनाल...भाजपा को गढ़ बचाने की चुनौती, कांग्रेस ने बदला दांव

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 14 Sep 2024 06:32 AM IST
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Hot seat: Karnal...challenge to BJP to save the stronghold, Congress changed its strategy
मोहित धुपड़
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करनाल। करनाल सीट पर सियासी बिसात बिछ चुकी है। विभिन्न दलों से व आजाद प्रत्याशियों के रूप में अभी तक कुल 17 धुरंधर मैदान में हैं। संभवत: इनमें से कुछेक मैदान भी छोड़ेंगे। फिलहाल यहां चुनावी सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। 10 साल से इस सीट पर दो मुख्यमंत्री (मनोहर लाल व नायब सिंह सैनी) बतौर विधायक जीतते आ रहे हैं मगर अबकी बार सीएम ने सीट बदली है। सीएम नायब सैनी लाडवा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इसके बावजूद करनाल हॉट सीट बनी हुई है।



इस सीट पर जहां भाजपा के लिए अपना गढ़ बचाने की चुनौती है, वहीं कांग्रेस भी अपनी नई रणनीति के साथ मैदान में नजर आ रही है। इस सीट पर अब तक कुल 14 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। इनमें से 5 बार भाजपा, 2 बार जनसंघ व 1 बार जनता पार्टी ने जीत हासिल की है। इसी के चलते भाजपा करनाल सीट को अपना गढ़ मानती है मगर कांग्रेस भी इस गढ़ में चार बार वर्ष 1982, 1991, 2005 व 2009 में सेंधमारी कर चुकी है। वर्ष 2014 व 2019 को मोदी लहर में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा था।
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भाजपा इस बार भी अपनी पुरानी रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है। पंजाबी बहुल माने जाने वाली इस सीट पर पार्टी ने पंजाबी चेहरे को आगे बढ़ाया है। यहां जगमोहन आनंद के भाजपा प्रत्याशी बनते ही पूर्व मेयर रेणू बाला गुप्ता ने बगावत कर दी थी। रेणू खुद को करनाल में वैश्य समाज का बड़ा चेहरा मानती हैं। यहां वैश्य बिरादरी की संख्या भी खासी है। पूर्व मेयर को मनाने के लिए केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल व सीएम नायब सैनी तक उनके घर पहुंचे थे मगर वे नहीं मानी। वीरवार को नामांकन दाखिल करने के अंतिम दिन उनके तेवर नरम पड़ गए। उन्होंने पार्टी के साथ रहते हुए निर्दलीय चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी है। उधर पार्टी सूत्रों के अनुसार मेयर मान तो गई हैं मगर प्रत्याशी जगमोहन आनंद को भितरघात का खतरा जरूर बन गया है। लिहाजा गढ़ बचाने के लिए भाजपा को यहां रूठों को भी मैनेज कर अपने साथ लेकर चलना पड़ेगा।
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दूसरी ओरकांग्रेस भी पिछले दो चुनाव से भाजपा की राह ही चलते हुए पंजाबी चेहरे तरलोचन सिंह पर ही दांव खेल रही थी मगर अबकी बार कांग्रेस ने दांव बदला है। जातीय समीकरण को कांग्रेस ने रणनीतिक ढंग से साधने की कोशिश की है। पार्टी ने इस सीट से दो बार विधायक रह चुकी सुमिता सिंह विर्क (2005 व 2009) को दोबारा मैदान में उतारा है। विर्क एक सिंधी जाट गोत्र है, जो कि पंजाबी खत्रियों से भी ताल्लुक रखता है। इस लिहाज से कांग्रेस इस सीट पर न केवल पंजाबियों बल्कि जाट मतदाताओं को भी साधेगी। इसी फार्मूले से कांग्रेस ने सुमिता के दम पर दो बार लगातार चुनाव जीता है।



उधर आम आदमी पार्टी ने वैश्य समाज से सुनील बिंदल, जजपा-असपा गठबंधन ने एससी समाज से जितेंद्र कुमार व इनेलो-बसपा गठबंधन ने रोड़ समाज से सुरजीत सिंह पहलवान को चुनावी समर में उतारा है। करनाल सीट पर वैश्य के साथ-साथ रोड़ समाज के मतदाता भी अपना खासा प्रभाव रखते हैं। एससी वोट जजपा और इनेलो गठबंधन में बंटने की पूरी संभावना है, क्योंकि जजपा का प्रत्याशी इसी बिरादरी से ताल्लुक रखता है और इनेलो के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही बसपा का मुख्य कैडर ही एससी समाज के मतदाता हैं। राजनीतिक मामलों के जानकार डाॅ. रामजी लाल मानते हैं कि इसका फायदा कांग्रेस व भाजपा दोनों को हो सकता है। उनके अनुसार पंजाबी वोट भी कांग्रेस और भाजपा में निश्चित ताैर पर बंटेंगे। ऐसे में वैश्य, बीसी व रोड़ बिरादरी के मतदाताओं में पैठ बढ़ाकर ही भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशियों काे फायदा मिल सकता है।




उधर देखा जाए तो आजाद प्रत्याशियों ने भी दो बार दलों का गणित बिगाड़ा है। पहली बार वर्ष 1968 से शांति प्रसाद व दूसरी बार वर्ष 2000 में कांग्रेस से बागी हुए जयप्रकाश ने आजाद प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की थी। इस बार भी कुछ निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं, जो निश्चित ताैर पर बड़े दलों के लिए वोट कटवा बनेंगे। बहरहाल, इस सीट पर अबकी बार कड़े मुकाबले की प्रबल संभावना है।
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